उल्टा पड़ता दांव

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जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी
जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी
जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी
जांच आयोग की रिपोर्ट पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा विरोध जता रही है. फोटो: वीरेंद्र नेगी

भाजपा सरकार के पिछले कार्यकाल में हुई कथित अनियमितताओं की जांच के लिए गठित भाटी आयोग की रिपोर्ट आने के बाद उत्तराखंड में पक्ष-विपक्ष के बीच शुरू हुआ घात-प्रतिघात का दौर थमता नहीं दिख रहा. भाजपा को साधने के लिए जांच रिपोर्ट को हथियार की तरह इस्तेमाल करती दिख रही कांग्रेस अब रिपोर्ट के खुलासे के बाद नित बदलते घटनाक्रम से खुद फंसती नजर आ रही है.

अतीत बताता है कि उत्तराखंड में हर नई सरकार अपने से पहली सरकार के कार्यों की जांच कराने के लिए जांच आयोगों का गठन करती रही है. 13 साल में अलग-अलग सरकारों ने उत्तराखंड में दर्जन भर से अधिक जांच आयोग बनाए. इन आयोगों पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं. इनमें से अधिकांश की जांच पूरी ही नहीं हो पाई. जिनकी जांच पूरी हुई भी तो उन्हें गठित करने वाली सरकारों ने जांच रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर नहीं रखी. ऐसे में यह आरोप लगना अस्वाभाविक नहीं कि ऐसे आयोग बस दो दलों की नूराकुश्ती होते हैं.

खैर, जांच आयोगों के गठन की परंपरा आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार ने भी सरकार बनने के लगभग छह महीने बाद एक सदस्यीय भाटी आयोग के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी. इसका काम था पिछली भाजपा सरकार में हुई कथित अनियमितताओं की जांच. पूर्व नौकरशाह केआर भाटी को पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के छह विवादास्पद मामलों की जांच करनी थी. इनमें ऋषिकेश में सिटजुरिया कंपनी को औद्योगिक भूमि में दी गई छूट, लद्यु और सूक्ष्म जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में हुई अनियमितता, कुंभ मेला-2010 में हुए कथित घोटाले, उत्तराखंड बीज और तराई विकास निगम में 2007 से 2012 के बीच हुई गड़बड़ी जैसे  मामले शामिल थे.

पांच मार्च, 2013  को भाटी आयोग ने तराई बीज विकास निगम की जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री बहुगुणा को सौंप दी. उस समय बजट सत्र और जल्दी होने वाले शहरी निकाय चुनावों को देखते हुए भाजपा राज्य की कांग्रेस सरकार पर खासी आक्रामक थी. सड़कों पर और मीडिया में गरीब मजदूरों के घरों के लिए आरक्षित सिडकुल की जमीन बिल्डरों को देने और टिहरी बांध के विस्थापितों को आवंटित जमीन में हुए खेल की गूंज थी. कैबिनेट में भू-कानून की कुछ धाराओं में बदलाव करने के मुद्दे पर भी इतना बवाल हो रहा था कि मुख्यमंत्री को खुद सफाई देने के लिए प्रेस के सामने आना पड़ रहा था.

भाटी आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश होने से पहले लीक हो गई. साथ ही इस जांच में एक पूर्व मुख्यमंत्री के दोषी पाए जाने की अफवाह उड़ गई. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि रिपोर्ट के अंश लीक करके कांग्रेस सरकार भाजपा को डराना चाहती थी.

[box]भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट से उपजा विवाद उत्तराखंड के कृषि मंत्री हरक सिंह की विधानसभा सदस्यता के लिए भी खतरा बन गया है[/box]

लेकिन बात नहीं बनी. बजट सत्र में भाजपा के आक्रामक तेवरों में कोई कमी नहीं आई. उधर, कांग्रेस भी पीछे हटने को तैयार नहीं थी. सत्र के दौरान ही कृषि मंत्री हरक सिंह ने भाटी द्वारा सौंपी गई तराई बीज विकास निगम की जांच रिपोर्ट विधानसभा में रखने का ऐलान कर दिया और सरकार ने लीक होकर सभी महत्वपूर्ण हाथों तक पहुंच चुकी आयोग की रिपोर्ट को रस्मी तौर पर बजट सत्र में रखकर सार्वजनिक कर दिया.

