किसानों की हुंकार

कुल मिलाकर अगर केंद्र सरकार तीनों कृषि क़ानूनों को वापस नहीं लेती है, तो आने वाला लम्बा समय भाजपा के लिए राजनीतिक दृष्टि से बेहद ख़राब हो सकता है।

 

देश के 48 फ़ीसदी परिवार कृषि पर निर्भर

देश में किसानों की दुर्दशा तब है, जब देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 14 फ़ीसदी से ज़्यादा है। यहाँ यह भी बहुत अहम है कि कोरोना महामारी के चलते बनी आर्थिक मंदी के बीच भी किसानों की हिस्सेदारी का आँकड़ा काफ़ी बेहतर रहा है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 10.07 करोड़ परिवार खेती पर निर्भर हैं। यह संख्या देश के कुल परिवारों का 48 फ़ीसदी है। राज्यों के हिसाब से देखें, तो केरल में प्रति परिवार में चार, उत्तर प्रदेश में छ:, मणिपुर 6.4, पंजाब 5.2, बिहार 5.5, हरियाणा 5.3, जबकि कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कृषि आधारित परिवार में औसतन 4.5 सदस्य हैं। कोरोना-काल में केवल कृषि ही ऐसा क्षेत्र है, जिसने देश की अर्थ-व्यवस्था को सँभाला है। लेकिन साल 2020 में ही मोदी सरकार ने महामारी के ही दौरान तीन कृषि क़ानूनों को लागू किया, जिनका किसान जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। किसानों की इस स्थिति ने यह सवाल तक उठा दिया है कि क्या सही में भारत कृषि प्रधान देश है? देखा जाए, तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगातार गिरती कृषि हिस्सेदारी, किसानों की गिरती आमदनी, क़र्ज़ में डूबे किसानों द्वारा आत्महत्याएँ, युवाओं का खेती किसानी से मोह भंग होना और जलवायु परिवर्तन से अप्रत्याशित बाढ़, सूखे ने किसानों की कमर तोडक़र रख दी है। आँकड़े बताते हैं कि भारत के 52 फ़ीसदी ज़िलों में किसानों से अधिक संख्या कृषि श्रमिकों की है। बिहार, केरल और पुदुचेरी के सभी ज़िलों में किसानों से ज़्यादा कृषि श्रमिकों की संख्या है। उत्तर प्रदेश में 65.8 मिलियन (6.58 करोड़) आबादी कृषि पर निर्भर है; लेकिन कृषि श्रमिकों की संख्या 51 फ़ीसदी और किसानों की संख्या 49 फ़ीसदी है। सरकार भले ही 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बातें करती है; लेकिन ऐसा कोई सरकारी आँकड़ा हमारे सामने नहीं है, जो यह बता सके कि किसानों की आमदनी हुई कितनी? किसान नेता आँकड़ों सहित बताते रहे हैं कि हाल के वर्षों में कृषि लागत इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि किसानों की आमदनी हक़ीक़त में कम हुई है। आमदनी घटने से किसानों की नयी पीढ़ी का किसानी से मोह भंग हुआ है। इसका नतीजा यह हुआ है कि कॉरपोरेट खेतों को खा रहा है। किसान इसीलिए तीन कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कार्पोरेट बचे खेतों को भी खा जाएगा।

 

किसान आन्दोलनों ने बदली हैं सत्ताएँ

सिर्फ़ उत्तर प्रदेश की ही बात की जाए, तो किसान आन्दोलन सत्ता बदलने का बड़ा माद्दा रखते रहे हैं। इसलिए अब जब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, मुज़फ़्फ़रनगर में महापंचायत कर किसानों ने सीधे भाजपा को ललकार कर अपनी ताक़त का संकेत तो दे दिया है। यदि पिछले तीन दशक का इतिहास देखें, तो ज़ाहिर होता है कि मुज़फ़्फ़रनगर में किसान महापंचायतें सत्तारूढ़ दलों की क़ब्रगाह साबित होती रही हैं। इतिहास देखें तो ऐसी महापंचायतों की शुरुआत सन् 1987 में हुई थी। सन् 1988 से लेकर सन् 2013 तक मुज़फ़्फ़रनगर में हुई महापंचायतों ने सूबे की राजनीति ही प्रभावित नहीं हुई, सरकारें भी बदल गयीं। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) का जन्म ही मुज़फ़्फ़रनगर में हुआ, जिसने समय के साथ पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश पर प्रभाव बना लिया। महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में अगस्त, 1987 में मुज़फ़्फ़रनगर के सिसौली में हुई महापंचायत एक बड़े आन्दोलन का आधार बन गयी। किसानों की माँग बिजली और सिंचाई की दरें घटाने के अलावा फ़सल के उचित मूल्य की थीं। टिकैत के नेतृत्व में 35 माँगों पर कांग्रेस की सरकार से टकराव हुआ। किसानों ने जनवरी, 1988 में दिल्ली के वोट क्लब में धरना दिया। इसके बाद सन् 1989 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के चुनाव में कांग्रेस को बड़ा नुक़सान झेलना पड़ा और सत्ता से दोनों जगह हाथ धोना पड़ा। इसके बाद फरवरी, 2003 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भाकियू ने सीधे मायावती सरकार को ललकारते हुए बड़ी महापंचायत की। बाद में एक धरना हुआ, जिस पर पुलिस ने लाठियाँ भाँज दीं। इसके विरोध में हुई महापंचायत में लाखों किसान जुट गये। नतीजा यह हुआ कि साल बाद मायावती के विधायकों की बग़ावत से उनकी सत्ता चली गयी। मुलायम सिंह यादव ने इन विधायकों की मदद से अजित सिंह के रालोद के समर्थन से सरकार बना ली। मायावती का पीछा किसानों ने सन् 2008 में भी नहीं छोड़ा। बिजनौर में टिकैत की मायावती के ख़िलाफ़ जातिसूचक टिप्पणी के बाद टिकैत को गिरफ़्तार करने के आदेश हुए; लेकिन किसानों ने टिकैत के घर जाने वाली सभी सडक़ों को बन्द कर दिया। हालाँकि चार दिन के बाद टिकैत की गिरफ़्तारी हुई और इसके बाद बसपा सरकार के ख़िलाफ़ महापंचायत की गयी। इसमें भी किसानों ने टिकैत के नेतृत्व में सीधे बसपा सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने का संकल्प किया और सन् 2012 के चुनाव में मायावती सत्ता से बाहर हो गयीं। मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के ही चर्चित कवाल कांड के बाद महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत ने सितंबर, 2013 में जाटों की बड़ी महापंचायत की। यह माना जाता है कि नंगला मंदौड की यह पंचायत जाट-मुस्लिम जंग की वजह बनी, जिससे पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय के आक्रोश ने 2017 में सपा की सत्ता छीन ली। इसके बाद ही भाजपा सत्ता में आयी। अब सितंबर, 2021 में मुज़फ़्फ़रनगर में किसानों की महापंचायत में सीधे भाजपा के ख़िलाफ़ किसानों ने बिगुल फूँक दिया है। यह स्थिति सन् 1987 की याद दिलाती है, जब केंद्र में राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी, जबकि राज्य में भी कांग्रेस के सरकार थी। अब फिर केंद्र के साथ-साथ कई राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और किसानों ने विद्रोही तेवर अपना लिये हैं। ज़ाहिर है भाजपा किसानों के इन तेवरों से रक्षात्मक है।

