क्या अरविंद बनाम शीला में अरविंद की हार तय है?

हालांकि, इस विधानसभा क्षेत्र की झुग्गी बस्तियों में केजरीवाल के पक्ष में माहौल दिखता है. बातचीत में लोग बताते हैं कि इस बार वे झाड़ू को ही जिताएंगे. आप की ओर से इन बस्तियों में चुनाव प्रचार का काम कर रहे सुरिंदर सिंह बताते हैं, ‘इधर पूरी तरह से आम आदमी पार्टी के पक्ष में माहौल है. हमें उम्मीद है कि अरविंद यहां से चुनाव जीतने में सफल होंगे. दलित बस्तियों से भी हमें काफी वोट मिलने वाले हैं.’

लेकिन झुग्गी बस्तियों में रहने वालों की संख्या इस इलाके में उतनी नहीं है और दलित बस्तियों को लेकर कांग्रेस के भी अपने दावे हैं. कांग्रेस को यकीन है कि इन इलाकों के लोग तो शीला दीक्षित को ही वोट देंगे. कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष चतर सिंह कहते हैं, ‘शीला दीक्षित ने आम लोगों के कल्याण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं. इनमें अन्नश्री योजना और पेंशन योजना प्रमुख हैं. लोगों को इसका सीधा फायदा मिल रहा है. उन्हें लग रहा है कि यह सरकार उनके लिए काम कर रही है. जाहिर है कि ऐसे में वे उसी के साथ खड़े होंगे जो उनके लिए काम कर रहा हो.’

Seela-Dixit-by-Vijay-Pandey

कांग्रेस की ओर से इस विधानसभा क्षेत्र में जो चुनाव प्रचार हो रहा है उसमें इस क्षेत्र के काम के बजाय पूरी दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार ने जो काम किए हैं, उन्हें प्रमुखता से बताया जा रहा है. खुद शीला दीक्षित ने नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के सरोजिनी नगर में आयोजित एक सभा में अपने कार्यों को गिनाते हुए बताया कि उनकी सरकार ने दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर ऊंचा उठाने के लिए कई कदम उठाए हैं. मुख्यमंत्री ने सरकारी कर्मचारियों को अपने पाले में करने के मकसद से सातवें वेतन आयोग का मसला भी उठाया. उन्होंने कहा कि अगर सातवां वेतन आयोग आता है तो इससे सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों को काफी फायदा होगा.

इस विधानसभा क्षेत्र में घूमने के दौरान यहां सबसे अधिक सक्रियता आम आदमी पार्टी की ही दिखती है. इसी पार्टी के पास चुनाव प्रचार की एक स्पष्ट और नई रणनीति भी दिखती है. भाजपा और कांग्रेस का चुनाव प्रचार अभी यहां जोर नहीं पकड़ पाया है और इन दोनों दलों के नेताओं से बातचीत में यह भी पता चलता है कि वे पारंपरिक ढंग से ही चुनाव प्रचार करेंगे. दोनों प्रमुख दलों की मानें तो उनका चुनाव प्रचार तो नामांकन प्रक्रिया पूरा होने के बाद ही जोर पकड़ेगा. माना जा रहा है कि चुनाव के 15 दिन पहले से इस इलाके में काफी सियासी सरगर्मी दिखेगी.

इस विधानसभा क्षेत्र में आम आदमी पार्टी की तैयारियों के बारे में सुरिंदर सिंह कहते हैं, ‘पार्टी इस इलाके में हर 15-20 परिवारों पर एक स्थानीय प्रभारी बना रही है. हमारी योजना बड़ी संख्या में ऐसे प्रभारी बनाने की है. पार्टी इन प्रभारियों का इस्तेमाल पुल की तरह करेगी. जो भी सूचना क्षेत्र के आम लोगों तक पहुंचानी होगी, वह इनके जरिए ही पहुंचाई जाएगी. पार्टी या पार्टी से जुड़े किसी व्यक्ति के बारे में जो भी आम लोगों के संदेह होंगे, उन्हें दूर करने का काम भी ये प्रभारी करेंगे. इसके अलावा ये लोग पार्टी द्वारा बनाए गए महिला सुरक्षा बल के साथ भी समन्वय करके काम करेंगे और उसे जरूरी सहयोग देंगे. इन प्रभारियों के घरों के बाहर बोर्ड लगा रहेगा ताकि पार्टी से संबंधित कोई बात क्षेत्र के आम लोग इनसे सीधे पूछ सकें. इसके अलावा इन प्रभारियों को पार्टी की ओर से प्रचार सामग्री मुहैया कराई जा रही है. ये प्रभारी और उनके साथ पार्टी के कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को यह समझा रहे हैं कि उन्हें आप को क्यों वोट देना चाहिए और अरविंद केजरीवाल को क्यों नई दिल्ली से जिताना चाहिए.’

