कहानी उस दुर्लभ साहसी बेटी की | Page 2 of 2 | Tehelka Hindi

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कहानी उस दुर्लभ साहसी बेटी की

वह ऐसे पीडि़तों के अधिकारों की रक्षा करने से कभी डरी नहीं। कभी-कभी अपने जीवन को खतरे में डालने की कीमत पर भी उन्होंने चरमपंथी तत्वों से लोहा लिया। उन लोगों के लिए सहायता प्रदान करने के लिए उसकी निर्विवाद प्रतिबद्धता की वजह उनकी यह सोच भी थी कि सत्य का किसी भी कीमत पर बचाव किया जाना चाहिए।

आसमां का लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अतृप्त प्रेम था जिसके लिए वह जनरल जि़या-उल-हक और जनरल परवेज़ मुशर्रफ जैसे कू्रर सैन्य तानाशाहों को भी चुनौती दे सकीं। उन्होंने इन शासकों के हर प्रकार के प्रलोभनों की पेशकशों को अस्वीकार कर दिया, और कभी इसके नतीजों को लेकर घबराई नहीं। उन्होंने जनरल जिया के शासनकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए पूरी ताकत झोंक दी। उन्होंने उत्साहपूर्वक उस समय जनतंत्र की बहाली के लिए मार्च में हिस्सा लिया। इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी जब तानाशाह सरकार ने 1983 में उन्हें कैद में डाल दिया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और सैन्य तानाशाही के खिलाफ मुखर रहीं।

उतने ही ज़ोरदार तरीके से वे बर्खास्त मुख्य न्यायाधीश इफ्तिरखार चौधरी की बहाली के लिए लड़ीं। जनरल परवेज मुशर्रफ की अध्यक्षता वाली तानाशाह सरकार के खिलाफ वकीलों की लड़ाई में भी वे मुखर हो कर सामने आईं। आश्चर्य की बात नहीं कि मुशर्रफ शासन के दौरान 2007 में उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया गया। जब उन्हें कैद से मुक्त किया गया था उसने 2012 में आरोप लगाया था कि पाकिस्तान का खुफिया नेटवर्क उनकी हत्या करना चाहता था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जासूसी एजेंसियां पूरी तरह पाकिस्तान में ’लापता लोगोंÓ के मुद्दे के लिए जिम्मेदार है।

उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि कौन उनकी गतिविधियों से खुश है और कौन नाखुश।

उनके प्रशंसकों को समाज के हर वर्ग में पाया जा सकता है। न केवल पाकिस्तान में बल्कि दक्षिण एशिया भर में। अगर वह सैन्य प्रतिष्ठान की निर्वाचित सरकारें गिराने की मुख्य आलोचक रहीं तो वह न्यायिक सिस्टम के एक्टिविज़्म के भी विरोध में भी थी क्योंकि उनका मानना था कि इससे न्याय प्रणाली को नुकसान पहुंचा है। यही कारण है कि वे कई अवसरों पर पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना से भी पीछे नहीं हटी।

आसमां ने पनामा पत्रों के मामले में नवाज शरीफ को अयोग्य घोषित करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोध किया और कहा कि इसका कोई औचित्य नहीं था। आसमां ने 2014 में लाइवलीहुड अवार्ड, 2010 में फ्रीडम अवार्ड, 2010 में ही हिलाल-ए-इम्तियाज़ और सितारा-ए-इम्तियाज जैसे प्रतिष्ठित अवार्ड जीते। यह अवार्ड उनके काम और उसके प्रति उनकी निष्ठा को प्रतिविम्बित करते हैं। उनके जैसे व्यक्ति जिसने अपने विचारों को व्यक्त करने में कभी संकोच नहीं किया, का अब पाकिस्तान मे मिलना मुश्किल है। कवि इकबाल ने कहा था,’ हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है, बड़ी मुश्किल से होता चमन में दीदावर पैदा’।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 10 Issue 06, Dated 31 March 2018)

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