उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 अमित शाह के दौरे से गरमायी राजनीति

बहुजन समाज पार्टी

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती इस बार अपने निश्चित वोट बैंक के अलावा ब्राह्मणों को अपने ख़ेमे में करने की रणनीति बना ही चुकी हैं। मगर इस बार वह सन् 2007 की तरह पिछड़ा वर्ग को भी लुभाने का प्रयास करेंगी। वह इस दाँव में जीत के लिए पिछड़ा वर्ग से प्रत्याशी मैदान में उतारेंगी। वह ब्राह्मणों को टिकट देकर उन्हें अपने ख़ेमें में लाकर कामयाब होना चाहती हैं। क्योंकि ब्राह्मण भाजपा से नाराज़ हैं। अर्थात् बसपा की मुखिया प्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी करना चाह रही हैं। क्योंकि वह जानती हैं कि उनकी जीत सन् 2007 के फार्मूले से ही सम्भव है, जिसकी शुरुआत वह कर चुकी हैं।

सन् 2017 में तो उन्होंने 100 से अधिक मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देकर धोखा खा लिया। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2007 में बसपा के पक्ष में 30 फ़ीसदी वोट पड़ा था, जो कि उसकी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त साबित हुआ। लेकिन इस बार उसके खाते में फ़िलहाल 13 से 14 फ़ीसदी वोट है, जिसे मायावती अपनी रणनीति से बढ़ाने में लगी हैं।

अन्य पार्टियाँ

इस बार उत्तर प्रदेश में कई छोटे-बड़े दल भाजपा को हराने की कोशिश में रहेंगे, मगर कुछ दल भाजपा के ही घटक हैं। इनमें ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल मुख्य रूप से शामिल हैं। यह भी ज़ाहिर है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) भी भाजपा की ही बी पार्टी बनकर बंगाल की तरह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के मैदान में उतर रही है। लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारतीय समाज पार्टी और अपना दल को भाजपा ने उनकी शर्तों पर शामिल किया है। क्योंकि ये दोनों ही पार्टियाँ कुछ समय पहले तक भाजपा से नाराज़ चल रही थीं, जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देकर उसने मनाया है।

इसके अलावा प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) जैसी पार्टी भी है, जिसका पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ख़ासकर मुज़फ़्फ़रनगर, बाग़पत, मेरठ, मथुरा और इन ज़िलों के आसपास के इलाक़ों में ठीकठाक दबदबा है। भले ही उसने पिछले चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, मगर इस बार उसके पक्ष में काफ़ी वोट जाएँगे। चर्चा है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिहार की भाजपा की सहयोगी पार्टी जद(यू)भी 200 सीटों पर मैदान में उतरेगी। मगर निर्दलीयों को भी कम नहीं आँकना चाहिए। क्योंकि उत्तर प्रदेश में निर्दलीय प्रत्याशी ठीकठाक संख्या में जीत हासिल करते हैं। इस बार भी काफ़ी निर्दलीयों के जीतने की उम्मीद है।

मेडिकल कॉलेज पर घमासान

उत्तर प्रदेश में इन दिनों मेडिकल कॉलेज और मूर्तियों पर घमासान मचा हुआ है। दरअसल केंद्र सरकार ने मेडिकल कॉलेज में यूजी और पीजी की पढ़ाई में पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमज़ोर अगड़ों को आरक्षण देने की बात कही है। अर्थात् भाजपा ने इस बार पिछड़ा वर्ग और अगड़ा वर्ग के कमज़ोर तब$के के आगे आरक्षण का चारा फेंका है। भाजपा के इस दाँव पर दूसरी पार्टियाँ हमलावर हो रही हैं और इसका काट ढूँढ रही हैं। इसके अलावा प्रदेश की योगी सरकार ने नौ मेडिकल कॉलेजों की सौगात प्रदेश को देने का वादा किया है।

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि मेडिकल कॉलेज तो समाजवादी पार्टी की देन हैं, जिन्हें लेकर भाजपा दाँव खेल रही है। उनका यह भी कहना है कि विधानसभा चुनाव में सिर्फ़ छ:-सात महीने ही बचे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जिस सरकार ने साढ़े चार साल में शिक्षा पर इतना ध्यान नहीं दिया, वह इतने कम समय में नौ मेडिकल कॉलेज बनाएगी, यह बात समझ से परे है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार पहले से प्रदेश में खड़े मेडिकल कॉलेजों के नाम बदल रही है, जिसका विरोध भाजपा में ही ख़ूब हो रहा है। सच तो यह है कि भाजपा के प्रदेश सिपहसालार और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाम बदलू हैं, काम करने वाले नहीं। क्योंकि काम करने वाले नाम बदलने में समय नहीं गँवाते।