उत्तर प्रदेश: एक शहर का कहर

अंसल एपीआई की सरकार में पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह जब चाहे जहां चाहे अपनी योजना के आस-पास की सरकारी जमीनों पर भी कब्जे से नहीं हिचकता. इसका उदाहरण हाईटेक टाउनशिप के पास ही स्थित बरौना गांव में देखने को मिला. गांव के खसरा संख्या एक से 116 तक की करीब 150 एकड़ जमीन आवास विकास परिषद की ओर से अंसल एपीआई को स्थानांतरित नहीं की गई थी. इस जमीन के अपने पक्ष में अधिग्रहण के लिए आवास विकास परिषद साल 2000 में ही नोटिस जारी कर चुकी थी. इसके बावजूद बिल्डर ने आवास विकास परिषद की अनुमति के बगैर बरौना गांव की करीब 80 प्रतिशत जमीन किसानों से सीधे खरीद ली. आवास विकास परिषद को जब इसकी भनक लगी तो आनन-फानन में अधिकारी अपने बचाव के लिए हाई कोर्ट गए. कोर्ट ने कुछ समय पूर्व अपने निर्णय में खसरा संख्या एक से 116 तक की जमीन का फैसला आवास विकास परिषद के पक्ष में सुनाया. उधर, अंसल एपीआई किसानों को मुआवजा दे चुका है लिहाजा पूरा मामला फंस चुका है. गौरतलब है कि 2004 में अंसल को जो 1,527 एकड़ जमीन सरकार की ओर से दी गई थी वह भी आवास विकास परिषद की ही थी. बरौना गांव की जमीन भी आवास विकास परिषद के पास ही थी जो अंसल एपीआई को नहीं दी गई थी.

अंसल एपीआई के रुतबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो अधिकारी इसकी योजना के बीच में आता है उसका तबादला होने में भी देर नहीं लगती. इसका ताजा उदाहरण लखनऊ के पूर्व कमिश्नर संजीव दुबे हैं. सूत्र बताते हैं कि अप्रैल महीने में लखनऊ विकास प्राधिकरण बोर्ड की बैठक होनी थी, जिसमें कुछ ऐसे प्रस्तावों को भी मंजूरी दिलाए जाने की बात थी जो अंसल एपीआई को सीधे लाभ पहुंचा रहे थे. इसमें बरौना गांव की जमीन से जुड़ा मामला भी था. सूत्रों के मुताबिक यह जानकारी जब कमिश्नर को हुई तो उन्होंने मना कर दिया. जिसका नतीजा यह रहा कि दुबे का तत्काल तबादला कर दिया गया. इसके बाद इलाहाबाद के कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी को लखनऊ का कमिश्नर बनाया गया. चतुर्वेदी को जब पूरा प्रकरण पता चला तो उन्होंने भी इस पद पर आने से मना कर दिया. लिहाजा थक-हार कर शासन को चतुर्वेदी का स्थानांतरण आदेश निरस्त करना पड़ा. सीनियर आईएएस अधिकारियों के बीच अब इस बात की चर्चा जोरों पर है कि सरकार एक ऐसे आईएएस अधिकारी की खोज कर रही है जो आसानी से अंसल के सारे फंसे हुए पेंच निकाल सके.

इस काम के लिए कोई अधिकारी तैयार नहीं हो रहा लिहाजा पिछले करीब डेढ़ सप्ताह से लखनऊ कमिश्नर का पद रिक्त चल रहा है. सूत्र बताते हैं कि बोर्ड की बैठक में जो निर्णय होने थे उनमें से कुछ भूउपयोग परिवर्तन किए जाने के बारे में भी थे. सूत्रों के मुताबिक दरअसल बिल्डर ने कुछ मामलों में जमीन का भू-उपयोग बदलवाए बिना ही उसे बेच दिया है. इसमें से एक बड़ी जमीन पर वॉलमार्ट का स्टोर काफी दिनों से चल रहा है तो उससे कुछ ही दूरी पर एक पांच सितारा होटल भी बन रहा है. कागजों में जिस जमीन का बिना भूउपयोग बदलवाए निर्माण कार्य हो गया है उसमें से 15.071 हेक्टेयर जमीन वाहन क्रय विक्रय केंद्र एवं 87.47 हेक्टेयर जमीन सामाजिक शोध संस्थाओं एवं सेवाओं के नाम दर्ज है. ऐसे में जो अधिकारी इस काम को अंजाम देता, आज नहीं तो कल जांच में उसकी गर्दन फंसना तय है.