तहलका ने 15 अप्रैल, 2011 के अंक में तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी की अनुचित नियुक्ति, बोरों की खरीद में धांधली, बिना प्रमाणीकरण के कहीं से भी बीज खरीद कर निगम के प्रतिष्ठित बीज ब्रांड को समाप्त करने के षड्यंत्र जैसी अनियमितताएं उजागर की थीं. भाटी आयोग ने भी इन्हीं बिंदुओं को जांच का आधार बनाया. तहलका ने उस समय उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के तथ्यों से जिन गड़बड़ियों का खुलासा किया था उन सभी की भाटी आयोग की जांच में पुष्टि हो गई. आयोग की रिपोर्ट पर मंत्रिमंडल के निर्णय को आगे बढ़ाते हुए कृषि मंत्री हरक सिंह ने इन सभी मामलों में ‘निहित आपराधिक कृत्यों’ के संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने का निर्णय ले लिया.

दरअसल भाटी आयोग ने इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी और कुछ आईएएस अधिकारियों को दोषी पाया है. कृषि मंत्री हरक सिंह ने एक ओर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करके पूर्व मुख्यमंत्री निशंक और हेमंत द्विवेदी के लिए परेशानी खड़ी कर दी है तो दूसरी ओर उनके आदेश में तराई बीज विकास निगम के निर्णयों में शामिल अधिकारियों के संबंध में आयोग की सिफारिशों के अनुसार शासन स्तर पर कार्रवाई की बात है. सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी दर्शन भारती कहते हैं, ‘इससे सिद्ध हो जाता है कि उत्तराखंड में भले ही नेताओं को उनके असंवैधानिक कार्यों के लिए घेरा जा सकता हो, लेकिन दागी अधिकारियों पर उंगली उठाने की हिम्मत यहां के राजनेताओं में नहीं है.’

उधर, भाजपा ने भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट को एकतरफा बताया. पूर्व मुख्यमंत्री निशंक ने आरोप लगाया कि उनके बयान तक नहीं लिए गए तो हेमंत द्विवेदी ने उच्च न्यायालय की शरण ली. रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद सरकार की विपक्ष को बैकफुट पर लाने की रणनीति कामयाब होती नजर आ रही थी. इस बीच पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र रावत ने भाटी और मुख्यमंत्री के करीबी कांग्रेस विधायक के नजदीकी संबंधों की बात सार्वजनिक कर दी. भाजपा के आक्रामक रुख को देखते हुए केआर भाटी ने जांच आयोग से इस्तीफा दे दिया. सरकार ने भी सुशील त्रिपाठी को जांच आयोग का अध्यक्ष बना दिया. साथ ही उसने भाटी आयोग की जांच रिपोर्ट के आधार पर आनन-फानन में प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज करा दी.

लेकिन पुख्ता तथ्यों के बावजूद यह रिपोर्ट भाजपा के बजाय उल्टे सरकार पर भारी पड़ने लगी. तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने इस पर सवाल उठाया. उनका कहना था, ‘यदि तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष पद पर हेमंत द्विवेदी की नियुक्ति असंवैधानिक थी तो फिर मुख्यमंत्री बहुगुणा ने कृषि मंत्री हरक सिंह को कैसे इस पद पर नियुक्त किया है?’ दरअसल निगम के आर्टिकिल ऑफ एसोसिएशन की धारा 111, धारा 147 और पूर्व बैठकों में पारित निर्णयों के अनुसार इस संस्था के अध्यक्ष पद पर किसी  गैरसरकारी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हो सकती. ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री निशंक के फंसने का आधार बनने वाली धारा 147 से कांग्रेस भी घिर रही थी. उधर, सरकार का यह तर्क था कि मंत्री अपने अधीन किसी भी विभाग या निगम का मुखिया हो सकता है. यह तर्क किसी को पचा नहीं.

भाटी आयोग की रिपोर्ट से उपजा विवाद हरक सिंह की विधानसभा सदस्यता के लिए भी खतरा बन गया है. भाजपा ने अप्रैल के पहले सप्ताह में राज्यपाल से मुलाकात करके उनसे कृषि मंत्री की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए चुनाव आयोग को पत्र लिखने की मांग की. भाजपा नेताओं ने राज्यपाल को दिए ज्ञापन में आरोप लगाया है कि हरक सिंह को कृषि मंत्री के साथ-साथ तराई बीज विकास निगम के अध्यक्ष पद पर नामित किया गया है. साथ ही वे सैनिक कल्याण मंत्री के साथ उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम (उपनल) के अध्यक्ष पद पर आसीन हैं.