आम आदमी पार्टी की तैयारियों के आधार पर उसके नेता और कार्यकर्ता दावा करते हैं कि यहां शीला दीक्षित और अरविंद केजरीवाल के बीच ही सीधा मुकाबला है. भाजपा प्रत्याशी विजेंद्र गुप्ता भी ठीक इसी अंदाज में आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की मौजूदगी को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘नई दिल्ली सीट पर केजरीवाल कोई फैक्टर नहीं हैं. यहां हमेशा से कांग्रेस और भाजपा का मुकाबला रहा है. इस बार भी ऐसा ही है.’ अपनी जीत पक्की मान रहे गुप्ता कहते हैं, ‘लोग प्रयोग के मूड में नहीं हैं. शीला दीक्षित के कामकाज से लोग त्रस्त हैं. लोग देख रहे हैं कि इस विधानसभा क्षेत्र में आने वाले कनॉट प्लेस की हालत मुख्यमंत्री ने क्या कर दी है. दिल्ली का दिल कहा जाने वाला कनॉट प्लेस आज गड्ढों से भरा हुआ है. महंगाई और बिजली की बढ़ी कीमतों ने आम लोगों का जीना मुहाल कर दिया है. ऐसे में मुझे पूरा यकीन है कि नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के लोग भाजपा के पक्ष में मतदान करेंगे.’

विजेंद्र गुप्ता के दावे कैसे भी हों लेकिन नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की समस्या यह है कि पिछले चार चुनावों में पार्टी चार अलग-अलग उम्मीदवारों के साथ मैदान में उतरी है. इनमें से भी सब ऐसे हैं जो इस विधानसभा क्षेत्र के नहीं है. विजेंद्र गुप्ता पर भी उनके विपक्षी बाहरी होने का आरोप लगा रहे हैं. गुप्ता रोहिणी के रहने वाले हैं और वे वहीं से टिकट भी चाहते थे. लेकिन पार्टी ने उन्हें शीला दीक्षित के खिलाफ उतारने का फैसला किया. बाहरी होने के आरोप को खारिज करते हुए गुप्ता कहते हैं, ‘मैं बाहरी नहीं हूं. यहां के लोगों ने देखा है कि मैंने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए शीला दीक्षित और उनकी सरकार के घोटालों को उजागर करने के लिए कितना काम किया है.’

इस सीट पर मुकाबला कर रही तीनों पार्टियों के अपने-अपने दावे हैं. हर पार्टी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिखाई देने की कोशिश करती है. चुनावी मौसम में ऐसा होना स्वाभाविक भी है. लेकिन जानकारों की मानें तो इस सीट पर जीत या हार का खास तौर पर शीला दीक्षित और अरविंद केजरीवाल के लिए काफी महत्व है. ज्यादातर लोगों का यह मानना है कि अगर किसी वजह से शीला दीक्षित यह सीट हार गईं तो उनके राजनीतिक करियर पर पूर्ण विराम लग जाएगा. वहीं अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के लिए शीला दीक्षित को हराने से बड़ी कामयाबी कोई नहीं होगी. जानकारों की मानें तो यह एक जीत आम आदमी पार्टी को आगे बढ़ने के लिए एक साफ-सुथरा-पक्का रास्ता मुहैया कराने का काम कर सकती है. मगर यहां से हार जाने पर उसकी महत्वाकांक्षाओं को एक बड़ा झटका भी लग सकता है.

अरविंद केजरीवाल के लिए इस सीट की जीत-हार का मतलब समझाते हुए लंबे समय से दिल्ली की सियासत को देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार कुमार संजय सिंह कहते हैं, ‘कुछ लोग यह कह रहे हैं कि अगर केजरीवाल यहां से हार जाते हैं तो इससे उनकी पूरी मुहिम की हवा निकल जाएगी. लेकिन मेरी राय कुछ अलग है. केजरीवाल अगर चाहते तो किसी ऐसी सीट से लड़ सकते थे जहां से जीतना अपेक्षाकृत आसान होता. लेकिन उन्होंने शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला करके हिम्मत का परिचय दिया है. इसलिए अगर केजरीवाल कड़े मुकाबले में हारते भी हैं तो उनका कद बढ़ेगा ही.’

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