उदास है चिनार

पाकिस्तान इस ताक में है कि आतंकी गुटों का कश्मीर के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सके। याद रहे अलक़ायदा ने अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान की जीत को यूरोप और पूर्वी एशिया में जनता के लिए अमेरिकी आधिपत्य की बेडिय़ों से मुक्त होने का अवसर बताया था। उसने कश्मीर को इस्लाम के दुश्मनों के चंगुल से मुक्ति दिलाने की बात कही है। हालाँकि अलक़ायदा ने चीन के शिनजियांग में मानवाधिकारों के हनन के बारे में एक शब्द नहीं बोला। यह हैरानी की बात है कि दुनिया भर के मुस्लिम क़ैदियों की बात करने वाले अलक़ायदा को उइगर मुसलमानों की याद नहीं आयी।

बता दें वहाँ उइगर मुसलमानों के मानवाधिकार हनन की ख़बरें अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं। कारण साफ़ है कि चीन तालिबान के प्रति नरम रूख़ अपनाये हुए है। तालिबान और सहयोगी आतंकी गुटों को चीन से आर्थिक मदद और प्रोत्साहन मिल रहा है। विशेषज्ञों का कहना कि बदले में चीन अफ़ग़ानिस्तान के संसाधनों का इस्तेमाल अपने लिए करना चाहता है, जिसे एक ख़तरनाक संकेत माना जाएगा। अफ़ग़ानिस्तान में लीथियम का भण्डार है और वह खुले तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में बड़े निवेश की योजना बना रहा है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को वह ईरान तक ले जाना चाहता है। अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान दोनों का सहयोग उसका काम आसान कर देगा। ऐसे में कश्मीर को लेकर भारत की चिन्ताएँ वाजिब हैं।

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान कश्मीर को लेकर और भडक़ाऊ बातें कहने लगा है। यह ख़तरा बार-बार जताया जाता रहा है कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में अपनी पसन्दीदा सरकार बनने के बाद आतंकवादी समूहों को वहाँ से संचालित करवा सकता है। यही कारण है कि भारत तालिबान पर दबाव बनाने के लिए बार-बार यह दोहरा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल भारत के ख़िलाफ़ आतंकी गुटों को पनाह या ट्रेनिंग देने के लिए नहीं होना चाहिए।

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के इरादे वहाँ के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में प्रधानमंत्री मोदी के सम्बोधन से ऐन पहले अपने सम्बोधन में सिर्फ़ कश्मीर के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने से ज़ाहिर हो जाते हैं। यूएनजीए में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने सम्बोधन में 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के भारत सरकार के फ़ैसले और पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के निधन के बारे में भी बात की, जिससे उनके इरादे ज़ाहिर होते हैं। यही नहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हाल ही में एक साक्षात्कार में तालिबान को वैश्विक मान्यता देने की अपील की थी, जबकि पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी संयुक्त राष्ट्र महासभा में तालिबान राज को मान्यता देने की वकालत कर चुके हैं। इमरान ख़ान ने यूएनजीए में यह भी कहा कि अमेरिका में 9/11 हमलों के बाद दुनिया भर के दक्षिणपंथियों (राइट विंग) ने मुसलमानों पर हमले शुरू कर दिये। भारत में इसका सबसे ज़्यादा असर है। वहाँ आरएसएस और भाजपा मुस्लिमों को निशाना बना रहे हैं। कश्मीर में एकतरफ़ा क़दम उठाकर भारत ने जबरन क़ब्ज़ा किया है। मीडिया और इंटरनेट पर पाबंदी है। जनसांख्यिकीय संरचना (डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर) को बदला जा रहा है। बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक में बदला जा रहा है। यह दुर्भाग्य है कि दुनिया चुनिंदा प्रतिक्रिया ही देती है। यह दोहरे मापदण्ड हैं। सैयद अली शाह गिलानी के परिजनों के साथ अन्याय हुआ। मैं इस सभा से माँग करता हूँ कि गिलानी के परिवार को उनका अन्तिम संस्कार इस्लामी तरीक़े से करने की मंज़ूरी दी जाए।’

हालाँकि इमरान ख़ान के सम्बोधन के बाद संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रथम सचिव स्नेहा दुबे ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में साफ़ कहा कि पाकिस्तान के नेता द्वारा भारत के आंतरिक मामलों को विश्व मंच पर लाने और झूठ फैलाकर इस प्रतिष्ठित मंच की छवि ख़राब करने का एक और प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के बयान देने वालों और झूठ बोलने वालों की सामूहिक तौर पर निंदा की जानी चाहिए। ऐसे लोग अपनी मानसिकता के कारण सहानुभूति के पात्र हैं।

