एक मात्र हथियार

मेरा एक दोहा है-

‘गुण्डे, लुच्चे गढ़ रहे दुनिया की तक़दीर।

अपराधी सब आज के नेता, सन्त, फ़क़ीर।।’ इसका मतलब यह नहीं है कि सभी नेता, सभी सन्त और सभी फ़क़ीर अपराधी हैं; बल्कि यह है कि जितने अपराधी है, वे या तो सियासी चोले में हैं; या सन्तों के भेष में हैं; या फ़क़ीरी का चोला ओढ़े हुए हैं। यानी इनमें से किसी-न-किसी चोले से अपने काले कारनामों को ढके हुए हैं। इन अपराधियों ने ही सियासत की कोठरी को काला किया हुआ है और इन्हीं अपराधियों ने धर्म को कलुषित किया हुआ है। और इन सबने ही मिलकर आम लोगों के बीच झगड़ा डाला हुआ है। हैरत यह है कि लोग इनकी चाल को समझ नहीं पाते। दरअसल आम लोग बड़ी आसानी से बहकावे में आ जाते हैं; ख़ासकर ताक़तवर लोगों के। सियासत और मज़हबों की यह साठगाँठ जब तक रहेगी, दुनिया में मारकाट मची रहेगी और लोग इसी तरह देश, धर्म, क्षेत्र, वर्ण, जाति आदि के नाम पर बँटे रहेंगे; लड़ते रहेंगे। इन सब दीवारों को गिराने और सबकी सुरक्षा के लिए प्रेम ही एक मात्र हथियार है, जिसकी सबसे पहली शर्त है- ‘सभी को प्रेम करो।’ दूसरी- ‘सभी का सम्मान करो’ और तीसरी- ‘जीओ और जीने दो।’