कविता पर कुछ सवाल और समकालीन कविता | Page 2 of 2 | Tehelka Hindi

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कविता पर कुछ सवाल और समकालीन कविता

‘वागर्थÓ पत्रिका ने ’लॉन्ग नाइंटीजÓ नाम से एक बहस शुरू की जो कविता की ऐतिहासिक यात्रा को सूचित करती है। यहां Ó90 के दशक के रचनाकारों के अवदान की चर्चा की गई। सबाल्टर्न की पक्षधरता और स्वर के उभरते और विकसित होने के सन्दर्भ में Ó90 के दशक के अवदान को महत्व दिया गया।

इस लिहाज से तीन बड़े रूपों में समकालीन कविता समझी जा सकती है-

1. विरोध और जन समर्थन की कविता

2. समानांतर काव्य संसार का सृजन

3. दलित एवं स्त्री कविता

उदाहरण के रूप में आलोक धन्वा की कविता व्यवस्था के विरोध में स्वर बुलंद करती है। उनके लिए कविता-कविता नहीं ’गोली दागने की तमीज है।Ó आलोक धन्वा सामाजिक और मानवीय प्रतिबद्धता का जि़क्र करते हुए वाल्ट ह्विटमैन, टॉलस्टॉय, गोर्की, कामू से लेकर त्रिलोचन, मुक्तिबोध और केदारनाथ अग्रवाल का उल्लेख करते हैं। वे कविता को ’एक बिलकुल नई बन्दूक की तरहÓ याद करते हैं जो शब्दों के फेफड़ों में नए मुहावरों का ऑक्सीजन भरती है-

 

अब मेरी कविता एकली रही जन की तरह बुलाती है,

भाषा और लय के बिना, केवल अर्थ में उस गर्भवती औरत के साथ-

जिसकी नाभि में सिर्फ इसलिए गोली मार दी गई-

कि कहीं एक ईमानदार आदमी पैदा न हो जाए।

 

अरु ण कमल व्यक्ति और समाज दोनों को अभिन्न मानते हैं। नए इलाके में वे लिखते हैं– ’कविता निर्बलों का बल है। कविता उसका पक्ष है जिसका कोई नहीं, जो सबसे कमज़ोर और सबसे आशय है, जिस पर बाकी सबका बोझ है।Ó जीवन के छोटे छोटे उदाहरण लेकर साधारण आदमी के जीवन में होने वाले कष्टों और निर्बल के बलहीन होने की त्रासद कथा को वे कविता के माध्यम से दिखाते हैं। जीवन की विवशता को वे सपाटबयानी से दिखाते हैं-

‘कहते हैं एक चोर सेंधमार घर में घुसा/इधर उधर टो-टा किया और जब कुछ न मिला/तब चुहानी में रक्खा बासी भात और साग खा/थाल वहीं छोड़ भाग गया/वो तो पकड़ा ही जाता यदि दबा न ली होती डकार।Ó

दूसरी ओर पर्यावरणीय सरोकार, प्रेम की इच्छा और बच्चों के प्रति चिंता भी इस कविता के केंद्र में है। पिता के प्रेम और माँ को पत्र न लिख पाने की पीड़ा भी मौजूद है। मंगलेश डबराल की कविता में ’पहाड़Ó का दर्द मौजूद है, ठेठ स्थानीयता भी। राजेश जोशी वृक्षों का प्रार्थना गीत सुनते हैं, चाँद की आदतों की बात करते हैं,नन्ही मुनिया की गुनगुनाहट पर कविता लिखते हैं। कामगार बच्चों पर लिखी उनकी कविता का दर्द हर जगह बयां हुआ है-

कितना भयानक होता, अगर ऐसा होता/भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह/कि सारी चीज़ें है हस्बेमामूल/पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए/बच्चे, बहुत छोटे बच्चे, कम पर जा रहे हैं।

असल में दुनिया चाह कर भी सरोकारों से अलग नहीं हो सकती। कभी कभी कविता ’पानी की प्रार्थनाÓ भी सुनती है और बाबूजी का दर्द भी पर उसके मूल में भी मानवीय संवेदना ही है। केदारनाथ सिंह की कविता में पानी स्वयं को पृथ्वी का सबसे प्राचीन नागरिक बताते हुए बाज़ार में बिकने की पीड़ा को व्यक्त करता हैं और उस पर भी तकलीफ यह कि दुनिया से पानी लुप्त होने और सिर्फ बाज़ार में मिलने में ईश्वर की सहमति है—

‘पर अपराध क्षमा हो प्रभु/और यदि मैं झूठ बोलूँ /तो जलकर राख हो जाऊँ/कहते है इसमें—/आपकी भी सहमति हैं।Ó

स्त्री कविता ने घर की देहरी के भीतर छिपे दर्द को कविता के भीतर उकेरा। निर्मला पुतुल ’अखबार बेचती लड़कीÓ या ’गजरे बेचती लड़कीÓ के माध्यम से लड़की के बिकने की तकलीफ बयाँ करती हैं-

 

वह इस बात से अंजान है कि वह अखबार नहीं

अपने आप को बेच रही है

क्योंकि अखबार में उस जैसी

कई लड़कियों की तस्वीर छपी है

जिससे उसका चेहरा मिलता है!

 

अनामिका ’चौकाÓ के बहाने औरत के गुँथ जाने और आटे के भीतर खुद को सानते जाने की भावना को स्वर देती हैं। रजनी तिलक स्त्री और दलित स्त्री के बीच के फर्क को भी कविता का विषय बनाती है- जहाँ वह मानती है और बताती है कि एक जाति की स्त्री पायलट बनती है तो दूसरी शिक्षा से भी वंचित है…

बंटी वह भी जातियों में/औरत औरत मेें अंतर है…

असल में समकालीन कविता के विषयों में बहुत अधिक वैविध्य है। रघुवीर सहाय की कविता का ठंडा क्रोध समकालीन है तो मुक्तिबोध की परम अभिव्यक्ति की खोज भी। राजकमल चौधरी का ’मुक्ति प्रसंगÓसमकालीन है और राजेश जोशी की आठवें दशक की कविता भी। नौवें दशक की बाजार से संघर्ष की कविता भी समकालीन है और दलित कविता और स्त्री कविता भी। कुंवर नारायण की ’प्रेम का रोगÓ कविता भी समकालिक है जहां कवि किसी धर्म से नफरत नहीं कर पाता क्योंकि कहीं से गालिब याद आते हैं तो कहीं शेक्सपियर…. कविता अपने युग धर्म का निर्वाह लगातार कर रही है और दायरों का विस्तार भी। अब महाकाव्य भले ही नहीं लिखे जा रहे, कविताओं की प्रकृति बदली है। कविताएँ लघु भी हुई और सपाटबयानी से युक्त भी, पर यह समझना होगा कि कविता जन के और अधिक निकट आ गई है। अब यह मुक्तिपथ नहीं दिखाती, स्वयं अपना मुक्ति दाता बनना सिखाती है। कविता ’हरी भई भूमि सीरी पवन चलन लागीÓ से आगे बढ़कर ’मोचीरामÓ से गुज़र कर ’नए इलाके मेंÓ प्रवेश कर चुकी है जहां देहरी लांघें की कविताएं भी हैं,बदलाव और प्रतिबद्धता भी है, नए और अछूते विषय भी हैं और बाजारवाद के विरोध में कविता की उर्वरता भी है। कविता की इस लम्बी यात्रा को एक लेख में समेटना मुश्किल है पर अनेक संकेत यहां उसकी एक झलक प्रस्तुत करते हैं।

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