क्या परदे के पीछे चली जा रहीं कूटनीतिक चालें?

सबसे बड़ा सवाल यही कि आख़िर निहंगों का किसान आन्दोलन से सरोकार क्या है? क्यों वे 10 माह से सिंघु सीमा पर हैं? लखबीर हत्याकांड के बाद संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने घटना की निंदा करते हुए निहंगों को चले जाने की ताक़ीद की है; लेकिन उनकी हिम्मत नहीं कि वे उन्हें वहाँ से जबरन हटा कर दें। निहंग संगठनों की ओर से कहा गया है कि वे अपनी मर्ज़ी से किसान आन्दोलन आये हैं और अपनी मर्ज़ी से ही जाएँगे किसी के कहने से कदापि नहीं जाने वाले। किसान संगठनों के किसी पदाधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं कि वे खुलकर कह सकें कि आन्दोलनकारियों को निहंगों की कोई ज़रूरत नहीं है।

फ़िलहाल 27 नवंबर को बैठक के बाद फ़ैसला होगा कि निहंग सिंघु सीमा पर रहेंगे या चले जाएँगे। इसके बाद ही आगे की दिशा तय होगी। संयुक्त मोर्चा के ज़्यादा संगठन पंजाब से हैं। सिंघु बॉर्डर पर किसान संगठनों को मज़बूत कहे जाने वाले नेताओं से ज़्यादा दख़ल निहंगों का है। निहंग सिख धर्म का संगठन है और इसका इतिहास भी निर्दोषों की रक्षा का ही रहा है। लेकिन कौन, कब, किससे मिल जाए? नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह इंसानी फ़ितरत है। भाजपा नेताओं के साथ मुलाक़ात की बात सामने आने के बाद निहंग संगठन ने बाबा अमन सिंह से किनारा कर लिया है।

दिल्ली में भाजपा नेताओं के साथ बातचीत के इस मामले पर बाबा अमन ने केंद्र सरकार पर गम्भीर आरोप लगाये हैं, जिनमें उन्हें आन्दोलन ख़त्म कराने की एवज़ में 10 लाख रुपये की पेशकश का प्रलोभन दिया गया। इस कथित समझौता संवाद में उसके साथ अन्य निहंगों का होना बताया गया। यह जाँच का विषय है। लेकिन यह देखा गया है कि जब सरकार पर आरोप लगते हैं, तो मामले की जाँच नहीं होती; चाहे वो कोई भी मामला हो।

सिंघु सीमा पर गुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी मामले में निहंगों ने जो सज़ा दी है, वह लोकतंत्र में किसी भी नज़रिये से उचित नहीं है। उसका अपराध गम्भीर है और सिख धर्म के हिसाब से उसे दण्डित किया जा सकता है। पर इसके लिए निहंगों को कोई अधिकार नहीं कि वे खुलेआम उसका अंग-भंग करते हुए उसे तड़पा-तड़पाकर मार डाले। उसे अकाल तख़्त के सामने पेश किया जाना चाहिए था। वहाँ से उसे जो सज़ा होती, उसकी स्वीकार्यता पूरे सिख समाज की होती। वैसे भी सिख धर्म में ग़लती या बेअदबी की सज़ा परिश्रम कराकर या माफ़ी माँगने पर दे दी जाती है। लेकिन किसी की जान नहीं ली जाती।

पंजाब में बेअदबी के मामले पहले भी हुए हैं। आरोपियों की पहचान भी हुई; लेकिन ऐसा जघन्य काम किसी सिख ने नहीं किया, चाहे वे निहंग ही क्यों न हों। इससे साफ़ है कि यह कृत्य या तो किसी साज़िश के तहत हुआ है या फिर मानसिक विकृति के लोग ही ऐसा कर सकते हैं। सिंघु बॉर्डर पर बेअदबी कोई साज़िश तो नहीं? ऐसे सवाल अभी ख़त्म नहीं हुए हैं। कुछ लोग इसे किसानों से जोडऩे की कोशिश में लगे हैं। लेकिन यह धार्मिक मामला है और इसे उससे जोडऩा उचित भी नहीं है। क्योंकि अभी तक किसानों पर ऐसा कोई आरोप सिद्ध नहीं हो पाया है, जिसमें उन्होंने कोई ग़ैर-क़ानूनी क़दम उठाया हो।

निहंग संगठनों का आरोप है कि लखविंदर ने मरने से पहले गुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी करने के लिए 20 लोगों को 30-30 हज़ार रुपये देने का आरोप भी लगाया था। हालाँकि इसकी पुष्टि नहीं हुई है कि यह पैसा किसने किसे दिया? या दिया भी अथवा नहीं? अगर वह ज़िन्दा रहता, तो इससे परतें हटतीं और उस पर निहंगों के हमले की असली वजह पता चलती और साज़िश का पर्दाफ़ाश हो सकता था। लेकिन ऐसा हो नहीं सका या सम्भव है कि होने ही न दिया गया हो। क्योंकि आरोपी निहंग के सत्ताधारियों से मिलने की कोई तुक नहीं दिखती। अगर सरकार को आन्दोलन ख़त्म कराने या क़ानूनों को लेकर कोई क़दम उठाना है, तो उसे सीधे किसानों से बातचीत करनी चाहिए। लेकिन कहीं किसानों पर गाडिय़ाँ चढ़ती हैं, तो कहीं किसानों की हत्या हो जाती है। ये खेल कुछ समझ में नहीं आता और न ही इसे किसी भी हाल में उचित ठहराया जा सकता है। रही मध्यस्थता करने की बात, तो  मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक इसके लिए तैयार हैं। वह कह चुके हैं कि अगर केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी पर तैयार हो जाए, तो वह कृषि क़ानूनों के मामले में किसान नेताओं से सहमति बना लेंगे।

सवाल यह है कि जब न्यूनतम समर्थन मूल्य तो सरकार हमेशा देने को कहती रही है, तो फिर उसकी लिखित गारंटी क्यों नहीं देती? इससे तो सरकार की नीयत पर सीधे-सीधे सवाल खड़े होते हैं। उसे चाहिए कि वह देश में अस्थिरता का माहौल ख़त्म हो इसके लिए किसी जोड़-तोड़ या साम, दाम, दण्ड, भेद से काम लेने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाये। किसानों से बातचीत करे। सम्भव है कि वे इसके लिए तैयार भी हो जाएँ। क्योंकि किसानों ने शुरू से ही कहा है कि वे समाधान चाहते हैं; प्रधानमंत्री उनसे बातचीत करें। लेकिन प्रधानमंत्री ने आज तक किसानों को एक सेकेंड का भी समय नहीं दिया। इस बात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझने की ज़रूरत है।