इतिहास के दो आख्यान

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लेखक तात्कालिक घटनाओं की पुनर्व्याख्या कर रहे हैं. वे भाषणों, संवादों, पत्रों, और आत्मकथाओं के अंश से तत्कालीन घटनाक्रमों और उसके सूत्रधारों के  आपसी संबंधों की विस्तार से व्याख्या कर रहे हैं. वाम-दक्षिण राजनीति के संदर्भों और उनके विरोधाभासों पर भी अच्छी चर्चा कर रहे हैं. वे सांप्रदायिकता की राजनीति की व्याख्या कर रहे हैं, लेकिन तत्कालीन राजनीति के महत्वपूर्ण केंद्र रहे डाॅ. आंबेडकर को अधिक महत्व नहीं देते हैं. कम्युनल अवार्ड की चर्चा तो हुई है, उससे दुखी नेताओं की भी, लेकिन पुणे पैक्ट की चर्चा के बहाने भी डा. आंबेडकर की राजनीति की कोई चर्चा नहीं है. हो सकता है कि विषय की सीमा का तर्क लेखक के सामने हो, लेकिन पाकिस्तान बनने और ‘हिन्दू भारत’ के संदर्भ में ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ के लेखक की सक्रियता की चर्चा उन्हें क्यों न्यायसंगत नहीं लगती है! लेखक अपने उद्देश्यों के साथ इस तरह संबद्ध होते चले गए हैं कि वल्लभ भाई पटेल को गैर-सांप्रदायिक और योग्य प्रशासक के रूप में  प्रस्तुत करते हुए जवाहरलाल नेहरू की व्यक्तिगत आस्थाओं, धर्म के प्रति बदलती आस्थाओं,  को  पटेल के द्वैध (बाइनरी) में प्रस्तुत कर पाठकों को कुछ संकेत-सा देने लगते हैं. यह सच हो सकता है कि पटेल की छवि उनके यथार्थ से अलग बनती चली गई हो जिसे फिर से समझने की जरूरत है, लेकिन उसे नेहरू के बाइनरी में फिर से देखने का क्या तात्पर्य !

पुस्तक अपनी समग्रता में महत्वपूर्ण है और तत्कालीन भारत को नए सिरे से समझने का आधार भी प्रदान करती है. बशर्ते पाठक अपनी दृष्टि के साथ प्रस्तुत सामग्रियों और विचारों का अध्ययन करे. प्रियंवद की मीमांसा एक अलहदा दृष्टि के साथ उसकी मदद करेगी. यहां ऐसे कई प्रसंग हैं जो तत्कालीन भारत के सूत्रधारों के आपसी संबंधों की अनकही कथाएं प्रस्तुत करते हैं.

-संजीव चन्दन

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