‘काश उसने गले लगा लिया होता’

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एम. दिनेश

हमारी प्रेम कहानी एकदम फिल्मी थी. वही पहली नजर का प्यार. शायद यही वजह थी कि मन के किसी कोने में एक उम्मीद थी कि इस कहानी का अंत भी ज्यादातर हिंदी फिल्मों की तरह ही होगा, सुखद. हमने बहुत नहीं सोचा था प्यार करने के पहले, लेकिन एक बार प्यार हो जाने के बाद जरूर हमने आगे सोचना आरंभ किया. यही वजह थी कि मैंने ऐसे पत्रकारिता संस्थान में दाखिला ले लिया जो नौकरी दिलाने का वादा भी करता था. मैं थोड़ी हड़बड़ी में इसलिए भी था कि उसके घरवाले लड़का तलाश रहे थे. किस्मत और मेहनत रंग ला रही थी. संस्थान में दाखिला भी हो गया. लग रहा था कि अब सब कुछ एकदम ठीक हो जाएगा, लेकिन हिंदी फिल्मों की तर्ज पर नाटकीय मोड़ आना ही था सो आया. कोर्स में दाखिला लेने के एक महीने के भीतर ही उसकी शादी तय हो गई.

वह बहुत घबराई हुई थी. बल्कि हम दोनों ही बहुत घबराए हुए थे. जी में आ रहा था कि अभी भागकर शादी कर लें. लेकिन नौकरी नहीं थी और इसी वजह से मैं पीछे हट गया. मैं बार-बार उसे और खुद को समझाता रहा कि ‘जो भी होगा अच्छा होगा’. दोनों की बात भी हुई कि शादी की बात अपने-अपने घरों में करें लेकिन हर बार हमारी कोशिश जाति, उम्र, हैसियत, बेरोजगारी जैसी वजहों की भेंट चढ़ जाती. वक्त बहुत तेजी से हाथ से निकल रहा था. मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई और कोर्स छोड़कर कॉल सेंटर में नौकरी करने की सोची. लेकिन प्यार के रास्ते पर पहले चल चुके कुछ अनुभवी लोगों ने इससे होने वाले नुकसान को इतना बड़ा करके बताया कि मैं इस दिशा में भी आगे नहीं बढ़ सका. हमारी हालत सांप छछूंदर की हो चली थी. प्यार तो हमने कर लिया था लेकिन उसके आगे की बातें हमने नहीं सोची थीं. यही वजह थी कि प्यार के सफर पर निकल जाने के बाद जब बात शादी की आ रही थी तो कभी उसे अपने भाई-बहन की शादी का डर सता रहा था तो कभी मुझे परिवार की इज्जत और भविष्य की चिंताओं का.

समय ऐसे बीत रहा था जैसे वह काले तेज घोड़े पर सवार हो. रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. रुकता भी तो कैसे उसका काम ही है लगातार चलना. शादी की तारीख आ रही थी और बेबसी, बेचैनी की अजीब-सी भावनाओं ने मन में घर बना लिया था. ऐसी परिस्थितियों में दोस्त सबसे अच्छे और अनोखे विकल्प देते हैं. मुझे भी कई सुझाव मिले. उसकी शादी का दिन आते-आते हर बड़े से छोटे मंदिर तक नंगे पांव जाने और 101 रुपये का प्रसाद चढ़ाने का वादा भगवान से मैं कर चुका था पर महंगाई के इस दौर में 101 रुपये से होता क्या है तो शायद भगवान को भी यह मंजूर नहीं था. निराश होकर मैंने नास्तिकता और वास्तविकता की ओर कदम बढ़ा दिए. शादी तय होने से लेकर शादी के दिन तक लड़के का फोन नंबर और पता फेसबुक से निकालकर कुछ जुगत भिड़ाने की कोशिश भी नाकाम रही थी. उसकी शादी वाला पूरा दिन मैंने मंदिर में ही बिताया. कुछ उम्मीदें शायद अभी बाकी थीं, हालांकि सूरज ढलने के साथ उनमें भी तेजी से कमी आ रही थी. हिंदी फिल्मों को मैंने अपनी जिंदगी में कुछ ज्यादा ही उतार रखा था, इसलिए शाम होते ही आखिरी सलाम करने पहुंच गया मैरिज हॉल. दुल्हन के तैयार होने वाले कमरे में किसी तरह पहुंचकर उसे बोल दिया कि मैं स्टेज पर आऊंगा तू मुझे गले लगा लियो, मेरी थोड़ी पिटाई तो पड़ेगी लेकिन सब ठीक हो जाएगा. शादी कैंसिल हो जाएगी. इतना कहकर मैं तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गया. मेरा जोश दोबारा जाग चुका था. अब यह मेरा ब्रह्मास्त्र था. जयमाल होते ही मैं पहुंच गया स्टेज पर. मन में ब्रह्मास्त्र के चलने के बाद पिटने का डर तो था पर साथ में सफलता की उम्मीद भी. स्टेज पर उसके करीब पहुंचा तो उम्मीद थी कि वह गले लगा लेगी, मैंने इशारा भी किया लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था. पर कुछ मिनट रुकने के बाद फोटोग्राफर ने कहा भैया अब उतर भी जाओ. एक झटके में मैं अपनी सपनीली फिल्मी दुनिया से हकीकत में आ चुका था. वह किसी और की दुल्हन बन चुकी थी. पता नहीं किसी ने उसे मुझसे छीन लिया था या मैंने अपनी बर्बादी की यह दास्तान खुद लिखी थी.

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