उधर, इस पूरे मामले में किसान हर कदम पर अपने आप को छला महसूस कर रहा है. बिल्डर की कारगुजारी से तंग आकर इसी साल 21 मार्च को दलित किसान नौमीलाल ने आत्मदाह कर लिया. नौमीलाल की पत्नी सुंदरा देवी बताती हैं कि नौ मार्च को उनकी जमीन पर कब्जा करके अंसल ने सड़क बनाने का काम शुरू किया. नौमीलाल ने पहले अंसल एपीआई के अधिकारियों से मिल कर इसकी शिकायत करने का प्रयास किया लेकिन सुनवाई नहीं हुई तो 11 मार्च को नौमीलाल की ओर से पीजीआई थाने में एक लिखित शिकायत की गई. थाने वालों ने भी प्रार्थना पत्र तो रख लिया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की. 14 मार्च को भाकियू कार्यकर्ताओं ने नौमीलाल के समर्थन में अंसल के कार्यालय के बाहर धरना भी दिया लेकिन कोई असर नहीं हुआ. हर जगह से निराशा मिलते देख नौमीलाल ने 21 मार्च की सुबह खुद को आग के हवाले कर दिया. राजधानी में ही बिल्डर के उत्पीड़न से त्रस्त किसान द्वारा अत्महत्या किए जाने की घटना से प्रशासन का चिंतित होना स्वाभाविक  स्वाभाविक था.  इसके बाद कार्रवाई के नाम पर अंसल प्रबंधन पर गोसाईगंज थाने में मुकदमा लिखा गया. नौमीलाल छह दिन जिंदगी और मौत से जूझते रहे. अंत में 26 मार्च को उनकी मृत्यु हो गई. नौमीलाल की मृत्यु के बाद अंसल एपीआई ने जिला प्रशासन के माध्यम से उसके परिजनों को 15 लाख का मुआवजा दिया.

उधर, कंपनी के अधिशासी निदेशक (ऑपरेशंस) रमेश यादव कहते हैं, ‘नौमीलाल की जिस जमीन पर सड़क बनाई जा रही थी उसका मुआवजा उसे 2004 में ही दिया जा चुका था.’  लेकिन नौमी के परिजन इस बात को सिरे से नकारते हैं. नौमी की बेटी संगीता बताती है, ‘पिता जी के नाम एक ही एकाउंट था. उसमें यदि कोई रकम 2004 में आई होती तो उसका रिकार्ड जरूर होता.’ भाकियू नेता हरनाम सिंह कहते हैं, ‘अंसल एक बार नौमी की जमीन का मुआवजा दे चुका था तो उसने नौमीलाल की मौत के बाद 15 लाख रुपये क्यों दिए. कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है जिसके कारण कंपनी प्रबंधन को खुद के फंसने का डर सता रहा था. परिवार शांत हो जाए और मामला दब जाए, इसीलिए 15 लाख रुपये दिए गए.’

[box]150 एकड़ जमीन के लिए आवास विकास परिषद साल 2000 में ही नोटिस दे चुकी थी. इसके बावजूद बिल्डर ने  इसमें से 80 फीसदी जमीन किसानों से सीधे खरीद ली[/box]

उदाहरण जमीन पर कब्जा करने के ही नहीं फर्जी तरीके से जमीन की रजिस्ट्री करने के भी हैं. बगियामउ गांव का किसान राम सागर यादव जुलाई, 1997 में घर से बाजार दवा लेने के लिए निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा. परिजनों ने काफी दिनों तक उसकी खोजबीन की. जब कहीं भी उसका पता नहीं चला तो छह अगस्त, 1997 को गोसाईगंज थाने में राम सागर के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई. राम सागर के भाई राम रूप बताते हैं कि तीन भाइयों के पास 10 बीघा जमीन थी. पूरी जमीन की रजिस्ट्री तीन जून, 2006 को अंसल एपीआई के नाम हो गई. हैरानी की बात यह है कि रजिस्ट्री में तीनों भाइयों राम सागर, राम रूप और रामदेव की फोटो लगी हुईं हैं.

