कौन है अच्छा डॉक्टर?

2. क्या उसके पास समय है?
आज के युग में, जब हर तकलीफ के टेस्ट आ गए हैं, कहीं वह आपकी सुने बिना ही दस टेस्ट तो नहीं लिखने लगता? टेस्ट हैं, तो लिखना भी जरूरी है. उनकी भी अहमियत है पर तभी जब डॉक्टर ने आपकी तकलीफें तफसील से सुनी हों और आपकी जांच तसल्ली से की हों. यदि डॉक्टर मरीज की सुने तो उसे प्रायः बीमारी की दिशा समझ में आ ही जाती है. फिर मरीज की बातें विस्तार से सुनने से डॉक्टर को उस मरीज का व्यक्तित्व, उसके विश्वास-अंधविश्वास, भय, उसकी सोच, ईश्वर पर उसका विश्वास आदि भी समझ में आते हैं. एक ‘अच्छा डॉक्टर’ जानता है कि हर मरीज अलग व्यक्ति भी है- वह केवल मलेरिया, टायफाइड, किडनी या बीमार दिल नहीं है. मरीज मात्र एक बेड नंबर नहीं है.

3. उसका व्यवहार कैसा है?
यह ‘ट्रिकी’ प्रश्न है. मार्केटिंग और बाजारवाद के इस बेईमान समय ने डॉक्टरी को भी बदला है. वह मीठा बोलने लगा है. दुकानदार को विशेष तौर पर फीके पकवानों को बेचने वाले को मीठा बोलना पड़ता है. आप ऊंची दुकान पर बिक रहे फीके माल को पहचान सकते हैं. आखें खुली रखेंगे तो बनावटी मीठापन पकड़ लेंगे. ‘अच्छा डॉक्टर’ सबसे पहले एक ‘अच्छा इंसान’ होगा जो उसके व्यवहार से तुरंत परिलक्षित हो जाएगा. उसे देखें. समझने का प्रयास करें कि वह आपकी पीड़ा को महसूस कर सकता है या नहीं. वह आपकी आर्थिक और पारिवारिक परेशानियों के साथ सामंजस्य बिठाकर इलाज करने की कोशिश करता है या नहीं? वह धैर्य दिखाता है या बात-बात पर उखड़ जाता है? बच्चों, औरतों तथा वयोवृद्ध मरीजों को वह कैसे बरतता है? बूढ़े मरीज ऊंचा सुन सकते हैं, शायद ठीक से बोल न पाएं. शायद तेजी से परीक्षण कोच पर चढ़-उतर न पाएं, शायद छोटी-सी बात को अनावश्यक विस्तार से कहने की कोशिश करें- क्या यह सब समझते हुए डॉक्टर उनकी धैर्य से जांच करता है? वह मरीज के, विशेष तौर पर गरीब बेसहारा मरीज के आत्मसमान की रक्षा करता है या नहीं? डॉक्टर को ध्यान से देखते रहें कि वह आपसे पहले वाले मरीजों से कैसा व्यवहार करता है. नंबर आते-आते स्पष्ट हो जाएगा कि आप सही जगह हैं या गलत.

4. क्या वह एक अच्छा विद्यार्थी व गुरु भी है?
यह मुद्दा भी ट्रिकी है. पहले समझें कि इसका अर्थ क्या है. शिष्य या विद्यार्थी का अर्थ क्या है? देखिए, डॉक्टरी विज्ञान बेहद तेजी से बदल रहा है. एक बार डिग्री हासिल करके यदि पांव फैलाकर बैठ जाएं तो डॉक्टर चंद वर्षों में ही ‘क्वालीफाइड’ नीम हकीम बनकर रह जाते हैं. एक अच्छा डॉक्टर निरंतर नई किताबों, जर्नलों आदि को एक अच्छे विद्यार्थी की तरह पढ़ता, गुनता और इनसे सीखता है. वही डॉक्टर ज्यादा अच्छा डॉक्टर है जो आपसे ईमानदारीपूर्वक यह कह सके कि आप तो दो दिन बाद आएं, मैं आपकी बीमारी का और अध्ययन करके, पढ़कर फिर आपसे बात करूंगा. वह डॉक्टर खतरनाक है जो सोचता, मानता और कहता है कि उसे सब कुछ आता है. अच्छा डॉक्टर वह है जो विद्यार्थी की भांति नित्य अपने को डॉक्टरी इम्तिहान के लिए तैयार करता है, साथ-साथ वह अपने जूनियर स्टाफ को एक अच्छे गुरु की भांति सिखाता-पढ़ाता भी है. वह जानता है कि वह अकेले-अकेले मरीज को ठीक नहीं कर सकता- यह सीनियर डॉक्टर, जूनियर डॉक्टर, नर्स, कंपाउंडर से लेकर सफाई कर्मचारी तक की टीम के ज्ञान तथा उत्साह पर निर्भर होता है. एक अच्छा डॉक्टर अपनी टीम का गुरु होता है.

बातें बहुत-सी और भी हैं. प्रश्न बहुत हैं.

क्या वह मरीज के प्राइवेसी का ख्याल रखता है? वह स्वयं से ज्यादा जांचों पर भरोसा तो नहीं करता? वह आंखें मूंदकर दस तरह की जांचें कराने की बात तो नहीं करता? वह मरीज का सगा है या दवाई कंपनियों का? क्या आपकी हर तकलीफ के जवाब में वह एक नई गोली लिख देता है? क्या वह ‘प्रमाणित, तथ्य आधारित डॉक्टरी’ से हटकर ‘अपना ही कुछ’ इलाज देता रहता है? वह आपको आशा बंधाता है या नहीं? अनेक प्रश्न हैं. उनका जिक्र अगली बार. तब तक खोजिए. अच्छा डॉक्टर मिलेगा. बहुत मिलेंगे.

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