दुबे ने कहा- ‘हम सुनते आ रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है। यह वह देश है, जिसने ख़ुद आग लगायी है और आग बुझाने वाले के रूप में ख़ुद को पेश करता है। पाकिस्तान आतंकवादियों को इस उम्मीद में पालता है कि वे केवल अपने पड़ोसियों को नुक़सान पहुँचाएँगे। क्षेत्र और वास्तव में पूरी दुनिया को उनकी नीतियों के कारण नुक़सान उठाना पड़ा है। दूसरी ओर वे अपने देश में साम्प्रदायिक हिंसा को आतंकवादी कृत्यों के रूप में छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। समूचे केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ हमेशा भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा थे; हैं; और रहेंगे। इसमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं, जो पाकिस्तान के क़ब्ज़े में अवैध रूप से हैं। हम पाकिस्तान से उसके अवैध क़ब्ज़े वाले सभी क्षेत्रों को तुरन्त ख़ाली करने का आह्वान करते हैं।’

अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका से हर कोई वाक़िफ़ है। तालिबान को मदद देने के अलावा पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान की नयी सरकार में हक़्क़ानी नेटवर्क को ताक़त देने के लिए सक्रिय है। चीन भी तालिबान के ख़िलाफ़ प्रतिबन्ध हटाने का आह्वान कर चुका है। चीन ने तो अमेरिका से अनुरोध किया कि वह युद्धग्रस्त देश के रोके गये विदेशी मुद्रा भण्डार को समूह पर राजनीतिक दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं करे।

संयुक्त राष्ट्र और कश्मीर

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह अमेरिका यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर भी सवाल उठाया था, उसके पीछे भी एक बड़ा कारण कश्मीर पर यूएन का हालिया बयान था, जिससे भारत नाराज़ था। दरअसल मोदी की अमेरिका यात्रा से कुछ ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बैचलेट ने भारत में ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम (यूएपीए) के इस्तेमाल और जम्मू-कश्मीर में बार-बार अस्थायी रूप से संचार सेवाओं पर पाबन्दी लगाये जाने को चिन्ताजनक बताया था। बता दें जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् के 48वें सत्र में उद्घाटन वक़्तव्य में बैचलेट ने यह बात कही थी। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का मुक़ाबला करने और विकास को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार के प्रयासों को तो स्वीकार किया; लेकिन कहा कि इस तरह के प्रतिबन्धात्मक उपायों के परिणामस्वरूप मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकता है और भविष्य में तनाव और असन्तोष बढ़ सकता है।

बैचलेट ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक सभाओं और संचार सेवाओं पर बार-बार पाबन्दी लगाये जाने का सिलसिला जारी है, जबकि सैकड़ों लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिए हिरासत में हैं। साथ ही पत्रकारों को लगातार बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ता है। पूरे भारत में ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम का उपयोग चिन्ताजनक है। इसके जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक मामले सामने आये हैं। हालाँकि भारत ने बैचलेट की टिप्पणियों पर सख़्त असहमति जतायी है।

 

“जो देश आतंकवाद को राजनीतिक औज़ार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि आतंकवाद उनके लिए भी उतना ही बड़ा ख़तरा है, जितना कि वह दुनिया के लिए है। यह तय करना होगा कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवाद और आतंकी हमलों के लिए न हो पाये। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अफ़ग़ानिस्तान का इस्तेमाल कोई देश अपने स्वार्थ के लिए नहीं कर सके। इस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों को मदद की ज़रूरत है और इसमें हमें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी ही होगी। हमारे समंदर भी हमारी साझी विरासत हैं। ध्यान रखना होगा कि ओशन रिर्सोसेज (समुद्री संसाधनों) का हम यूज (सदुपयोग) करें, एब्यूज (दुरुपयोग) नहीं। समंदर इंटरनेशन ट्रेड (अंतरराष्ट्रीय व्यापार) की लाइफलाइन (जीवन-रेखा) हैं। इन्हें एक्सपेंशन (विस्तार) और एक्सक्लूजन (काटने) से बचाना होगा। नियमों का पालन हो। इसके लिए दुनिया को एक साथ ‌आवाज़ उठानी होगी।”

नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री (यूएनजीए में अपने सम्बोधन में)

 

“अब गेंद भारत के पाले में है। भारत को कश्मीर में उठाये गये क़दमों को वापस लेना होगा। कश्मीर में बर्बरता और डेमोग्राफिक चेंज (जनसांख्यिकीय बदलाव) बन्द करना होगा। भारत सैन्य ताक़त बढ़ा रहा है। इससे इस क्षेत्र का सैन्य सन्तुलन बिगड़ रहा है। दोनों देशों के पास न्यूक्लियर (परमाणु) हथियार हैं।”

इमरान ख़ान

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री (यूएनजीए में अपने सम्बोधन में)

 

