किसके सहारे बहुजन?

वहीं दूसरी ओर बहुजन आन्दोलन से निकली बसपा ने इस बार अंबेडकर जयंती पर बड़े पैमाने पर हर सम्भाग में कार्यक्रम आयोजित किये। इस दौरान लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में बसपा प्रमुख मायावती ने बड़े तल्ख़ लहज़े में कहा कि जातिवादी सरकारें उपेक्षित वर्ग के नेताओं को अपने समाज का भला करने की छूट नहीं देती हैं। दलितों के लिए यदि कोई कुछ करने का प्रयास करता है, तो उसे भी दूध की मक्खी की तरह निकालकर बाहर कर दिया जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी से पहले कांग्रेस ने, ख़ासकर इंदिरा गाँधी ने दलितों को अपने साथ लेने की राजनीति की थी। यह वो दौर था, जब दलितों का अपना कोई नेता केंद्र सरकार में ही नहीं, राज्यों में भी उतने क़द का नहीं था, जो कि उनका प्रतिनिधित्व कर सके। पिछड़ों के तो कई नेता तब तक केंद्र की राजनीति में आ चुके थे; लेकिन अंबेडकर के बाद दलितों का ऐसा कोई नेता केंद्र में नहीं था, जो ईमानदारी से उनके हक़ की लड़ाई लड़ सके। इक्का-दुक्का नेता राज्यों में था भी, तो वो या तो बड़े क़द का नहीं था या अपने स्वार्थों की पूर्ति में लग गया था। ऐसे में दलितों के पास कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नहीं था और स्वाभाविक तौर पर वो कांग्रेस की तरफ़ लम्बे समय तक झुके रहे। लेकिन जैसे ही उन्हें कांशीराम जैसा सच्चा दलित हितैषी नेता मिला उनका कांग्रेस से मोहभंग होने लगा। इतना ही नहीं, कांशीराम ने पिछड़ों का भी ध्यान अपनी ओर खींचा और उनका कांग्रेस से काफ़ी हद तक मोहभंग कराया। अब दलितों की राजनीति में कई पार्टियाँ कूद पड़ी हैं और वो उन्हें अपने ख़ेमे में करने में लगी हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नेता और इनकी पार्टियाँ दलितों और पिछड़ों को वो सब दे सकेंगे, जो करने का सपना इन वर्गों के लिए बाबा साहब डॉ. अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम ने देखा था? यह सवाल इसलिए भी ज़रूरी है कि जब राजनीति की फिसलन भरी ज़मीन पर आने के बाद ख़ुद मायावती, जो कि ख़ुद दलित और पिछड़े वर्ग से हैं, उनका ख़याल नहीं रख सकीं, तो दूसरों से इन वर्गों के लिए क्या उम्मीद की जा सकती है? सवाल यह भी है कि मायावती के बाद क्या दलितों और पिछड़ों को कोई ऐसा नेता मिल सकेगा? जो उनकी समस्याओं के लिए जूझ सके, उनके हक़ उन्हें दिलवा सके? हालाँकि अब तक इस मामले में तक़रीबन सभी दलित नेता फेल ही रहे हैं; लेकिन मायावती से एक दौर में उम्मीद थी कि वह बहुजनों के हक़ दिलवाकर रहेंगी। हालाँकि अब इस तरह की उम्मीद करना व्यर्थ ही है; क्योंकि मायावती अब दलितों के मुद्दों और देश में हो रही राजनीति पर ख़ामोश ज़्यादा रहती हैं। एक और दलित नेता इन दिनों उत्तर प्रदेश में उभरकर सामने आया है और वह हैं चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’। चंद्रशेखर दलित युवाओं के काफ़ी प्रिय नेता हैं; लेकिन मायावती के क़द को वह न तो छू सके हैं और न भविष्य में इसकी सम्भावना दिखती है। इसकी एक वजह यह है कि चंद्रशेखर राजनीतिक पैंतरेबाज़ी में अभी उतने मंजे हुए खिलाड़ी नहीं हैं, जितनी की मायावती। दूसरी वजह यह है कि चंद्रशेखर की पहचान पूरे प्रदेश में भी अभी नहीं बन सकी है, जबकि मायावती की छवि राष्ट्रीय स्तर की है। लेकिन अब दलित और पिछड़े वोट बैंक पर सबसे ज़्यादा क़ब्ज़ा सत्ताधारी दल भाजपा का है, जो कि प्रधानमंत्री मोदी की वजह से है। यह अलग बात है कि आज की राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प ठीक उसी तरह दिखायी नहीं दे रहा है, जिस तरह एक दौर में इंदिरा गाँधी का कोई विकल्प नज़र नहीं आता था।

ख़ैर यह तो राजनीतिक दाँव-पेच की बातें और समय का फेर है। कहा जाता है कि राजनीति में अगले पल क्या होगा? यह भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। हर कोई मौक़े की नज़ाकत देखकर चाल चलता है और उसका फ़ायदा उठाता है। रही बात जातिगत खेल की, तो यह तो राजनीतिक लोगों का बहुत पुराना पैंतरा रहा है। सच तो यह है कि आम लोगों को उन्हीं की जाति के नेता धोखा देते रहते हैं और लोग भी अपनी जाति के नेताओं के नाम की माला जपते रहते हैं। जिस दिन यह बात लोगों की समझ में आ गयी, उस दिन लोग जाति देखकर नहीं, बल्कि ईमानदारी और क़ाबिलियत देखकर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। फिर चाहे वे दलित हों, या पिछड़े हों या सवर्ण हों।

(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं।)