कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो

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2026

कॉमेडी के लिए कतई जरूरी नहीं कि आपके किरदार बेवकूफ हों. वे बेवकूफियां और गलतियां जरूर कर सकते हैं और वह हंसी पैदा करे तो ज्यादा अच्छा है. आप छोटी-छोटी बचकानी चीजों पर सब टीवी के बहुत सारे सीरियलों की तरह ठहरने लगते हैं तो बस कोफ्त ही होती है.

अंत उम्मीद से अलग है, अच्छा है, लेकिन वह भी आपके भीतर कहीं नहीं उतरता. फिल्म कहीं अपने आधार में ही जड़ों से उखड़ी हुई है. उसकी कहानी के कुछ अच्छे हिस्से हैं लेकिन ज्यादा हिस्सों में विश्वसनीयता नहीं. फिल्म के पास घटनाएं ही बहुत कम हैं और राज कुमार गुप्ता के पास वह विजन भी नहीं दिखता कि वे बिना घटनाओं के फिल्म को रोचक बना सकें.

यह सिर्फ घनचक्कर की ही नहीं, हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा की भी बड़ी समस्या है कि फिल्म अपना ट्रेलर होने की कोशिश ज्यादा करती है. उसे अपने किसी भी किरदार से ज्यादा दर्शकों की और उन्हें हंसाने की फिक्र रहती है, और चूंकि वह अपनी कहानी में उतरी ही नहीं है, इसलिए यह काम भी नहीं कर पाती.

यह याददाश्त के खोने का थ्रिलर होता और उसमें नैचुरल ह्यूमर या कुछ भी, तो कहीं बेहतर हो सकता था. लेकिन यह अपने किरदारों के प्यार तक को ठीक से नहीं पकड़ पाती. प्यार के ना होने को भी (अगर कोई कहे कि प्यार था ही नहीं). जो है, यह उसके बारे में भी बात नहीं करती और जो नहीं है, उसके न होने के बारे में भी. हां, यह कुछ भी नहीं कहती. कुछ-कुछ अपने टाइटल गीत की तरह.

-गौरव सोलंकी

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