केजरीवाल बनाम चैनल

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इसमें शक नहीं कि मीडिया के बारे में केजरीवाल के बयान के लहजे, भाषा और भाव में बहुत कुछ आपत्तिजनक था. यह भी सच है कि केजरीवाल में अपनी आलोचना सुनने को लेकर अत्यधिक असहिष्णुता है और उसपर उनकी प्रतिक्रिया अक्सर असंयत और तिरस्कार से भरी होती है.

लेकिन क्या केजरीवाल के बयान पर चैनलों की प्रतिक्रिया भी अतिरेकपूर्ण, असंतुलित और जरूरत से ज्यादा आक्रामक नहीं थी? दूसरे, क्या केजरीवाल के आरोपों में कोई तथ्य नहीं है? यह किसी से छुपा नहीं है कि यह न्यूज मीडिया का पेड न्यूज और नीरा राडिया काल है. यह भी कि न्यूज मीडिया में बड़ी कारपोरेट पूंजी की घुसपैठ एक तथ्य है और उसका एक एजेंडा भी है. लेकिन इस हंगामे में इसे ‘पोल खोलने’ और उसपर चर्चा-बहस करने लायक नहीं समझा गया बल्कि अगर किसी ने उसे उठाने की कोशिश की तो उसे चुप करा दिया गया.

इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि केजरीवाल के बयान पर चैनलों की अतिरेक भरी और आक्रामक प्रतिक्रिया कहीं न्यूज मीडिया के अपने अंडरवर्ल्ड पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं थी? न्यूज मीडिया इन सवालों से जितना मुंह चुराने और परोक्ष रूप से अपनी काली बिल्लियों को बचाने की कोशिश करेगा, उतनी ही शिद्दत के साथ वे उसका पीछा करेंगे. केजरीवाल को न्यूज मीडिया की यह कमजोर नस मालूम है और उसे भुनाने के लिए वे गाहे-बगाहे मीडिया पर हमले करते रहेंगे. आखिर केजरीवाल का मकसद भी न्यूज मीडिया की गड़बड़ियों को दूर करना नहीं बल्कि उससे अधिक से अधिक प्रचार हासिल करना और सुर्खियों में बने रहना भर है.

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