उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2022 सपा की सेंधमारी से भाजपा हैरान

जब कोई पार्टी अपनी सत्ता दूसरी किसी पार्टी के हाथ में नहीं देना चाहती, तो वह कुछ राजनियक और महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने लोगों को किसी भी तरह लाने का प्रयास करती है। उत्तर प्रदेश में भी इस साल यही हुआ है। इससे पहले सन् 1984 में कांग्रेस ने भी यही किया था।

सन् 1980 में कांग्रेस प्रचंड बहुमत से चुनकर सत्ता में आयी और उसने सन् 1984 में विपक्ष का उपाध्यक्ष चुने जाने की निर्वाचन की परम्परा को तोड़ते हुए विपक्षी दल को यह पद न देने की मंशा से हुकुम सिंह को प्रत्याशी बनाकर चुनाव करा दिये। सत्तापक्ष के पास संख्या बल होने के चलते इस चुनाव में हुकुम सिंह उपाध्यक्ष बने। अब भाजपा ने भी वही इतिहास दोहराया है। लेकिन उस समय में और अब में अन्तर यह है कि भाजपा ने अपनी पार्टी के किसी पुराने विधायक को यह मौक़ा न देकर सपा के बाग़ी विधायक नितिन अग्रवाल को उपाध्यक्ष बनाया है। उपाध्यक्ष पद के पद पर हुए इस चुनाव में ख़ास बात यह रही कि अखिलेश के चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ही मतदान करने नहीं गये। वहीं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने भी मतदान नहीं किया, जबकि उनकी पार्टी के तीन विधायकों ने इस चुनाव में मतदान किया।

कांग्रेस भी हो रही मज़बूत

पीडि़तों को न्याय दिलाने और उनसे मिलने की कोशिश में कांग्रेस उपाध्यक्ष प्रियंका गाँधी दो बार हिरासत में ली जा चुकी हैं। लोगों को प्रियंका की यह लड़ाई पसन्द आने लगी है और वे वापस कांग्रेस की ओर देखने को विवश हो रहे हैं।

कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर कांग्रेस प्रियंका गाँधी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना दे, तो कांग्रेस से कट चुके लोग उसके पक्ष में मतदान करेंगे। हालाँकि भले ही जानकार भी कह रहे हैं कि ऐसा करने से कांग्रेस चुनाव जीत सकती है, मगर यह इतना भी आसान नहीं है; भले ही कांग्रेस का जनाधार बढ़ता नजर आ रहा है। हाँ, महिलाओं को 40 फ़ीसदी टिकट देने की प्रियंका की घोषणा और राजनीति में क़दम रखने वाली युवतियों को सुविधाएँ देने की घोषणा से यह सम्भव है कि कांग्रेस के पक्ष में महिला मत बढ़ जाएँ। इसके लिए उनकी महिलाओं से गले लगकर मिलना और उनके साथ फोटो खिंचवाना भी एक अच्छा कारण बन सकता है।

भविष्य की सम्भावनाएँ

भविष्य के पर्दे में क्या पोशीदा है? यह कोई नहीं जानता। कभी-कभी लोगों का तुक्का भी सही साबित हो जाता है और कभी कभी बड़े-बड़े विद्वानों और ज्योतिषियों की भविष्यवाणी भी झूठ साबित हो जाती है। उत्तर प्रदेश में अगली सरकार किसकी बनेगी? इस पर भी राजनीतिक जानकार, भविष्यवक्ता और आम लोग भविष्यवाणी कर रहे हैं। कुछ लोग दावा भी कर रहे हैं, जिस पर बहस भी छिड़ती है और कई बार कहीं-कहीं झगड़े का माहौल भी बन जाता है।

फ़िलहाल सभी पार्टियों में दाँवपेंच का खेल चरम पर है। प्रियंका गाँधी अपनापन दिखाकर, 40 फ़ीसदी आरक्षण महिलाओं को देकर, उनके बीच जाकर उनका खाना खाकर, उन्हें गले लगाकर और पीडि़तों का दु:ख बाँटकर लोगों का दिल जीतने की कोशिश में लगी हैं; तो अखिलेश को सन् 2012 की तरह पुराने मतदाताओं से उम्मीद है। वहीं रालोद को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जीत का पक्का भरोसा है, तो आम आदमी पार्टी को ईमानदारी, मुफ़्त 300 यूनिट बिजली और तिरंगा यात्रा से काफ़ी कुछ पाने की उम्मीद है। छोटे-छोटे दलों को अपने-अपने गढ़ों में जीत का विश्वास तो है; लेकिन डर भी है कि कहीं बड़ी पार्टियाँ उनका खेल न बिगाड़ दें।

इन सबके बीच सबसे ज़्यादा भरोसा सत्ता में मौज़ूद भाजपा को ही है। भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के द्वारा 300 से ज़्यादा सीटें जीतने का दावा आत्मविश्वास है या अतिविश्वास? नहीं कह सकते; मगर डरी हुई भाजपा भी कम नहीं है। क्योंकि एक के बाद एक घट रही आपराधिक घटनाएँ उसके ख़िलाफ़ लोगों के समूह खड़े कर रही हैं। ऐसे में भाजपा को अपने प्रति लोगों में पहले जैसा विश्वास भरना पड़ेगा, जो कि कमज़ोर होता दिख रहा है।