कश्मीर में आतंकी

सेना के मुताबिक, कश्मीर में अभी भी 70 से 80 विदेशी आतंकी मौज़ूद हैं। उधर पिछले क़रीब तीन साल में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच 400 मुठभेड़ हुई हैं। यह आंकड़े 4 अगस्त को संसद में सरकार की और से बताये गये थे। इन मुठभेड़ों में 85 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गये, जबकि 630 आतंकियों को मार गिराया गया। नागरिकों के मरने की संख्या अलग से है। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक लिखित जवाब में जानकारी दी कि मई, 2018 से जून, 2021 तक जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच 400 मुठभेड़ हुईं। इस साल अभी तक नौ महीनों में सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ में 108 आतंकियों को मार गिराया है। इससे ज़ाहिर होता है कि कश्मीर में आतंक अभी ज़िन्दा है। देखा जाए तो कश्मीर में एक बार फिर से हमलों में तेज़ी आयी है। सितंबर में आतंकियों की तरफ़ से लगातार हमलों को बढ़ा दिया गया है। पिछले दिनों में आतंकियों ने कश्मीर में चार हमले किये हैं।

 

अफ़ग़ानिस्तान ख़ुद दोराहे पर

अफ़ग़ानिस्तान तालिबान के आने के दोराहे पर खड़ा दिख रहा है। देश की जनता जहाँ भुखमरी झेलने के मुहाने पर खड़ी है, वहीं दूसरी तरफ़ तालिबान की क्रूरता फिर शुरू हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र ने हाल में कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में लोगों को रोटी तक के लाले पडऩे की नौबत आ सकती है। अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के विशेष अधिकारी और मानवाधिकार समन्वयक रमीज अकबारोव ने हाल में काबुल में यह कहकर दुनिया भर के लोगों को चिन्ता में डाल दिया कि अफ़ग़ानिस्तान में विश्व खाद्य कार्यक्रम (वल्र्ड फूड प्रोग्राम) के पास मौज़ूद खाद्य स्टॉक सितंबर के आख़िर तक ख़त्महो जाएगा। इसके बाद वहाँ लोगों को ज़रूरी खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना नामुमकिन होगा। इसका असर यह हो सकता है कि पाँच साल की कम उम्र के आधे बच्चे अत्यंत कुपोषित की श्रेणी में चले जाएँगे। और तो और अफ़ग़ानिस्तान की एक-तिहाई वयस्क आबादी को पर्याप्त खाना तक नसीब नहीं हो सकेगा। निश्चित ही यह चिन्ताजनक स्थिति है। यह भी रिपोट्र्स हैं कि काबुल में लोग भुखमरी बचने के लिए अपने बच्चे बेचने को मजबूर हो चुके हैं।

अफ़ग़ानिस्तान में काम-धन्धे बन्द हो चुके हैं। जीडीपी बेहद ख़राब हालत में पहुँच चुकी है। ऊपर से देश के सम्पत्ति पहले ही विदेशी संस्थाओं और अमेरिका ने फ्रीज कर दी है। यूएन अफ़ग़ानिस्तान में भुखमरी से लोगों के मरने की बात कह चुका है। ऐसे में काबुल में ग़रीब परिवार अपने बच्चे बेचने को मजबूर हैं। इन घटनाओं के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। भुखमरी की इन चिन्ताओं के बीच दूसरी बुरी ख़बर यह है कि तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में लोगों पर पुराने दिनों की तरह ज़ुल्म ढाना शुरू कर दिया है। तालिबान ने शरिया क़ानूनों के तहत लोगों का बर्बर सज़ा देना शुरू कर दिया है। अभी 26 सितंबर को हेरात में एक शख़्स को तालिबान ने मारकर सार्वजनिक तौर पर खम्भे पर लटका दिया। इस घटना का वीडियो सामने आया, जिसे अफ़ग़ानिस्तान के एक पत्रकार हिजबुल्लाह ख़ान ने ट्वीट किया। ट्वीट में ख़ान ने लिखा- ‘तालिबान ने शहरों के अन्दर सार्वजनिक तौर पर सज़ा-ए-मौत देना शुरू कर दिया है।’ यह हेरात का मामला है। तालिबान के संस्थापकों में शामिल मुल्ला नूरुद्दीन तुराबी ने तो यहाँ तक कह दिया कि अफ़ग़ानिस्तान में फाँसी की सज़ा देने, लोगों के हाथ काटने जैसी क्रूर सज़ाएँ जारी रहेंगी। तुराबी ने एक इंटरव्यू में कहा कि वह ग़लती करने वालों को पुराने तरीक़े से ही सज़ा देगा। इसमें महिलाओं को पत्थर मारना और चोरी करने पर हाथ काट देना शामिल है। तुराबी ने कहा कि ग़लती करने वालों की हत्या करने और अंग-भंग किये जाने का दौर जल्द लौटेगा। लेकिन वह सार्वजनिक जगहों पर किसी क़ैदी या आरोपी को फाँसी नहीं देगा, बल्कि क़ैदियों को फाँसी अब जेल में ही दी जाएगी। पहले तालिबान किसी स्टेडियम में या फिर सडक़ों पर किसी शख़्स को फाँसी देकर उसकी लाश को चौराहों पर लटका देता था। लेकिन अब तालिबान उसे सार्वजनिक नहीं करेगा। जिन क़ैदियों को सज़ा देनी होगी, उन्हें चुपचाप ही सज़ा दे दी जाएगी।