कोण कई लड़ाई वही

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इन सबके बीच झारखंड में सबसे कांटे की टक्कर इस बार झारखंड में संथाल परगना इलाके की प्रमुख सीट दुमका पर है. यहां से दो आदिवासी दिग्गज नेता आमने-सामने हैं. एक तरफ आदिवासियों के सबसे चर्चित नेता,झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख और राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन हैं तो दूसरी तरफ झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख व राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी. संथाल परगना आदिवासी बहुल इलाका है और झामुमो का गढ़ माना जाता है. बताया जा रहा है कि बाबूलाल मरांडी ने यहां से चुनाव लड़ने का फैसला कर एक तरह से जोखिम लिया है, लेकिन इसके पीछे उनका बड़ा मकसद भी है. हालिया दिनों में भाजपा ने भी तेजी से संथाल परगना में अपने आधार का विस्तार किया है. बाबूलाल जानते हैं कि अगर वे शिबू सोरेन को परास्त कर देंगे तो इसका संदेश पूरे राज्य में जाएगा और आदिवासियों के नये बड़े नेता के तौर पर उन्हें स्थापित होने में सहूलियत होगी. बाबूलाल मरांडी पहले भी शिबू पर जीत हासिल कर चुके हैं, लेकिन तब वे भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता हुआ करते थे.

लड़ाई और भी कई सीटों पर दिलचस्प है. राज्य में एक सीट ऐसी भी है, जहां भाकपा माले की स्थिति काफी अच्छी मानी जा रही है. कोडरमा सीट से भाकपा माले के प्रत्याशी राजकुमार यादव मैदान में हैं.राजकुमार कई बार यहां चुनाव लड़ चुके हैं और हमेशा मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहे हैं. इस बार उनकी स्थिति अच्छी होने से उनके पक्ष में संभावना की बात भी कही जा रही है.

झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राज्य में सरकार बनाने और बचाने के एवज में अधिकांश सीटें कांग्रेस को दे दी हैं इसलिए उसके पास अपने सबसे बड़े नेता शिबू सोरेन की प्रतिष्ठा बचाने के अलावा बहुत कुछ बड़ा नहीं है. लेकिन कांग्रेस की परीक्षा इस राज्य में इसलिए होनी है, क्योंकि राज्य बनाने का श्रेय लेने के बाद से भाजपा उतार-चढ़ाव के बावजूद इस गढ़ में मजबूत स्थिति में रही है.

कुल मिलाकर इस चुनाव में खोने-पाने की मुख्य लड़ाई कांग्रेस और भाजपा ही लड़ रही है. बीच में इन दोनों पार्टियों के एकाधिकार और मजबूत वर्चस्व को तोड़ने के लिए झामुमो, आजसू, झाविमो समेत कई पार्टियां मजबूती से दस्तक दे रही हैं.

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