कूटनीति बड़ी कि तमाशा !

मोदी की ताजा अमेरिका यात्रा को ही लीजिए. टीवी पत्रकारिता के सभी स्वनामधन्य संपादकों, एंकरों और स्टार रिपोर्टरों सहित चैनलों की टीमें कई दिन पहले ही अमेरिका पहुंच गईं. आप किसी स्टार संपादक/एंकर/रिपोर्टर का नाम लीजिए और पूरी संभावना है कि वे उस दौरान न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर या पार्क या ह्वाइट हाउस के आसपास ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाती भीड़ के साथ ‘नमो-नमो’ करते दिखाई दें. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, यह अब तक सबसे बड़ा मीडिया दल था जो प्रधानमंत्री के दौरे को कवर करने अमेरिका पहुंचा था और उसने प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों की 24X7 कवरेज में कोई कोर कसर नहीं उठा रखा.

लेकिन इस कवरेज में हमेशा की तरह उत्साह अधिक और तैयारी कम थी. गल्प अधिक और तथ्य कम थे. तत्व कम और तमाशा अधिक था. ऐसा लग रहा रहा था कि यह प्रधानमंत्री मोदी की नहीं रॉकस्टार मोदी की यात्रा हो. आश्चर्य नहीं कि चैनलों के स्टार पत्रकारों के पास इस यात्रा के राजनीतिक-कूटनीतिक निहितार्थों, प्रधानमंत्री और उनकी राष्ट्रपति ओबामा, इजरायली प्रधानमंत्री नेतान्याहू समेत अन्य राष्ट्राध्यक्षों, नेताओं और बड़ी कंपनियों के सी.ई.ओ से हुई मुलाकातों के बारे में तथ्यपूर्ण और ठोस जानकारियां कम थीं. जाहिर है कि घोषित बयानों/भाषणों और प्रेस रिलीज से आगे पर्दे के पीछे की कूटनीति के बारे में अनुमानों और कयासों से ही काम चलाया जा रहा था. देश ने इन मुलाकातों और शिखर वार्ताओं क्या खोया और क्या पाया- इसकी कोई बारीक तथ्यपूर्ण पड़ताल नहीं दिखी.

लेकिन चैनलों को इससे क्या लेना-देना? उनकी दिलचस्पी तो वैसे भी तमाशे में ज्यादा रहती है. जाहिर है कि यह सिर्फ संयोग नहीं था कि वहां तमाशे का भी भरपूर इंतजाम था. चैनल हमेशा की तरह उसी में खुश थे. चलिए, बजाइए ताली-हो गई वैदेशिक-कूटनीतिक रिपोर्टिंग!

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here