करवट लेती कुदरत

उड़ीसा का चक्रवाती तूफान
1999 में आया उड़ीसा का चक्रवाती तूफान हिंद महासागर में आया सबसे शक्तिशाली तूफान माना जाता है. यह 25 अक्टूबर, 1999 से शुरू होकर 3 नवंबर, 1999 तक चला. 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाला यह तूफान देखते ही देखते उड़ीसा के तटीय क्षेत्रों से आगे बढ़ते हुए लगभग बीस से तीस किलोमीटर भीतर तक तबाही फैला चुका था. इस तूफान में 15,000 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. लगभग दस लाख हेक्टेयर में फैली खेती तबाह हो गई और सोलह लाख लोग बेघर होकर सड़कों पर आ गए. तटीय इलाकों में आया यह सबसे विकराल तूफान था और इसका दायरा सबसे अधिक था. उड़ीसा के पुरी, गंजाम, बालासोर, भद्रक, केंद्रापड़ा और जगतसिंहपुर समेत कुल 14 जिले इस आपदा की चपेट में पूरी तरह से ध्वस्त हो गए थे. इस तूफान ने देश के सामने एक बड़े मानवीय विस्थापन का संकट भी खड़ा किया था. लाखों परिवारों को उड़ीसा के तटीय इलाकों से हटा कर सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया. अकेले रेड क्रास के 23 राहत शिविरों में 44,500 के करीब लोगों को रखा गया था. इसकी विभीषिका तूफान गुजरने के काफी दिनों बाद तक इन इलाकों में देखने को मिली. सैकड़ों लोग भुखमरी, संक्रामक बीमारी और गंदे पानी के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे. इस चक्रवाती तूफान को ‘सायक्लोन जीरो बी’ के नाम से भी जाना जाता है.

हिमाचल के मैदानी इलाकों में बर्फबारी
2012 के जनवरी महीने में हिमाचल प्रदेश एक अनोखी घटना का चश्मदीद बना. प्रदेश के मैदानी इलाकों में भयंकर बर्फबारी हुई. इसने वहां के लोगों की दिनचर्या को तहस-नहस कर दिया. इस घटना ने आम लोगों के साथ-साथ वैज्ञानिकों को भी सकते में डाल दिया. प्रदेश के कम ऊंचाई वाले इलाकों ऊना जिले के चिंतपूर्णी और कांगड़ा जिले के नूरपुर, जसूर तथा हमीरपुर शहरी क्षेत्र के साथ-साथ लगभग सभी निचले इलाकों में बर्फबारी हुई. समुद्रतल से महज 400 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ का गिरना यूं भी अजीबोगरीब घटना थी. कई इलाकों के निवासियों ने तो अपने जीवनकाल में कभी भी बर्फबारी देखी ही नहीं थी. ज्यादातर जगहों पर पहली बार बर्फ गिरी थी. हिमाचल में उस साल बर्फबारी ने 76 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया था. इससे पहले 1971 में अवाहदेवी और टौणीदेवी इलाके में हल्की बर्फबारी हुई थी लेकिन इतने बड़े पैमाने पर बर्फबारी की यह पहली घटना थी. वैज्ञानिकों ने हिमाचल के निचले इलाकों में हुई इस बर्फबारी के लिए यूरोप के पश्चिमोत्तर में स्थित काला सागर में सक्रिय हुए एक पश्चिमी विक्षोभ को वजह माना था. वैज्ञानिकों का कहना था कि इस विक्षोभ के कारण पैदा हो रही हवाओं का वेग इतना बढ़ गया था कि ऊंचे इलाकों में गिरने वाली बर्फ हवा के साथ उड़कर निचले इलाकों तक पहुंच गई थी.

चेरापूंजी में सूखा
बचपन में सामान्य ज्ञान के सवालों में पूछा जाता रहा है कि भारत में सबसे अधिक वर्षा कहां होती है और उसका उत्तर हमेशा चेरापूंजी हुआ करता था. शायद नई पीढ़ी के लिए इस सवाल का उत्तर कुछ और हो जाए. कभी सर्वाधिक वर्षा वाली जगह के रूप में चर्चित चेरापूंजी से बारिश साल दर साल मुंह फेरती जा रही है. पिछले साल देश ने चेरापूंजी का एक विचित्र चेहरा देखा. साल भर पानी से सराबोर रहने वाले चेरापूंजी के लोग पीने के पानी के लिए लाइन लगाकर इंतजार कर रहे थे. पर्यावरणविदों का कहना है कि चेरापूंजी में होने वाली बारिश में हर साल 15 से 20 प्रतिशत तक की कमी आ रही है. बारिश की मात्रा में यह कमी पिछले एक दशक से देखी जा रही है. औसतन यहां 1,100 सेंटीमीटर बारिश होती थी. 2005 के बाद सालाना 800 से 900 सेंटीमीटर बारिश ही हो रही है. चेरापूंजी में कभी भी बड़े-बड़े जंगल नहीं रहे हैं और यहां पेड़ कटान की घटनाएं भी ना के बराबर ही होती रही हैं. इसलिए माना जा रहा है कि दूसरे हिस्सों में हो रही पर्यावरणीय घटनाओं (ग्लोबल वार्मिंग) का दुष्प्रभाव चेरापूंजी पर पड़ रहा है. बरसात केपर्यायवाची चेरापूंजी में आलम यह है कि लोगों को सर्दियों में पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है. जनसंख्या में बढ़ोतरी भी चेरापूंजी में पानी की कमी का एक बड़ा कारण है. 1961 में इस इलाके की आबादी मात्र 7,000 थी जो अब करीब पंद्रह गुना बढ़ गई है. चेरापूंजी के लिए चिंता की बात यह भी है कि यदि बारिश की मात्रा इसी तरह कम होती गई तो चेरापूंजी के आस-पास मौजूद तमाम जल-प्रपातों के लिए भी संकट खड़ा हो सकता है.

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