सवाल उठता है कि जो राम सागर 1997 से अब तक गायब है उसके हिस्से की भी जमीन अंसल एपीआई के नाम कैसे रजिस्ट्री हो गई. राम रूप बताते हैं, ‘जिस समय रजिस्ट्री हुई उस समय मेरी और मेरे भाई रामदेव की ही फोटो कागज पर लगी थी. राम सागर की फोटो उस पर नहीं थी. लिहाजा हम दो भाइयों के हिस्से की ही जमीन अंसल को बेची जानी थी लेकिन बाद में पता चला कि अंसल ने पूरी दस बीघा जमीन ले ली है. जब दौड़-भाग कर तहसील से कागजात निकलवाए गए तो सभी अवाक रह गए. दो भाइयों के साथ-साथ राम सागर के हिस्से की जमीन भी अंसल के नाम दर्ज हो चुकी थी और कागजों में दो के स्थान पर तीन फोटो लगी थीं. जिस तीसरे व्यक्ति की फोटो लगी थी उसे राम सागर बना कर जमीन ली गई है. रजिस्ट्री में राम सागर के स्थान पर जिस व्यक्ति की फोटो लगी है उसकी उम्र 50 से 55 साल के बीच की मालूम होती है, जबकि राम सागर की उम्र महज 30 साल थी. ‘

और उदाहरण सिर्फ बड़ी जमीनों के ही नहीं हैं. मेहनत-मजदूरी करके परिवार का पेट पालने वाले ग्रामीणों की छोटी-छोटी जमीनें भी उनसे छिन गईं. राम गोपाल लोधी बताते हैं कि उनके पास कुछ 13 बिस्वा (20 बिस्वा में एक बीघा होता है) जमीन थी. वे कहते हैं, ‘आठ बिस्वा जमीन पर दो भाई मकान बनाकर रहते हैं, पांच बिस्वा जमीन घर के एकदम बाहर तीसरे भाई के हिस्से की बची थी. अंसल एपीआई ने पांच बिस्वा जमीन पर कंटीला तार लगा कर उसे टाउनशिप में ले लिया.’ इस जमीन का न तो राम गोपाल के परिजनों को मुआवजा मिला और न ही कोई लिखा पढ़ी हुई. अकेले राम गोपाल ही नहीं बल्कि मदन, जानकी, प्रेम कुमार, अशोक सहित दर्जनों ऐसे ग्रामीण हैं जिनकी घर के बाहर जो थोड़ी-बहुत जमीन थी उस पर आज बिल्डर का कब्जा हो चुका है.

महमूदपुर निवासी राजपती की तीन बीघा जमीन अंसल एपीआई ने ले तो 2006 में ली थी लेकिन उसका जो चेक दिया गया वह बाउंस हो गया. राजपती बताती हैं कि जमीन उनके पति केसन के नाम थी. तीन बीघा जमीन के बदले उन्हें 3,86, 545 रुपये का बैंक ऑफ इंडिया का चेक दिया गया. चेक पर किसी संजीव नाम के व्यक्ति के हस्ताक्षर थे. राजपती के परिजनों ने जब चेक को गोसाईगंज स्थित विजया बैंक में लगाया तो वह बाउंस हो कर वापस आ गया. राजपती बताती हैं, ‘चेक को लेकर काफी भागदौड़ की गई लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.’ परिवार के लोग आज भी चेक को संभाल कर रखे हुए हैं.

नौमीलाल, रामगोपाल, राम सागर और राजपती तो एक उदाहरण भर हैं. हाईटेक टाउनशिप के बीच में आने वाले दर्जनों गांवों के सैकड़ों ऐसे परिवार हैं जिनकी गिनती कल तक अच्छे किसानों में होती थी लेकिन बिल्डर की कारगुजारी के चलते आज वे परिवार का पेट पालने को भी मोहताज हैं. राजपती, राम सागर और राम गोपाल के मामलों में अंसल के अधिशासी निदेशक (ऑपरेशंस) रमेश यादव कहते हैं कि उन्हें इस तरह की कोई जानकारी ही नहीं है. धन-बल के आगे राजधानी लखनऊ में जब किसानों का यह हाल है तो दूर-दराज के इलाकों में विकास के नाम पर जमीन अधिग्रहण के चलते किसानों की क्या दशा होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here