इजराइल-फिलिस्तीन फ़िलवक़्त शान्त

ओआईसी संगठन को मध्य-पूर्व में निरंतर चलने वाले सिया और सुन्नियों के बीच तनाव कम करने की दिशा में काम करना चाहिए। आज ईराक, सीरिया और कई अफ्रीकी देशों में आतंकवादी समूह सक्रिय हैं, जो पूरी दुनिया की शान्ति व्यवस्था के लिए ख़तरा हैं। यहाँ आये दिन जिस तरीक़े से आम इंसान मर रहे हैं और आतंकवादी संगठन युवाओं को धर्म के नाम पर गुमराह करके उन्हें वीभत्स हमलों के लिए लगातार उकसा रहे हैं, वह बेहद दु:खद है। आज आईएसआईएस और बोको हराम जैसे ख़तरनाक आतंकवादी समूहों से ट्रेनिंग लेकर छोटे-छोटे लड़ाका जिस तरह से सक्रिय हैं, वो पूरी दुनिया के लिए बेहद चिन्ता का विषय है। ओआईसी को इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि कैसे मुस्लिम युवाओं को दहशत फैलाने वाले इन आतंकवादी समूहों से जुडऩे से रोका जाए और इस क्षेत्र में शान्ति और सद्भाव का रास्ता तैयार किया जाए।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ओआईसी और संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों ही दुनिया के बड़े संगठनों का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाये रखना है; लेकिन वर्तमान में इनकी भूमिका प्रश्नों के घेरे में है। ओआईसी से जुड़े बहुत देशों में लोकतंत्र नाम की चीज़ नहीं है, मध्य पूर्व के देशों में अभी भी राजशाही चल रही है। ऐसे में इन दोनों अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को लोगों में समानता लाने और उनके अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना चाहिए। यह स्पष्ट है कि जब तक ओआईसी के सदस्य देश व्यक्तिगत लाभ की नीति छोडक़र अपने आसपास की दुनिया में हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़एकजुट होकर मुखर नहीं होंगे, विस्तारवादी शक्तियाँ इनका हक़ छीनती रहेंगी। अभी बात फिलिस्तीन तक है, कल वृहत इजराइल नीति के तहत और भी देश इसके शिकार होंगे और ओआईसी के सदस्य देश एक बार फिर से सि$र्फ निंदा करेंगे।

बातचीत से ही सुधरेंगे हालात


इजराइल और चरमपंथी गुट हमास के संघर्षविराम के कुछ दिनों बाद ही भारत में फिलिस्तीनी प्रशासन के राजदूत ने कहा कि भारत को दोनों देशों के बीच शान्ति प्रक्रिया को बहाल करने में भूमिका निभानी चाहिए। कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र संघ भी यही चाहता था कि इजराइल और फिलिस्तीन के बीच शान्ति समझौते को लेकर भारत मध्यस्थता करे। पिछले साल ईरान और अमेरिका के तनाव के दौरान भारत में ईरान के राजदूत ने भी कहा था कि अगर दोनों देशों के बीच भारत शान्ति समझौते को लेकर कोई पहल करता है, तो ईरान उसका स्वागत करेगा। फिलिस्तीन और संयुक्त राष्ट्र संघ यह बात अच्छे से समझते हैं कि भारत का पश्चिम एशिया के देशों के साथ बेहतर सम्बन्ध है और इस क्षेत्र में यह कई कारणों से विशेष रुचि भी रखता है।

भारत के पश्चिम एशिया की नीति और पश्चिमी देशों के साथ इसके गहरे सम्बन्ध को फिलिस्तीन बख़ूबी समझता है, इसलिए वह भारत से थोड़ीज़्यादा उम्मीद कर रहा है। फिलिस्तीन को यह उम्मीद यकायक नहीं पनपा, बल्कि भारत के साथ उसके पुराने और विश्वसनीय सम्बन्धों के कारण ऐसा वह सोच रहा है। पिछले कई वर्षों से फिलिस्तीन स्पष्ट मानता रहा है कि भारत उसका साथ देता रहा है। हाल ही में भारत ने वहाँ विकास के कार्यों को भी आगे बढ़ाया है। अगर हम वर्तमान में वैश्विक सम्बन्धों को अच्छे से समझने कि कोशिश करें, तो पाते हैं कि भारत ही वह देश है, जिसके दुनिया के दो बड़े और बेहद शक्तिशाली देश, यानी अमेरिका और रूस के साथ बहुत बेहतर सम्बन्ध हैं। ऐसे में फिलिस्तीन को लगता है कि भारत इनके साथ इस मुद्दे पर बातचीत कर अगर इजराइल पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाये, तो यहाँ शान्ति व्यवस्था को मज़बूती मिलेगी।

