केदारनाथ यात्रा-2014: एक खतरनाक चुनावी स्टंट

सबब तो है सबक नहीं

बीते साल की भयावह आपदा और उससे हुई अकल्पनीय क्षति के बाद उत्तराखंड सरकार ने दावे तो बहुत किए मगर एक साल बाद हाल बड़ी हद तक वही ढाक के तीन पात जैसा दिखता है

IMG_0403केदारघाटी समेत उत्तराखंड के तमाम पर्वतीय इलाकों में बीते साल जो प्राकृतिक आपदा आई थी उसके असर की भयावहता के लिए आपदा प्रबंधन तंत्र को भी काफी हद तक जिम्मेदार माना गया था. इसने संकट को भांपने में शुरुआती चूक तो की ही, बचाव और राहत के मोर्चे पर भी यह बुरी तरह पस्त पड़ गया था. इस भयानक आपदा को हुए अब साल भर होने को है. केदारनाथ सहित उत्तराखंड के चारों धामों की यात्रा शुरू होने वाली है. इसलिए सरकार और खास तौर पर उसके आपदा प्रबंधन तंत्र की तैयारियों की तरफ निगाहें टिकना स्वाभाविक है. उम्मीद की जा रही है कि इतनी बड़ी आपदा से सबक सीखकर प्रदेश सरकार का आपदा प्रबंधन विभाग अब पहले से बेहतर तरीके से तैयार होगा.

लेकिन सरकार ने जो कदम उठाए हैं उन्हें देखते हुए यह उम्मीद धुंधली पड़ने लगती है. बेशक अब तक सरकार ने आपदा से निपटने को लेकर फौरी तौर पर बहुत सारी अस्थाई व्यवस्थाएं बना ली हैं, लेकिन जिन स्थाई और दूरगामी उपायों की सबसे अधिक जरूरत पिछली आपदा से भी पहले से बताई जा रही थी, उनको लेकर न तो अभी कोई शुरुआत ही हो सकी है और न ही निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना नजर आती है. जानकारों का मानना है कि पिछली आपदा से सबक लेने की बात कहते हुए अब तक जितने भी नए कदम उठाए गए हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे हैं जिनसे यात्रा की कामचलाऊ व्यवस्था तो हो सकती है, लेकिन दूरगामी नजरिए से उनकी सफलता को लेकर ठोस दावे नहीं किए जा सकते. Read More>>

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