एक साथ चुनाव पर ज़रूरी विचार मंथन: मोदी

0
572

उधर भाजपा के अंदर भी लोकसभा चुनावों के साथ बारह राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव 2019 में ही करा लेने पर खासा विचार मंथन होता रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विचारमंथन की इस प्रक्रिया की तारीफ की। उन्होंने लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए भी यह कहा कि यदि देश को बार-बार आम चुनावी खर्च से बचाना है तो ऐसा करना ही होगा।

पार्टी के एक सूत्र के अनुसार पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं ने तमाम तरह की संभावनाओं पर राय-मश्विरा किया। एक संभावना तो यह भी थी कि मध्यप्रदेश, राजस्थान छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनावों को टाला जाए और जब इन राज्यों की विधानसभाओं की मियाद पूरी होती है यानी नवंबर-दिसंबर में तभी राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। फिर 2019 की शुरूआत में ही आम चुनावों के साथ यहां भी चुनाव हो जाएं।

आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और ओडिसा में लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव संभव हैं। लेकिन महाराष्ट्र, हरियाणा, अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और झारखंड जिनमें एनडीए की सरकारें है वहां भी चुनाव पहले कराए जा सकते हैं जिसमे लोकसभा चुनावों के साथ ही वहां भी चुनाव हो जाएं।

पार्टी के नेताओं का मानना है कि तकरीबन एक दर्जन राज्यों में बिना किसी कानून के बदलाव किए बगैर चुनाव हो सकते हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री संविधान मानते हुए अवधि पूरी हुए बगैर अपने इस्तीफे भी दे देंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनावों के नतीजों में पार्टी वापस सत्ता मे आ पाएगी।

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव सबसे पहले चुनाव आयोग ने ही 1983 में रखा था। विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी ने मई 1999 में आयोग की 170वीं रपट में कहा था ‘हमें उस स्थिति में जाना चाहिए जब लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, एक ही समय पर हो सकें।’

अभी हाल में विधि आयोग के साथ हुई बैठक में कांगे्रस पार्टी ने कहा कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना असंवैधानिक और अमल में लाने के अनुरूप नहीं जान पड़ता। इस पार्टी ने इसे संवैधानिक तौर पर प्रतिकूल और निरर्थक भी बताया। कांग्रेस ने कहा यदि यह अमल में आया तो इससे लोकतंत्र की चूलें चरमरा जाएंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही इस मुद्दे पर अपना इरादा जता दिया था। वे अमूमन एक देश और एक चुनाव के मुद्दे पर बोलते भी रहे हैं। हालांकि शिरोमणि अकाली दल, बीजू जनता दल, एआईडीएमके समाजवादी, टीआरएस और वाईएसआरपीओ पार्टियां इसके पक्ष में हैं लेकिन कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस डीएमके, टीडीपी, सीपीएम, सीपीआई, जद (एस) और फारवर्ड ब्लाक इसके विरोध में हैं।

चुनाव आयोग इस विचार का समर्थक तो है लेकिन उसकी सलाह है कि उसे इस प्रस्ताव पर काम करने के लिए और समय चाहिए।

तो नए साल में राज्यों के भी चुनाव, होंगे लोकसभा के साथ?

चुनाव आयोग की हिचकिचाहट के बावजूद विधि आयोग में विभिन्न पार्टियों के तर्को को सुना जाना है। संकेत इस प्रकार के हैं कि आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में अपना फैसला देगा। इसके लिए ज़रूरी वैधानिक संशोधन भी किए जाएंगे। फिर दो चरणों में राज्य विधानसभाओं और आम चुनाव करा लिए जाएंगे।

विधि आयोग जर्मनी में अमल में आ रहे नमूने को भारत के संदर्भ में उपयोगी मान रहा है। जहां अविश्वास प्रस्ताव का एक सकारात्मक वोट भी है जिसके आधार पर जब एक सरकार जाती है तो दूसरी सरकार को शपथ दिला दी जाती है। अब इसे ध्यान मेें रखते हुए दलबदल कानून में और संशोधन ज़रूरी होंगे। साथ ही (पार्लियामेंटरी प्रोसीज़र एंड रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल्स एक्ट) कुछ दूसरे कानूनों में भी संशोधन ज़रूरी होगा जिससे सुचारू रूप में इस योजना पर अमल हो सके।

उम्मीद है कि विधि आयोग आंतरिक तौर पर जल्दी ही मसौदा भेजेगा और साथी सदस्यों को उस पर दस दिन में अपनी प्रतिक्रिया देने का अनुरोध करेगा फिर आखिरी मसौदा तैयार हो जाएगा।