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा पहले के मुक़ाबले थोड़ीज़्यादा बढ़ी है और इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ, ओआईसी, अमेरिका, रूस, चीन तथा पाकिस्तान इस बात को अच्छे से जानते हैं। यह सम्भव भी हो कि भारत बड़े देशों को साथ लेकर अगर इजराइल से शान्ति के समझौते को लेकर कुछ बात करे, तो शायद बात बने। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इजराइल और फिलिस्तीन एक दूसरे के प्रति अपनी नीतियों में बदलाव लाना चाहते हैं? या केवल एक-दूसरे पर संगीन आरोप लगाकर हिंसात्मक गतिविधियों में फँसे रहना चाहते हैं? इस क्षेत्र के वर्तमान परिस्थितियों को समझने पर यही लगता है कि दोनों तरफ़ऐसे संगठन / पार्टियाँ हैं, जो हिंसा को बढ़ावा देना चाहते हैं और दे भी रहे हैं। जब भी यहाँ हालात बिगड़ते हैं और स्थिति संघर्ष में बदल जाती है, तब ये दोनों देश एक-दूसरे पर पहले हमला करने का आरोप लगाते हैं।

ज़्यादातर मामलों में यहाँ ऐसा ही होता है और इससे बाहरी दुनिया के देशों और संगठनों को यह पता ही नहीं चल पाता कि आख़िर पहले हमला किसने और क्यों किया? ऐसे में किसी तीसरे देश या संगठन के लिए शान्ति समझौते के प्रस्ताव को पेशकश करना, तो आसान होगा। लेकिन शान्ति बहाली के लिए बहुत सारी बातों पर अमल करना दोनों देशों के लिए आसान नहीं होगा। संघर्षविराम के बाद भी हमास और इजराइल जिस तरह से आने वाले समय को लेकर बयानबाज़ी कर रहे हैं, उससे आगे हालात बनने की जगह सि$र्फ बिगड़ेंगे और इसका ख़ामियाज़ा वहीं के लोग भुगतेंगे। इजराइल को यह बात अच्छे से समझनी चाहिए कि फिलिस्तीनियों के साथ उसका ज़मीन के केवल टुकड़े की लड़ाई नहीं है, बल्कि वे उस क्षेत्र में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, जो कभी फिलिस्तीन में बसने के पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इजराइल ने भी लड़ी थी। चरमपंथी संगठन हमास भी ग़लत$फहमी दूर करके एक बात स्पष्ट समझ लें कि हज़ारों रॉकेट दाग़कर भी वह इजराइल काज़्यादा कुछ बिगाड़ नहीं सकता। हाँ, ऐसा करने से इसकी भारी क़ीमत उसे और फिलिस्तीनियों को ज़रूर चुकानी पड़ सकती है, जो वे चुका भी रहे हैं।

इजराइल और फिलिस्तीन दोनों को हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि का दिया गया बयान एक बार फिर से सुनना चाहिए, जिसमें भारत ने दोनों देशों से आपसी बातचीत के ज़रिये इस मामले को निपटाने की अपील की और साथ ही साथ दोनों तरफ़से जारी हिंसा की निंदा की। दोनों देशों को एक बात अच्छे से समझ लेनी चाहिए कि हिंसा से किसी परिणाम पर नहीं पहुँचा जा सकता। विश्व इतिहास में ऐसे अनगिनत मामले हैं, जहाँ आपस में एक-दूसरे के विरुद्ध ताक़त और हिंसा के प्रदर्शन से सिर्फ़ बर्बादी ही हुई है, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हुई। हमास द्वारा इजराइल पर हज़ारों रॉकेट दाग़ना और इजराइल द्वारा लगातार फिलिस्तीन की ज़मीन को ताक़त के दम पर हथियाना, ये दोनों कार्य बेहद निंदनीय हैं; और इससे यहाँ एक-दूसरे के प्रति केवल असन्तोष और हिंसा की भावना पनपेगी, जो दुर्भाग्य से यहाँ हो भी रहा है। जिस तरीक़े से इस बार इन दोनों ने एक-दूसरे पर हमले किये और बहुत सारे देश आपस में इस मामले को लेकर गोलबंदी करते हुए युद्ध को बढ़ावा देते देखे गये, वह बेहद दु:खद है। आये दिन यहाँ जिस तरह से आम लोग हिंसा में मारे जा रहे हैं और उनकी सम्पतियाँ बर्बाद हो रही हैं, उससे यह एक वैश्विक मुद्दा बन गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को ऐसे मामले को लेकर समय-समय पर शान्ति सम्मेलन के प्रयास करने चाहिए और बड़े देशों को दुनिया में शान्ति स्थापित करने के लिए उनकी भूमिका को लगातार याद दिलाते रहना चाहिए, ताकि किसी भी देश की अकड़ और ज़िद से वैश्विक माहौल न बिगड़े।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)