कमलनाथ भाजपा का कमल मुरझाया कांग्रेस का कमल खिला

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मध्यप्रदेश की राजनीति बिरादरी द्वारा बड़े-बड़े अक्षरों में लिखी इबारत ‘कमलनाथ: मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश’ को चुनावी नतीजे घोषित होते ही न पढ़ पाना सहज कुतुहल का सबब है। कमलनाथ ने पिछले कुछ महीनों में मध्यप्रदेश कांग्रेस की सूरत व सीरत को जिस तरह बदला वह वास्तव में आश्चर्य का विषय है। आजादी के पहले 18 नवंबर 1946 को कानपुर में जन्में कमलनाथ के लिए संभवत: यह अंतिम राजनीतिक दावेदारी प्रतीत होती हैं। इसका उन्हें पूरा लाभ भी मिला। वे दून स्कूल में संजय गांधी के सहपाठी थे। दोनों ने साथ मिलकर छोटी कार बनाने का सपना भी देखा था । मूलत: उद्योगपति कमलनाथ को इंदिरा गांधी ने कभी अपना तीसरा पुत्र भी कहा था। गौरतलब है 11 दिसंबर को राहुल गांधी ने अपने कांग्रेसाध्यक्ष पद पर एक वर्ष पूरा किया था और उन्हें जीत का तोहफा मिला। वहीं दूसरी ओर कमलनाथ को 13 दिसंबर 1980 में इंदिरा गांधी ने ‘लोकार्पित’ किया था और 13 दिंसबर 2018 यानी 38 वर्षों की लंबी पारी खेलकर वे मध्यप्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री बन गए। वे छिंदवाड़ा से 9 बार सांसद रह चुके हैं। इसके अलावा केंद्र में वाणिज्य एवं उद्योग, कपड़ा, वन एवं पर्यावरण तथा सड़क और परिवहन जैसे विभागों का उनके पास अनुभव है। वे दावोस विश्व आर्थिक सम्मेलन में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

यदि मध्यपद्रेश के संदर्भ में देखें तो वे कभी भी उस तरह से बहु प्रशंसित जननेता नहीं रहे, जैसे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया या दिग्विजय सिंह रहे हैं। परंतु उनके समर्थक व प्रशंसक पूरे प्रदेश में फैले हैं और कमननाथ का उन सबसे जीवित संपर्क भी बना रहा है। अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा का विकास माडल पूरे देश में सराहा गया है। उनके सामने तमाम आंचलिक समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। मध्यप्रदेश में बड़े स्तर पर असमानता है। कुछ अंचल समृद्धि है और कुछ बेहद विपन्न। इस दूरी को कम करना होगा। वहीं शिवराज सिंह के शासन में अफसरशाही को सत्ता को सीधे संचालित करने की आदत पड़ गई है। कई भाजपा मंत्रियों ने आन रिकार्ड कहा है कि अफसर उनकी नहीं सुनते। कमलनाथ के पास व्यापक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय अनुभव है। यह तो समय ही बता पाएगा कि मध्यप्रदेश इससे कितना लाभान्वित होता है। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश में ”एक कमल मुरझाया तो दूसरा कमल खिल गया है।’’