क्या मनमोहन सिंह उतने ही मासूम हैं जितने दिखते हैं?

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डीजीएच ने आरआईएल-निको की परियोजना की लागत बढ़ाने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी.

25 जनवरी, 2007 को सेन ने देवरा को फिर से एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने पूछा, ‘आखिर बगैर जांच कराए आरआईएल-निको के प्रस्ताव को कैसे मंजूरी मिल गई? मैंने अपने पिछले पत्र में ही संशोधित प्रस्ताव की खामियों की बात उठाई थी. मेरी मांग है कि इस मामले में कोई और फैसला लेने से पहले सरकार मामले की जांच करे और डीजीएच के फैसले पर पुनर्विचार करे.’

इसके बाद सेन ने एक के बाद एक तीन पत्र प्रधानमंत्री को लिखे जिनका क्या हश्र हुआ, हम पहले ही जान चुके हैं. ये पत्र उन्हीं मुरली देवरा के पास भेज दिए गए जिनके मंत्रालय के बारे में कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय और डीजीएच ने निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया.

हाल ही में अखबारों के संपादकों के साथ बातचीत में प्रणब मुखर्जी के दफ्तर की जासूसी कराए जाने के बारे में प्रधानमंत्री का कहना था, ‘मुखर्जी की तरफ से मुझे शिकायत मिली थी. इसके बाद मैंने इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) को जांच के लिए कहा था. जांच के बाद आईबी ने बताया कि जासूसी का कोई प्रमाण नहीं है. जांच के आदेश की जानकारी गृहमंत्री को नहीं थी.’ अजब बात है. एक तरफ तो वित्त मंत्रालय में जासूसी से जुड़े मामले की जानकारी प्रधानमंत्री जांच करने वाले विभाग के मुखिया यानी गृहमंत्री चिदंबरम तक को नहीं देते हैं. वहीं दूसरी तरफ पेट्रोलियम मंत्रालय की मिलीभगत से लूटे जा रहे खजाने की

लगातार खबर देने वाली चिट्ठियों को वे उचित कार्रवाई के लिए उसी मंत्रालय को भेज देते हैं.

जाहिर है, प्रधानमंत्री जी इतने मासूम नहीं हैं. अपनी तमाम शिकायतों का हश्र सेन ‘तहलका’ को कुछ इस तरह बताते हैं, ‘प्रधानमंत्री को मैंने तीन चिट्ठी लिखी. उन्हें पूरी स्थिति से अवगत कराया. पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे.’ इससे लगता है कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को आरआईएल द्वारा देश को पहुंचाए जाने वाला आर्थिक नुकसान या तो दिखा नहीं या फिर उन्होंने आंखें मूंद लीं. इसका नतीजा यह हुआ कि लूट जारी रही और शायद आगे भी जारी रहने वाली है.

मुरली देवरा को मंत्रिमंडल से हटाए जाने की मांग के संदर्भ में सेन कहते हैं, ‘सिर्फ देवरा क्यों? मैंने प्रधानमंत्री को तीन पत्र लिखे. उन्होंने भी कुछ नहीं किया. इसलिए गड़बड़ी की जिम्मेदारी तो प्रधानमंत्री को भी लेनी पड़ेगी.’ सेन के वक्तव्य के आधार पर एक वाजिब सवाल यह उठता है कि भारतीय कानून के तहत अपराधियों को संरक्षण देने वाले को भी अपराध का दोषी माना जाता है. ऐसे में आरआईएल को भ्रष्टाचार करने देने के लिए मुरली देवरा समेत प्रधानमंत्री को भी क्यों नहीं दोषी माना जाना चाहिए?

अब अगर इससे थोड़ा पहले जाएं तो जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला उजागर हुआ था तब भी पहले तो सरकार ने इसे घोटाला ही मानने से इनकार कर दिया था. बाद में कैग की रिपोर्ट आई जिसमें कहा गया कि स्पेक्ट्रम आवंटन में दूरसंचार मंत्री रहे ए राजा के फैसलों की वजह से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. काफी हो-हल्ले के बाद प्रधानमंत्री ने मुंह खोला और कहा कि उन्हें इतनी बड़ी गड़बड़ी के बारे में पता नहीं था. पर जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी समेत कुछ और लोगों ने उन पत्रों को सार्वजनिक कर दिया जो प्रधानमंत्री को इस गड़बड़ी के बारे में आगाह करते हुए लिखे गए थे. धीरे-धीरे सार्वजनिक होती सूचनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्पेक्ट्रम आवंटन के नाम पर जो लूट हुई उसे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री समय रहते रोक सकते थे.

