कांग्रेस के ‘छत्तीस’गढ़

इस पर जोगी सहमत नहीं थे. उन्होंने पदयात्रा निकालकर इसका विरोध किया और राज्य सरकार का फैसला खटाई में पड़ गया. तब से शुरू हुई राजनीतिक दुश्मनी इन दोनों के बीच अभी तक जारी है. इसकी एक बानगी अभी हाल के दिनों में तब देखने को मिली जब दिग्विजय सिंह नक्सली हमले में मृत नेताओं को श्रद्धांजलि देने छत्तीसगढ़ पहुंचे.

यहां कांग्रेस भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में जोगी ने सिंह को बाहरी नेता बताकर उनके इलाके राघोगढ़ को तुकबंदी में जोड़ते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ का भला छत्तीसगढ़ के नेता ही कर सकते हैं, प्रतापगढ़ और फतेहगढ़ के नेता नहीं. सिंह ने भी पलटवार करते हुए जवाब दिया कि उनका विरोध वे लोग ही कर सकते हैं जो भाजपाई हैं या नक्सली. गौरतलब है कि चरणदास महंत दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते हैं. ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि महंत के कार्यवाहक अध्यक्ष रहते हुए जोगी गुट को राज्य कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका से दूर ही रखा जाएगा.

G2जोगी पर नजर
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि जोगी पर उनके समर्थक नई पार्टी गठित करने के लिए दबाव बनाए हुए हैं. जबकि बदले हुए राजनीतिक समीकरण के मद्देनजर जोगी के एक करीबी नेता का दावा है कि उनसे बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के आला नेता लगातार संपर्क बनाए हुए हैं. हालांकि तमाम चर्चाओं पर पूर्व मुख्यमंत्री तहलका से बात करते हुए साफ कहते हैं, ‘मेरा कांग्रेस छोड़ने का कोई इरादा नहीं है. लेकिन सक्रिय राजनीति में जब उतार-चढ़ाव का दौर आता है तो समर्थकों के बीच सही और गलत फैसलों को लेकर मंथन चलता ही है.’ क्या महंत की नियुक्ति से कांग्रेसियों में असंतोष है, यह पूछे जाने पर जोगी वर्तमान अध्यक्ष के बजाय नंदकुमार पटेल की तारीफ करते हुए कहते हैं, ‘पटेल के भीतर संघर्ष का माद्दा सिर्फ इसलिए था क्योंकि उन्होंने अपने आस पास कभी व्यापारी और बदनाम लोगों को भीड़ एकत्रित नहीं की. वे जितने सरल और सहज थे उनके आस पास भी उतने ही सरल-सहज और जुझारू लोग मौजूद रहते थे.’

दरअसल पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी के काफिले पर नक्सलवादी हमले के बाद राज्य में ऐसी अफवाहें उड़ी थीं कि इसमें जोगी का हाथ है. दिलचस्प बात थी कि इस बारे में सबसे ज्यादा सवाल कांग्रेस पार्टी की ओर से ही उठाए गए. जोगी के एक विश्वासपात्र बताते हैं, ‘यह पार्टी के सामने जोगी को खलनायक दिखाने का खेल था. कांग्रेस के बाकी गुटों का मानना था कि पटेल के बाद जोगी या उनके किसी समर्थक को अध्यक्ष बनाया जा सकता है इसलिए उन्हें बदनाम करके पार्टी से बाहर कर दिया जाए.’ तो क्या इस गुटीय लड़ाई में जोगी का पार्टी से बाहर होना कांग्रेस के लिए सामान्य घटना होगी? वरिष्ठ पत्रकार विक्रम जनबंधु कहते हैं, ‘छत्तीसगढ़ में जोगी का व्यापक जनाधार है, यह बात उनके राजनीतिक विरोधी भी स्वीकारते हैं. उनके पार्टी छोड़ने या अन्य संभावनाओं को तलाशने से कांग्रेस को निर्णायक नुकसान उठाना पड़ सकता है.’

दरअसल अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के कुछ फीसदी वोटों पर जोगी की अपनी पकड़ आज भी  कायम है. ऐसे ही कुछ फीसदी वोटों के चलते महंत और वोरा गुट से जुड़े लोगों के भीतर जोगी के हस्तक्षेप का एक डर बना हुआ है. इन गुटों के कई नेताओं का विचार है कि जोगी चुनाव में जीत तो नहीं दिलवा सकते लेकिन उनके समर्थकों की परोक्ष अथवा अपरोक्ष कोशिश किसी जीत को हार में जरूर बदल सकती है.

नेताओं की हार के बारे में जोगी का अपना नजरिया है. वे कहते हैं, ‘भीतरघात जैसा शब्द उन लोगों का गढ़ा हुआ है जिनका अपना कोई जनाधार नहीं होता.’ जोगी आगे कहते हैं, ‘प्रदेश अध्यक्ष रहे धनेंद्र साहू चुनाव हारे. हाल में ही कार्यक्रम समन्वयक बनाए गए भूपेश बघेल को पहले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा. यहां तक कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा अपने पुत्र अरुण वोरा की जीत सुनिश्चित नहीं कर सके तो इन नेताओं को समझ लेना चाहिए कि जनता के बीच उनका जनाधार कितना कमजोर है.’ नंदकुमार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस यह साबित कर चुकी है कि वह यहां दमदार विपक्ष है. लेकिन हाल की गुटबाजी से यह भी साबित हो रहा है कि राज्य में अपने अतीत की तरफ कांग्रेस कभी भी लौट सकती है.

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