उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन में ढील लापरवाही बरत रहे लोग

जानलेवा शराब


उत्तर प्रदेश में पूर्ण तालाबंदी के समय में भी कई शराब भट्ठियों पर शराब के शौक़ीनों की लम्बी-लम्बी लाइनों को देखा गया, मगर कहीं किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई। हालाँकि अस्पतालों और शमशान घाटों पर भी लम्बी-लम्बी क़तारें देखी गयीं, मगर वो लोगों की एक मजबूरी थी। योगी सरकार द्वारा शराब की बिक्री पर रोक नहीं लगाने से कई सवाल खड़े होते रहे हैं, मगर अलीगढ़ में हुए ज़हरीली शराब से हुई मौतों को लेकर बवाल मच गया। बड़ी बात यह है कि अलीगढ़ में किसी कच्ची शराब माफिया की वजह से यह हादसा नहीं हुआ है, बल्कि सरकारी शराब की दुकान पर देसी शराब बेचने से हुआ है। सवाल यह है कि सरकारी शराब के ठेके पर देसी ठर्रा में ज़हर किसने मिलाया? क्या इसके पीछे राजनीतिक लोगों और माफियाओं का गठजोड़ है? अगर ऐसा नहीं है, तो ऐसा कैसे हुआ कि सरकारी ठेके पर ज़हरीली शराब बेची गयी? मामला जो भी हो, ज़िले के उन 108 लोगों को तो वापस नहीं लाया जा सकता, जिनकी जान शराब माफिया ने ले ली।
अगर यह हादसा किसी अवैध शराब माफिया की वजह से हुआ होता, तो दूसरी बात थी, मगर यहाँ तो सरकारी ठेके पर ही लोचा हुआ है। यह अलग बात है कि पुलिस ने इस शराब मृत्युकांड के मुख्य आरोपी एक लाख के इनामी ऋषि शर्मा, अनिल चौधरी और विपिन यदव समेत तक़रीबन 62 लोगों आरोपी को गिरफ़्तार किया गया है। मगर ख़ास बात यह है कि ऋषि शर्मा, जो सरकारी ठेके पर ही ज़हरीली शराब का धन्धा कर रहा था और मुख्य आरोपी है; भाजपा नेता है। उसके इस काले धन्धे ने क़रीब 108 लोगों की जान ले ली, जबकि कई बीमार हो गये।
बताया जा रहा है कि ऋषि के अवैध रूप से बने फार्म हाउस को प्रशासन ने जेसीबी से ध्वस्त करा दिया है। एक और सूचना के मुताबिक, अलीगढ़ ज़िले के 521 शराब ठेके में 390 ठेकों में इनकी शराब पहुँच रही थी। सीधी-सी बात है कि इतनी बड़ी संख्या में सरकारी ठेकों पर बिना शासन-प्रशासन की मिलीभगत के तो ज़हरीली शराब नहीं पहुँच सकती।