स्पेक्ट्रम घोटाला उजागर होने पर सरकार ने कहा कि पहले आओ और पहले पाओ के आधार पर स्पेक्ट्रम आवंटित करके सरकार ने कोई गलती नहीं की. यह नीति तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने लागू की थी. हमने तो सिर्फ इस नीति का पालन किया. गैस मामले में भी पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी का कहना है कि जिस नीति के तहत आरआईएल को गैस की खोज और उत्पादन का ठेका मिला वह भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने 1999 में तैयार की थी. जाहिर है, उन नीतियों का पालन करने की बात कहकर सरकार पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है. अगर सरकार को यह लगा कि पुरानी नीति में कोई

गड़बड़ी है तो उसके पास उन नीतियों की खामियों को दूर करने का विकल्प था. पर ऐसा नहीं किया गया. साफ है कि मामला नीति में खामी का नहीं बल्कि नीयत में खोट का है.

ए राजा के इस्तीफे के बाद दूरसंचार मंत्रालय संभालने वाले कपिल सिब्बल ने कहा था कि कैग ने अपनी रिपोर्ट में आर्थिक नुकसान की गलत व्याख्या की है और सही मायने में सरकार को स्पेक्ट्रम आवंटन में कोई नुकसान ही नहीं हुआ. पर जैसे-जैसे मामला उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर आगे बढ़ा, वैसे-वैसे घोटाले की परतें एक-एक कर खुलती गईं. अब केजी बेसिन मामले में भी वही कहानी दोहराई जा रही है. केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को इस मामले में कोई गड़बड़ी ही नहीं दिख रही. कपिल सिब्बल कैग के औचित्य पर ही सवाल उठा रहे हैं. वहीं प्रधानमंत्री केजी बेसिन मामले में कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट पर कहते हैं, ‘मैंने पूरी रिपोर्ट नहीं पढ़ी है. इससे पहले कभी कैग ने किसी नीतिगत मामले में टिप्पणी नहीं की थी. कैग को संविधान के तहत तय दायरे में ही काम करना चाहिए.’ प्रधानमंत्री ने कहा कि निर्णय लेते वक्त हमें बहुत कुछ पता नहीं होता और अगर देश को प्रगति करनी है तो इस बात को संसद, कैग और मीडिया को समझना चाहिए.’ क्या इसका मतलब यह है कि प्रगति के लिए लूट जरूरी है और इसके खिलाफ किसी को भी नहीं बोलना चाहिए, चाहे वह कैग ही क्यों न हो.

2जी मामले में प्रधानमंत्री ने गठबंधन की मजबूरियों का हवाला देकर जानते-बूझते की गई देरी को जायज ठहराने की कोशिश की थी. यही बात दयानिधि मारन के बारे में भी कही जा सकती है. लेकिन देवरा के मामले में तो प्रधानमंत्री के पास यह बहाना भी नहीं है. वे कांग्रेस के ही मंत्री हैं. हां, इसमें प्रधानमंत्री की दूसरी तरह की मजबूरी हो सकती है. विकीलीक्स की मानें तो अमेरिका को खुश करने के लिए देवरा को पेट्रोलियम मंत्रालय दिया गया था. अब प्रधानमंत्री यह जरूर कह सकते हैं कि यदि देवरा के खिलाफ कार्रवाई की गई तो इससे अमेरिका के साथ हमारे रिश्तों पर असर पड़ेगा. यह विडंबना ही है कि देश का मुखिया लुटेरों और उनके सहयोगियों के ‘ईमानदार’ मुखिया में तब्दील हो गया है. तपन सेन कहते हैं, ‘इस सरकार को कॉरपोरेट ताकतों ने बंधक बना लिया है और उन्हीं के हितों के पोषण के लिए यह सरकार काम कर रही है. हम इस मसले को संसद के मानसून सत्र में जोर-शोर से उठाने जा रहे हैं. प्राकृतिक संसाधनों की लूट हर हाल में बंद होनी चाहिए.’

इस बीच खबर है कि कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट को आधार बनाकर सीबीआई ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है. कहा जा रहा है कि जल्द ही सीबीआई पूर्व डीजीएच वीके सिब्बल, पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों और इस मामले में संदेह के घेरे में आ रहे लोगों को तलब करने वाली है. जाहिर है कि इसमें आरआईएल के अधिकारी भी शामिल होंगे. सीबीआई से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक वह इन लोगों को तलब करने से पहले उस जवाब का इंतजार कर रही है जो तेल मंत्रालय द्वारा कैग को दिया जाना है. सीबीआई ने तेल मंत्रालय और डीजीएच से वे सारे दस्तावेज मांगे हैं जिनके आधार पर डी-6 के संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. तेल मंत्रालय जवाब देने में जितनी देर लगाएगी उतना ही समय कैग को अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में लगेगा.

कहा तो यह भी जा रहा है कि तेल मंत्रालय देरी इसलिए लगा रही है ताकि कैग की अंतिम रिपोर्ट संसद का सत्र चलने के दौरान न आ पाए और सरकार की किरकिरी कम हो.

(15 जुलाई 2011)

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