क्या यह धोनी की विदाई का वक्त है?

भारतीय क्रिकेट का अतीत बताता है कि टीम की असफलता की जिम्मेदारी हमेशा कप्तानों पर आती रही है. 1970 के आस-पास विदेशों में टेस्ट मैच जीतना भारत के लिए विशेष उपलब्धि हुआ करती थी. अजीत वाडेकर की कप्तानी में 1971 में भारत ने वेस्टइंडीज और इंग्लैंड दोनों को 1-0 से हराया था. इसके बाद जब इंग्लैंड की टीम भारत आई तो वाडेकर की टीम ने लगातार तीसरी टेस्ट सीरीज जीतते हुए इंग्लैंड को 2-1 से हराया था. लेकिन 1974 में इंग्लैंड के मैदानों पर खेलते हुए भारत टेस्ट सीरीज 0-3 से हार गया तो इसकी गाज वाडेकर पर ही गिरी. गुस्साए क्रिकेट प्रेमियों ने उनके और चयनकर्ताओं के घरों पर पत्थर फेंके. नतीजा? जल्द ही बोर्ड हरकत में आ गया और वाडेकर की जगह मंसूर अली खान पटौदी को 1974-75 की एक सीरीज के लिए कप्तान बना दिया गया. इसके कुछ दिन बाद ही पटौदी ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया. इसी साल श्रीनिवास वेंकटराघवन ने टीम की कमान संभाली और घरेलू मैदान पर टीम वेस्टइंडीज और इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज हार गई. लेकिन 1979 में जब इंग्लैंड में उसी के सामने भारतीय टीम 1-0 से सीरीज हारी तब वेंकटराघवन को भी अपनी कप्तानी गंवानी पड़ी.

फिर बिशन सिंह बेदी जब टीम के कप्तान थे उस दौर में सुनील गावस्कर की अगुवाई में भारतीय टीम ने न्यूजीलैंड के खिलाफ एक टेस्ट और घरेलू मैदानों पर लगातार तीन सीरीजों में जीत दर्ज की. बेदी जब टीम का नेतृत्व कर रहे थे तब भारतीय टीम इंग्लैंड के खिलाफ एक टेस्ट सीरीज हारी और उसके बाद विदेशी जमीनों पर ऑस्ट्रेलिया (2-3 ) और पाकिस्तान (0-2) के खिलाफ भी उसे हार का सामना करना पड़ा. बेदी की कप्तानी इसके बाद चली गई और सुनील गावस्कर नए कप्तान बने. इंग्लैंड में हार (पांच टेस्ट मैचों की सीरीज में 1-2 से) के बाद भारतीय टीम की कमान कपिल देव को सौंप दी गई. फिर 1986-87 में पाकिस्तान में उसके खिलाफ जब पांच टेस्ट मैचों की सीरीज भारत 0-1 से हारा तो इस ऑल राउंडर और एक समय भारतीय टीम को विश्व कप जिताने की गौरवशाली उपलब्धि दिलाने वाले कपिल को भी कप्तानी छोड़नी पड़ी.

दिलीप वेंगसरकर को वेस्टइंडीज में 3-0 से परास्त होने के बाद कप्तानी गंवानी पड़ी, रवि शास्त्री ने भारत में खेले गए एक टेस्ट मैच में टीम का नेतृत्व किया और श्रीकांत ने 1989-90 में पाकिस्तान में चार टेस्ट मैचों की सीरीज में टीम की कप्तानी की जो बराबरी पर छूटी. उसके बाद अजहरुद्दीन टीम के कप्तान बने. तब से लेकर धोनी के कप्तान बनने तक टीम का नेतृत्व छह लोगों के हाथ में गया. एक के बाद एक सीरीजों में हार की बात करें तो धोनी का रिकॉर्ड किसी भी अन्य कप्तान की तुलना में खराब रहा है.

लेकिन हालात हमेशा इतने बुरे नहीं थे. धोनी की कप्तानी में हमने वर्ष 2007 में टी-20 विश्व कप और 2011 में एकदिवसीय क्रिकेट का विश्व कप जीता. लेकिन वह समय ऐसा था जब धोनी के अंदर निरंतर नए प्रयोग करने की इच्छा नजर आती थी. यह यकीन करना थोड़ा मुश्किल है कि वही धोनी टेस्ट मैचों में इतने रक्षात्मक हो गए हैं. कई लोगों का कहना है कि वे अक्सर चीजों को केवल और केवल अपने तरीके से अंजाम देना चाहते हैं.

याद कीजिए किस तरह उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ टी-20 विश्व कप के फाइनल में लगभग अनजाने खिलाड़ी जोगिंदर सिंह को गेंदबाजी का जिम्मा सौंपा था! या फिर श्रीलंका के खिलाफ एकदिवसीय विश्व कप फाइनल में खुद को बैटिंग ऑर्डर में ऊपर लाकर मैच को अंजाम तक पहुंचाया था! यह एक प्रेरक नेतृत्वकर्ता का प्रदर्शन था. यहां तक कि वर्ष 2010-11 में दक्षिण अफ्रीका और फिर वेस्ट इंडीज में भी टेस्ट मैचों में भी उनको ठीक-ठाक सफलता हासिल हुई थी.

फोटोः एएफपी

लेकिन दिसंबर, 2011 के बाद से अचानक हमें एक नए धोनी का दीदार होने लगा. खेल के लंबे प्रारूप यानी टेस्ट मैचों में सफलता उनसे दूर होने लगी. इस दौरान सहवाग, गौतम गंभीर और वीवीएस लक्ष्मण जैसे दिग्गज खिलाड़ी जिनमें कप्तान बनने की काबिलियत थी, टीम से बाहर कर दिए गए. ऐसी चर्चाएं सामने आने लगीं कि गांगुली, द्रविड़ और यहां तक कि लक्ष्मण भी और खेलना चाहते थे लेकिन धोनी की कप्तानी में उन्हें ऐसा करना कठिन प्रतीत हुआ. लक्ष्मण ने तो खुलकर कहा कि जब वे अपने भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करना चाह रहे थे तब उनका कप्तान उपलब्ध ही नहीं था.