भाजपा नेताओं ने राज्यपाल से मांग की कि ये दोनों पद लाभ के पदों के दायरे में आते हैं. इसलिए संविधान के अनुसार हरक सिंह रावत की विधानसभा सदस्यता समाप्त कर देनी चाहिए. इसके जवाब में हरक सिंह और सरकार ने कई तर्क दिए. लेकिन जानकारों की मानें तो संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार इस मामले में सरकार का पक्ष कमजोर और संविधान के  विपरीत था. ऐसे में कल तक भाजपा नेताओं के बयानों को भाटी आयोग की रिपोर्ट से उपजी बौखलाहट बताने वाली सरकार ने डैमेज कंट्रोल के लिए तुरत-फुरत एक नया उपाय ढूंढ़ने की कोशिश की. उसने तराई बीज विकास निगम और उपनल के अध्यक्ष पदों को पूर्व तिथि से लाभ के पदों के दायरे से बाहर निकालने का अध्यादेश राज्यपाल को भेज दिया.

[box]भाजपा ने अप्रैल के पहले सप्ताह में राज्यपाल से मुलाकात करके उनसे कृषि मंत्री की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए चुनाव आयोग को पत्र लिखने की मांग की.[/box]

लेकिन भाजपा इस मामले में चुप बैठने को तैयार नहीं है. भाजपा नेताओं के प्रतिनिधि मंडल ने राज्यपाल से फिर मिलकर मांग रख दी है कि सरकार द्वारा पूर्व तिथि से इन दोनों पदों को लाभ के पदों के दायरे से बाहर रखने का अध्यादेश नियम और संसदीय परंपरा के विरुद्ध है. उनका कहना है कि पूर्व तिथि या आगे की तारीखों से प्रभावी होने वाले अध्यादेश राज्य हित में लाए जाने की परंपरा है इसलिए व्यक्ति हित में  अध्यादेश लाने की अनुमति राज्यपाल को नहीं देनी चाहिए. राज्यपाल द्वारा यह अध्यादेश लाने की अनुमति देने की स्थिति में भाजपा राज्यपाल का विरोध करने के मूड में भी दिख रही है.

उत्तराखंड में ताकतवर लोगों के लिए जमीन के सौदे जल्द कमाई का सबसे बड़ा साधन हैं. जमीन के हर विवादित सौदे में लाभ पाने वालों में सत्ता-विपक्ष के ताकतवर लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े रहते हैं. इन सौदों का अच्छा लाभ नौकरशाह और जांच का मौका हाथ में आने पर पुलिस अधिकारी भी लेते ही रहते हैं. यह विवाद भी सरकार द्वारा जमीन को औने-पौने दामों में दिए जाने से शुरू हुआ था. तहलका ने मई, 2011 के अंक में हल्द्वानी में 300 करोड़ रुपये की लगभग 99 एकड़ जमीन के एक सौदे का खुलासा किया था. अब इस जमीन का बाजार भाव 700 करोड़ रुपये बताया जाता है. इस सौदे का सीधा संबध हेमंत द्विवेदी से था. यदि कांग्रेस सरकार चाहती तो कायदे और नियमों से यह जमीन राज्य सरकार में समाहित हो जानी चाहिए थी. लेकिन सरकार बनने के एक साल बाद भी ऐसा नहीं हुआ. सामाजिक संगठन कुमाऊं न्याय मंच के बलवंत सिंह कहते हैं, ‘इस तरह के सौदों से लाभ लेने वालों में सभी दलों के प्रमुख नेता होते हैं, इसलिए सरकार ऐसे मामलों की प्रभावी जांच नहीं करती.’ उनका आरोप है कि सभी सरकारें या दलों के नेता नूरा-कुश्ती करके जनता को भरमाने में लगे हैं और उत्तराखंड की बेशकीमती जमीनों का सौदा कर रहे हैं.

बहुगुणा सरकार ने भाटी जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करके यह सिद्ध करने की कोशिश की थी कि सरकार में जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और उस पर कार्रवाई करने की पूरी हिम्मत है. लेकिन रिपोर्ट को सामने लाने का समय और तरीका उसे सवालों के कटघरे में खड़ा कर रहा है. वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र जोशी कहते हैं, ‘ऐसे उदाहरण लोकतंत्र की सेहत के लिए शुभ संकेत नहीं.’

कुछ साल पहले सपा सांसद जया बच्चन ने लाभ के पद से जुड़े विवाद के चलते अपनी राज्य सभा सदस्यता गंवाई थी. इससे उपजे विवाद में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी उस समय लोकसभा से इस्तीफा देना पड़ा था. भाटी आयोग से स्वयं को सुरक्षित करने की कोशिश करती दिखने वाली उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के सामने भी अब बड़ा संकट खड़ा हो गया है कि वह भाजपा द्वारा इस मुद्दे पर छोड़े जा रहे तीखे तीरों से अपने मंत्री हरक सिंह रावत की विधानसभा सदस्यता कैसे बचाए.

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