कला अनमोल, मिट्टी के मोल

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अलीम हमें यह भी बताते हैं कि ये कलाकृतियां कैसे बनती हैं. पहले पुराने पीतल को लाकर उसे भट्टी में डाला जाता है. फिर उसे तोड़कर उसके छोटे टुकड़े या चूर्ण बनाया जाता है. उसके बाद धूमन, सरसों का तेल और मोम को मिलाकर एक खास किस्म का धागा बनता है. ऐसे धागों से मिट्टी पर डिजाइन तैयार किया जाता है. फिर मिट्टी के सांचे पर बने डिजाइन के ऊपर मिट्टी की एक और तह चढ़ाई जाती है. फिर उसके ऊपरी भाग पर एक छोटा-सा छेद छोड़कर उसके ऊपर पीतल को एक कटोरेनुमा मिट्टी के पात्र में डालकर उसे भी मिट्टी में ही बंद कर दिया जाता है. ऐसा आकार बनाया जाता है कि पीतल पिघलकर मोम वाले भाग में स्वत: पहुंच जाए. फिर उसे भट्टी में डाल दिया जाता है. गर्मी से पिघलकर पीतल मोम वाले हिस्से से डिजाइन के चारों ओर फैल जाता है. तैयार डिजाइन वाला धागा गल जाता है और उसकी जगह पिघला हुआ पीतल ले लेता है. यह उस जमाने की तकनीक है जब कला विशुद्ध रूप से इंसानी हुनर थी, मशीन के हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त.

सवाल उठता है कि आखिर क्यों इतनी मेहनत से बनी कलाकृतियों के लिए कलाकार को कम पैसे मिलते हैं जबकि बाजार में यह मुंहमांगे दामों पर बिकती है. अलीम बताते हैं कि इन्हें बनाने के बाद पॉलिश करनी होती है. गांव में बिजली नहीं होने के कारण बिना पॉलिश किए ही इनको बाजार में बेचना पड़ता है. ऐसी हालत में एक घुंघरू 10 रुपये में तो कान के फूल और गले के हार 25 से 30 रुपये में बिक पाते हैं. खरीदने वाले इसे मशीन से पॉलिश करवाते हैं और तत्काल इसकी कीमत में 10 से 20 गुना इजाफा हो जाता है. अगर बिजली का बंदोबस्त हो जाए तो पॉलिश करने वाली मशीन खरीदने के लिए भी काफी पैसों की जरूरत होगी.

इस समुदाय के लोगों की बसाहट जागुड़ी, जबरदाहा, बिसरियान, ढेबाडीह, ठाकुरपुरा, सापादाहा, बिसनपुर, खेजुरडंगल, देबापाड़ा, मुजराबाड़ी, नावाडीह जैसे 12 गांवों में है, लेकिन जागुड़ी और जबरडाहा को छोड़ बाकी गांव इस पारंपरिक पेशे से तौबा कर चुके हैं.

इस समुदाय और कला का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता लेकिन माना जाता है कि जब से मानव में शृंगार की भावना आई तब से इसका अस्तित्व है. चूंकि वे आदिवासी समुदाय के बीच बसे हैं, इसलिए इनकी कला में भी आदिवासी पुट है. सिद्धू कान्हु विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ सुरेंद्र झा कहते हैं कि इस समुदाय का लिखित इतिहास तो कहीं नहीं मिलता लेकिन यह तय है कि ये घुमंतू लोग हैं और इनकी कलाकृतियों को क्लासिकल ट्राइबल आर्ट की श्रेणी में रखा जाता है.

[box]जादुपेटिया समुदाय के लोगों की बसाहट करीब 12 गांवों में हैं, लेकिन जागुड़ी और जबरडाहा को छोड़ बाकी गांव इस पारंपरिक पेशे से तौबा कर चुके हैं[/box]

जादुपेटिया समुदाय का कलाकर्म तो क्लासिकल है ही, उनकी जीवनशैली भी खास और विचित्र है. जागुड़ी और जबरदाहा गांव में जादुपेटिया परिवारों के बीच जाने के बाद कई दिलचस्प बातें जानकारी में आती हैं. पता चलता है कि पैगंबर जादुपेटिया के बेटे का नाम प्रहलाद जादुपेटिया है. प्रहलाद जादुपेटिया ने अपने बेटे का नाम अहमद जादुपेटिया रखा है. एक ही घर परिवार में निजाम, मदीना, भानु, शंभू जैसे सदस्य मिलेंगे. नाजिर जादुपेटिया ने अपनी बेटी का नाम मरियम रखा है और फिर उसकी शादी एक अंसारी परिवार में की है. वे किस समुदाय से आते हैं, हिंदू हैं या मुसलमान इसका सीधा जवाब कोई नहीं दे पाता. हालांकि अलीम कहते हैं कि वे लोग मुसलमान समुदाय से आते हैं. यह पूछने पर कि कौन-से मुसलमान, अलीम कहते हैं कि पता नहीं.

इस खास समुदाय की खास कला को लेकर सरकार चिंतित क्यों नहीं है?  हम दुमका के उपायुक्त हर्ष मंगला से पूछते हैं कि क्यों सरकार इस विशेष समुदाय को अपने हाल पर छोड़कर आधुनिक समय में भी पसंद की जाने वाली विधा को सदा-सदा के लिए खत्म कर देना चाहती है. हर्ष मंगला कहते हैं, ‘इस समुदाय के 250 परिवारों में से जो बेहतर हैं उन्हें झारक्राफ्ट (कला एवं संस्कृति मंत्रालय की शाखा) से सहयोग मिल रहा है.’ यह पूछने पर कि क्या इस विकट स्थिति में उनकी सहयता के लिए कोई योजना बन सकती है, हर्ष मंगला कहते हैं, ‘फिलहाल तो कोई योजना नहीं है, जब कोई योजना आएगी तो उसका लाभ उन्हें दिया जाएगा.’

वे यह बात ऐसे कहते हैं जैसे इस कलाकर्म में लगने वाली नई पीढ़ी भी अपने उद्धार के लिए योजना के इंतजार में विरासत का बोझ ढोने की गारंटी दे रही हो! रही बात राजनीतिक दलों की तो संख्या बल में यह समुदाय मुठ्ठी भर है इसलिए शायद इसकी विडंबनाएं राजनीति के गलियारे में कभी मसला नहीं बनने वालीं. और तब यह तय-सा लगता है कि शायद कुछ सालों बाद 12 में से बचे दो गांवों के जादुपेटिया समाज के लोग भी अपने इस आदि-बुनियादी पेशे से तौबा करके दिहाड़ी मजदूरी करने परदेश जाकर बस जाएंगे जिसके लिए संथाल परगना का इलाका लंबे समय से जाना जाता रहा है.

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