लेकिन इसके बावजूद धोनी अपनी जगह पर बने रहे. एक साल पहले तक कहा जाता था कि वरिष्ठ खिलाड़ियों के एक समूह की विदाई के बाद धोनी का कोई विकल्प नहीं है. लेकिन अब विराट कोहली के रूप में एक विकल्प हमारे सामने है. विराट बारे में कहा जा सकता है कि वे महेंद्र सिंह धोनी के संरक्षण में पनपे हैं. उसी समय से धोनी की नई टीम (कुछ लोग इसे धोनी के लड़के भी कहते हैं) का दबदबा है. कोहली के शानदार प्रदर्शन को छोड़ दिया जाए तो टीम में ऐसे कई खिलाड़ी हैं जिनको एक के बाद एक विफलताओं के बावजूद लगातार मौके दिए गए. जबकि उनके वरिष्ठ खिलाड़ियों को ऐसे अवसर नहीं मिल सके थे. यह कुछ ऐसा मामला था मानो धोनी उन वरिष्ठ खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाना चाहते थे और बोर्ड तथा चयनकर्ताओं ने इसे सुनिश्चित किया.

dhoniमैदान पर भी धोनी छोटे प्रारूप में ही नियंत्रण में नजर आते हैं. टेस्ट मैचों में जैसा कि इयान चैपल ने लिखा भी है, धोनी बहुत अधिक वक्त लेते हैं और खेल को बहक जाने देते हैं. उनकी कोशिश रहती है कि सामने वाले की गलती का इंतजार करें. विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि वेस्टइंडीज में उन्होंने नई गेंद लेने का मौका होने के बावजूद काफी देर तक ऐसा नहीं किया और अभी हाल ही में न्यूजीलैंड में उन्होंने आक्रामक रुख न अपनाकर ब्रेंडन मैककुलम और बीजे वाल्टिंग के बीच एक मैचजिताऊ साझेदारी हो जाने दी.

अपने प्रिय खिलाड़ियों से इतर किसी और पर ध्यान न देने की उनकी प्रवृत्ति के चलते ही भारतीय क्रिकेट की यह दशा हुई है. उदाहरण के लिए सुरेश रैना ने 17 टेस्ट खेले हैं (सभी मार्च, 2013 के पहले). उन्हें एस बद्रीनाथ और मनोज तिवारी पर तवज्जो दी गई जबकि इन दोनों खिलाड़ियों ने घरेलू क्रिकेट में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था.  गेंदबाजी की बात करें तो स्पिनरों के चयन में रविचंद्रन अश्विन को हमेशा प्राथमिकता दी गई. यहां तक कि प्रज्ञान ओझा और अमित मिश्रा जैसे मंझे हुए स्पिन गेंदबाजों की जगह रविंद्र जडेजा को तवज्जो दी गई. उमेश यादव, वरुण एरॉन और अभी हाल ही में ईश्वर पांडेय जैसे गेंदबाजों को हाशिये पर डाल दिया गया. यह सूची और लंबी हो सकती है. यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि धोनी के ‘लड़कों’ को प्राथमिकता दी गई. एक बात यह है कि इनमें से कई चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाड़ी थे. रोहित शर्मा जैसे कुछ खिलाड़ियों को भी जरूरत से बहुत अधिक मौके दिए गए.

लेकिन अब हार का सिलसिला शुरू होने के बाद क्या धोनी का आकलन उन्हीं पैमानों पर नहीं होना चाहिए जिन पर उनके पूर्ववर्तियों का किया गया? यह कोई रहस्य नहीं है कि चेन्नई सुपरकिंग्स (वह टीम जिसमें बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है) के कप्तान के रूप में उनकी स्थिति ने उनकी मदद की है. जो बातें अब तक केवल फुसफुसाहट थीं वे अब तेज हो गई हैं: भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान का आईपीएल की एक टीम का कप्तान होना उसकी मार्केटिंग के लिए बढि़या है और जब बीसीसीआई प्रमुख ही उस टीम का मालिक हो तो फिर कहना ही क्या. ऐसे में हितों के टकराव को एक पल के लिए किनारे किया जा सकता है.

अब जबकि धोनी एक बार फिर चोटिल हैं तो कप्तानी का भार कोहली को सौंपा गया है. अनेक लोग उनके बारे में कह रहे हैं कि वे वर्तमान कप्तान के सही उत्तराधिकारी हैं. कोहली की शुरुआत भी ठीक ही रही है. एशिया कप में बांग्लादेश की धीमी पिच पर उन्होंने पहले ही मैच में मेजबान टीम के खिलाफ न केवल शतक जड़ा बल्कि टीम को जीत भी दिलाई. हालांकि श्रीलंका और पाकिस्तान के साथ टीम को नजदीकी मुकाबलों में हार का स्वाद चखना पड़ा. लेकिन इस बार की उम्मीद बहुत ज्यादा है कि भविष्य में थोड़े और अच्छे प्रदर्शन से वे चयनकर्ताओं को अपनी ओर कर सकते हैं. पर सवाल अब भी यह है:  क्या बोर्ड देश के खेल जगत में मार्केटिंग के लिहाज से सबसे सफल खिलाड़ी का स्थानापन्न तलाश कर सकेगा? या उसने कर लिया है?

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