एक सरकार मंत्री हजार!

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के पूर्व प्रदेश सचिव अशोक मिश्रा भी सच्चिदानंद की बात का समर्थन करते हैं. वे कहते हैं कि राजनीतिक नियुक्तियों पर आए इन लोगों के पास अपने दर्जे के हिसाब से काम करने के अधिकार नहीं हैं. मिश्रा कहते हैं, ‘ इस तरह से राजनीतिक संरक्षण देना आजकल की राजनीति में बहुत चल रहा है लेकिन सरकार के विभिन्न विभागों में सलाहकार, सदस्य या अध्यक्ष बनाने के तरीके बिल्कुल नाजायज हैं. ये जल्दबाजी में कुछ लोगों को राजनीतिक संरक्षण देने के लिए सत्ता का दुरुपयोग है. ये नियुक्तियां अवैधानिक और मनमानी तो हैं ही ये जनता के पैसे की बर्बादी भी है.’

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दर्जा और सुख-लाभ

मायावती सरकार द्वारा 2007 में जारी शासनादेश के तहत मंत्री और राज्य मंत्री का दर्जा जिन लोगों को दिया जाएगा उन्हें कई सुविधाएं मिलेंगी

  • मंत्री और राज्य मंत्रियों को हर महीने 40,000 रुपये का मानदेय दिया जाएगा और यह मानदेय उस संबंधित निकाय या उससे जुड़ी प्रशासनिक इकाई को वहन करना होगा. उप मंत्री के लिए मानदेय की राशि 35,000 रुपये है.
  • ऐसे हर विशिष्टजन को वाहन चालक के साथ वाहन की सेवाएं उपलब्ध करवाई जाएंगी. इसमें लाल बत्ती होगी. ईंधन और अन्य खर्चे सरकार देगी
  • हर एक मंत्री को दो टेलीफोन कनेक्शन (एक घर में और एक कार्यालय में), दो निजी सहायक और दो चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी उपलब्ध कराए जाएंगे
  • राज्य संपत्ति विभाग इन लोगों को सरकारी आवास देगा. यदि कोई मंत्री इस आवास में नहीं रहता तो सरकार उसे हाउस रेंट के रूप में 10,000 रुपये देगी. उपमंत्री के लिए यह अलाउंस 8,000 रुपये है.
  • आधिकारिक दौरे पर मंत्रियों को उनके सहायक के साथ हवाई जहाज या रेलवे का एसी प्रथम श्रेणी का टिकट दिया जाएगा
  • मंत्रियों के परिवार के सदस्यों का इलाज मुफ्त में होगा. निजी अस्पताल के खर्चे सरकार वहन करेगी
  • ये लोग यदि राज्य का दौरा कर रहे हैं तो प्रतिदिन के हिसाब से इन्हें 100 रुपये महंगाई भत्ता मिलेगा. राज्य के बाहर जाने पर यह 750 रुपये होगा
  • अतिथियों के लिए नाश्ते और खानपान के लिए मंत्रियों को हर महीने 10,000 रुपये का भत्ता देने का प्रावधान है. राज्य मंत्रियों के लिए यह राशि 7,500 रुपये और उप मंत्रियों के लिए 6,500 रुपये है

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इस पूरे मसले पर उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता जफरयाब जिलानी सरकार की स्थिति को मुश्किल मानते हैं. वे कहते हैं, ‘ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला कि सरकार ने जिन लोगों को कैबिनेट या राज्य मंत्री का दर्जा दिया है वे  लाल बत्ती लगे वाहनों का इस्तेमाल नहीं कर सकते, बिल्कुल स्पष्ट है. क्योंकि इन लोगों की किसी संवैधानिक पद पर नियुक्ति नहीं हुई है. हालांकि इस फैसले में नई नियुक्तियों पर ही पाबंदी लगाई गई है. इस अंतरिम आदेश के पहले जिन लोगों को मंत्री और राज्य मंत्री दर्जा दिया गया है उनको राज्य सरकार पहले की तरह सुविधाएं दे सकती है क्योंकि अदालत ने इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया है.’

इस पूरी बहस के बीच एक पक्ष उन नेताओं का भी है जिन्हें ऐसे पदों से नवाजा गया है. इन्हीं में से एक सुरेश पांडे दावा करते हैं कि सरकार उनके लिए कोई अतिरिक्त सुविधाएं नहीं देती. वे कहते हैं, ‘ मैं चार दशकों से सार्वजनिक जीवन में हूं. मुझे नहीं लगता कि सरकार ने कुछ सुविधाओं के साथ मुझे मंत्री का दर्जा देकर कोई विशेष कृपा की है.’ राज्य योजना आयोग में सलाहकार पांडे यह भी कहते हैं, ‘ उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने के लिए सरकार जो भी कदम उठाएगी मैं उसके साथ हूं. हालांकि जहां तक मुझे लगता है तो सरकार जल्द ही जुलाई,2007 के शासनादेश में बदलाव करेगी और कुछ सुविधाओं और लाभों में कटौती करेगी.’

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