‘एक देश, एक चुनाव’ कराने में खर्च का मुद्दा बहुत अहम नहीं होगा। अलबत्ता चुनाव के दौरान इस्तेमाल होने वाली मशीनों की तादाद ज़रूर बढग़ी इसी तरह दूसरे खर्च भी बढ़ेेंगे। लेकिन इन सबके उपयोग एक साथ जब होगा तो निश्चय ही खर्च का बहाना अनुचित होगा। एनडीए के शासन के पिछले दो पूर्व मुख्य न्यायाधीश एमएन वेंकटचलैया संविधान समीक्षा आयोग के अध्यक्ष भी थे।

देश में एक साथ चुनाव कराने का सिलसिला 1967 तक था। लेकिन 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के भंग किए जाने और दिसंबर 1970 में लोकसभा के भंग होने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराने का सिलसिला शुरू हुआ।

अभी हाल में विधि आयोग ने इसी साल, अप्रैल में एक वर्किंग पेपर जारी किया था। इसमें कहा गया था कि पांच संवैधानिक सिफारिशें आवश्यक होंगी जिससे ‘एक देश, एक चुनाव’ को अमल में लाया जाए। नीति आयोग ने भी केंद्र के कहने पर इसी मुद्दे पर जनवरी 2017 में एक वकिंग पेपर जारी किया था। इस प्रस्तावों में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव लोकसभा और विधानसभाओं के साथ ही कराने की बात नहीं है।सीमा चिश्ती

साभार: इंडियन

चुनाव आयोग ने कहा इतनी जल्दी नहीं!

यदि कुछ राज्यों की विधानसभाओं की अवधि कम करनी हो या बढ़ानी हो तो उसके लिए संविधान में संशोधन ज़रूरी है। यह कहना है मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का। एक कानूनी ज़रूरत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने इस संभावना से इंकार किया कि इतनी जल्दी एक साथ चुनाव कराना संभव है। इसके लिए लाजिस्टिक ज़रूरतें भी पूरी होनी चाहिए, मसलन वीवीपीएटी (पेपर पर यह जताने वाली मशीनें कि अपने वोट किसे दिया)

उन्होंने बताया कि ‘एक देश, एक चुनाव’ के मुद्दे पर आयोग 2015 में ही अपनी तैयारी और अपनी राय- बात मसलन अतिरिक्त तौर पर पुलिस बल आदि ज़रूरतों पर अपनी ओर से जवाब दे चुका था। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि चुनाव पैनेल चुनाव कराने की अपनी जिम्मेदारी अवश्य निभाएगा। जब भी राज्य विधानसभाओं की अवधि खत्म होगी। चुनाव आयोग ईवीएम और वीवीपीएटी को लोकसभा चुनाव के पहले ही मंगाने के प्रयास में जुटा है। तमाम आवश्यक ईवीएम यानी 13.95 लाख बैलेट इकाइयां और 9.3 लाख कंट्रोल यूनिट 30 सितंबर तक आ जाएंगे। इसी तरह 16.25 लाख वीवीपीएटी भी नवंबर के अंत तक आ जाएंगे। कुछ अतिरिक्त  वीवीपीएटी भी ली जिससे कहीं मशीन खराब हो जाए तो उन्हें बदला जाए। तकरीबन 10,300 वीवीपीएटी मशीनों के दस राज्यों में गड़बड़ हो जाने की बात सामने आई थी। उन्हें 28 मई तक उप चुनावों में दुरूस्त कराना पड़ा।

अब यदि 2019 में एक साथ चुनाव  लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक साथ होने हैं तो चुनाव आयोग को तकरीबन 24 लाख ईवीएम की ज़रूरत पड़ेगी ।

कानून आयोग के साथ 16 मई को एक साथ चुनाव कराने पर हुई बातचीत के दौरान भी चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें बारह लाख अतिरिक्त ईवीएम और उनके बराबर तादाद के वीवीपीएटी मशाीनों को खरीदने के लिए रुपए 4,500 करोड़ मात्र की ज़रूरत होगी। यह बजटीय अनुमान तब मशीन खरीदने पर आ रही मशीनों के खर्च पर आधारित था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कानून आयोग को अगस्त में लिखा था कि यह कहीं बेहतर होगा यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करा दिए जाएं।  उन्होंने यह भी कहा था कि यदि इस विचार का विरोध होता है तो वह ‘राजनीति से प्रेरित ही’ होगा। अभी हाल ही में कानून आयोग ने एक पेपर में यह सिफारिश की थी कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को 2019 की शुरूआत में  ही दो चरणो मे करा दिया जाए।

एक साथ चुनाव कराने पर एनडीए में शामिल पार्टियों में शिरोमणि अकाली दल, अन्ना एकआईडीएमके और समाजवादी पार्टी और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने उत्साह तो जताया है लेकिन कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, द्रमुक (डीएमके), तेलुगु देशम, जनता दल (यू) और जनता दल (एस) ने असहमति जताई है।

कई राजनीतिक टिप्पणीकार और विशेषज्ञ भी मानते हैं कि एक साथ चुनाव कराने का भारत के संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा और राज्य की स्वायत्तता भी घटेगी।साभार: वायर