 

“सिर्फ़ खेती-किसानी नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों के निजीकरण, बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर भी केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आन्दोलन करना होगा। अडिय़ल सरकार को झुकाने के लिए वोट की चोट ज़रूरी है। देश बचेगा, तभी संविधान बचेगा। सरकार ने रेल, तेल और हवाई अड्डे बेच दिये हैं। किसने सरकार को यह हक़ दिया। ये बिजली बेचेंगे और प्राइवेट करेंगे। सडक़ बेचेंगे और सडक़ पर चलने पर हम लोगों से टैक्स (कर) भी वसूलेंगे। दिल्ली बॉर्डर पर भले हमारी क़ब्रगाह बन जाए, जब तक हमारी माँगें नहीं मानी जाएँगी, तब तक हम वहाँ डटे रहेंगे। वहाँ से नहीं हटेंगे। अगर वहाँ पर हमारी क़ब्रगाह बनेगी, तो भी हम मोर्चा नहीं छोड़ेंगे। बग़ैर जीते वापस घर नहीं जाएँगे।“

राकेश टिकैत

संयुक्त किसान मोर्चा के नेता

 

 

@RahulGandhi

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किसानों पर क़र्ज़ का बोझ

हाल में पंजाब की अमरिंदर सिंह सरकार ने किसानों के 590 करोड़ रुपये के क़र्ज़ को माफ़ करने की घोषणा की थी। क़र्ज़ माफ़ी मज़दूरों और भूमिहीन कृषक समुदाय के लिए कृषि ऋण माफ़ी योजना के तहत है। पंजाब सरकार का कहना है कि उसने इस योजना के तहत अब तक 5.64 लाख किसानों का 4,624 करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया है। छत्तीसगढ़ सहित कुछ अन्य राज्यों में भी किसानों के क़र्ज़ माफ़ करने की घोषणाएँ हुई हैं। लेकिन एक सच यह भी है कि किसानों पर इस समय 16.8 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ है।

ये आँकड़े सरकार के हैं, जो अगस्त में एक सवाल के लिखित जवाब में संसद में पेश किये गये थे। इनके मुताबिक, क़र्ज़ में सबसे ज़्यादा तमिलनाडु के किसान हैं। वहाँ किसानों पर 1.89 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ है। संसद में पेश किये गये विवरण (डाटा) के मुताबिक, अग्रणी (टॉप) पाँच राज्यों में तमिलनाडु के किसानों पर 1,89,623.56 करोड़ रुपये, आंध्र प्रदेश के किसानों पर 1,69,322.96 करोड़ रुपये, उत्तर प्रदेश के किसानों पर 1,55,743.87 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र के किसानों पर 1,53,658.32 करोड़ रुपये, कर्नाटक के किसानों पर 1,43,365.63 करोड़ रुपये का क़र्ज़ है। जहाँ तक क़र्ज़ वाले बैंक खातों की बात है, तो अग्रणी पाँच राज्यों में तमिलनाडु के 1,64,45,864 खाते, उत्तर प्रदेश के 1,43,53,475 खाते, आंध्र प्रदेश के 1,20,08,351 खाते, कर्नाटक के 1,08,99,165 खाते, महाराष्ट्र के 1,04,93,252 खाते हैं। कम क़र्ज़ वाले अग्रणी पाँच राज्यों की बात करें, तो दमन और दीव के किसानों पर 40 करोड़ रुपये, लक्षद्वीप के किसानों पर 60 करोड़ रुपये, सिक्किम के किसानों पर 175 करोड़ रुपये, लद्दाख़ के किसानों पर 275 करोड़ रुपये और मिजोरम के किसानों पर 554 करोड़ रुपये का क़र्ज़ है। कम क़र्ज़ के किसान खातों वाले अग्रणी पाँच राज्यों में दमन और दीव के 1,857 खाते, लक्षद्वीप के 17,873 खाते, सिक्किम के 21,208 खाते, लद्दाख़ के 25,781 खाते, जबकि दिल्ली के 32,902 खाते शामिल हैं।