कोई मज़हब परिपूर्ण नहीं

कोई भी मज़हब ईश्वर को पाने या उस तक पहुँचने का दावा नहीं करता। न ही मज़हबी किताबें यह कर सकती हैं; जब तक कि इंसान इसके लिए शुद्ध कर्म न करे। मज़हब के बताये मार्ग पर उसूलों के साथ न चले। सवाल यह है कि अगर कोई किसी मज़हब को नहीं मानता हो, तो वह क्या करे? इसके लिए वह विशुद्ध कर्म करे। कर्म तो सभी लोग करते हैं। एक चोर भी चोरी करता है, तो वह कर्म ही है। कोई किसी को मारता है, तो उसका मारना भी एक प्रकार का कर्म है। लेकिन वह ग़लत है। इंसान को विशुद्ध अर्थात् शुद्धातिशुद्ध कर्म करना चाहिए। सीधे शब्दों में कहें, तो अच्छे कर्म, नेक कर्म करने चाहिए; वे कर्म, जिससे किसी का अनुचित या बुरा न हो, किसी को दु:ख न पहुँचे। सच तो यह है कि सभी लोग किसी का दिल दुखाये बग़ैर, उसका बुरा किये बग़ैर भी जी सकते हैं। लेकिन कुछ लोग फिर भी दूसरों का बुरा करने में सुख देखते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है, इंसान को अपने ही विशुद्ध कर्मों के आधार पर ईश्वर की निकटता हासिल हो सकती है। दूसरा कोई रास्ता साधन उसे ईश्वर से नहीं मिला सकता। अर्थात् अगर कोई व्यक्ति उम्र भर ग़लत काम करे और अपने मज़हब की किताब को हर रोज़ पढ़ता रहे। धार्मिक अनुष्ठान करता रहे, तो ईश्वर की शरण को कभी प्राप्त नहीं हो सकता। ईश्वर की शरण पाने के लिए तो अनपढ़ भी उतना ही योग्य हो सकता है, जितना एक मज़हब को मानने और उसके उसूलों पर चलने वाला। लेकिन दोनों में ही विशुद्ध सत्कर्मों, निश्छलता, पावनता, समभाव, सद्भाव, सरलता, परहित, प्रेम, करुणा, दया, विनम्रता, विश्वास, व्याकुलता, अहसास का होना परम् आवश्यक है। लेकिन इसके लिए तन-मन और विचारों से पवित्र होना पड़ेगा। पतित तो हमेशा नीचे ही जाता है, फिर चाहे वह कितना भी विद्वान क्यों न हो। कितना भी मज़हबी क्यों न हो। ऐसा व्यक्ति लोगों में सम्मान भी पा सकता है; लेकिन ईश्वर को नहीं। क्योंकि लोग तो मूर्खों के भी गुण गाने लगते हैं। लेकिन ईश्वर को पाने के लिए तो मासूम बच्चे की तरह निश्छल और निर्मल होना पड़ेगा, जल की तरह स्वच्छ होना पड़ेगा, वायु की तरह कोमल होना पड़ेगा और अग्नि की तरह पवित्र होना पड़ेगा।