आपदा का खनन

इसके अलावा जो खनिज प्रशासन द्वारा आवंटित पट्टों से बाहर जाता है उसको लेकर भी तमाम तरह की गड़बड़ियां देखने को मिलती हैं. सहारनपुर के सामाजिक संगठन, सैनी युवा चेतना मंच के एक कार्यकर्ता हमें बताते हैं, ‘इन पट्टों से बड़े-बड़े ट्रकों में माल ले जाया जाता है लेकिन कागजों (एम-एम-11 फॉर्म) पर जितना माल दिखाते हैं उससे ज्यादा तो बैलगाड़ी में ही आ जाता है, प्रशासन बिना आपत्ति के खनन माफियाओं के इस झूठ को स्वीकार करके उन्हें नए रवाने जारी कर देता है. महीने में एक-दो बार किसी ट्रक का चालान भी हो जाता है जिससे जिला प्रशासन की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है.’ रवाने में माल को कम दिखाने वाली बात की पुष्टि करते हुए स्टोन क्रशर्स वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘जितने खनिजों की बिक्री के लिए इन पट्टाधारकों को तीन साल का पट्टा दिया जाता है उतना तो ये लोग सिर्फ 15 दिन में ही बेच देते हैं. खुले-आम जेसीबी मशीनों से खुदाई की जाती है जो कि नियमानुसार प्रतिबंधित है.’

रवाने में ज्यादा माल को कम दिखाने से न केवल पट्टाधारक सरकार को रॉयल्टी की एक बड़ी रकम देने से बच जाते हैं बल्कि उनके पट्टे के लिए निर्धारित खनिज की मात्रा भी कागजों पर समाप्त नहीं होती. इस वजह से उन्हें प्रशासन से लगातार रवाने मिलते रहते हैं और वे खुद और दूसरों के किए अवैध खनन को वैध बनाने के खेल में लगे रहते हैं. जिला प्रशासन द्वारा खनन माफियाओं को गलत तरीकों से अधिक रवाने जारी करने की बात सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हुई जांच में भी सामने आई थी. इसमें कहा गया था कि ‘सहारनपुर जिले में सिर्फ तीन महीने के दौरान ही 60,176 अतिरिक्त रवाने जारी किए गए हैं. इन रवानों के जरिए 2,40,704 क्यूबिक मीटर अवैध खनिज बेचा गया है. और असल में तो बेचे गए अवैध खनिज की मात्रा इससे भी कहीं ज्यादा होगी क्योंकि ये रवाने ट्रैक्टर ट्राली के हिसाब से जारी किए जाते हैं. जबकि इन खनिजों को अधिकतर बड़े ट्रकों में ले जाया जाता है.’

सहारनपुर जिले में खनन का काम इसलिए भी खूब फल-फूल रहा है कि यह उत्तर प्रदेश का ऐसा जिला है जिसकी सीमा तीन राज्यों से मिलती हैं. इस कारण उत्तर प्रदेश के साथ ही यहां से उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल में भी खनिज बेचा जाता है. सहारनपुर और हरियाणा की सीमा को वही यमुना नदी अलग करती है जिसको नोंच-नोंच कर यह खनन किया जा रहा है. जानकारों के मुताबिक हरियाणा में इन दिनों खनन बंद होने से वहां खनिज की मांग बहुत ज्यादा हो गई है. ऐसे में हरियाणा के लोग यमुना के दूसरी ओर खनन करने के बाद उसे कानूनी रूप देने के लिए खनन माफियाओं से रवाना हासिल कर लेते हैं.

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खनन पट्टे पाने वाले समूह में बहुजन समाज पार्टी के विधान परिषद सदस्य मोहम्मद इकबाल के भाई, उनके पुत्र एवं अन्य नजदीकी लोग शामिल हैं

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एक तरफ इस क्षेत्र में अवैध खनन का खेल जारी है तो दूसरी तरफ अवैध स्टोन क्रशर इसके पूरक का काम कर रहे हैं. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद कई स्टोन क्रशरों पर रोक लगाई गई थी लेकिन इनमें से ज्यादातर कभी बंद ही नहीं हुए. स्थानीय अखबारों में लगातार सील किए गए क्रशरों के चलते रहने की खबरें छपती रही हैं. इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि कई स्टोन क्रशर यमुना नदी में ही लगा दिए गए हैं. नियमानुसार किसी भी स्टोन क्रशर की नदी तट से दूरी कम से कम पांच सौ मीटर होनी चाहिए. लेकिन सहारनपुर में दर्जनों स्टोन क्रशर इन मानकों का खुले आम उल्लंघन करते हैं. यहां तक कि हथनीकुंड बैराज से महज दो किलोमीटर से भी कम दूरी पर एक-दो नहीं बल्कि सात स्टोन क्रशर स्थापित किए जा चुके हैं. ईमानदारी से स्टोन क्रशर चलाने की इच्छा रखने वालों की परेशानियों के बारे में बताते हुए महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘ऐसे स्टोन क्रशरों ने उन सभी का काम मुश्किल कर दिया है जो वैध तरीके से क्रशर चला रहे हैं. हमें कच्चा माल नदी से अपने क्रशर तक लाना पड़ता है. इसमें काफी खर्च आता है. जबकि जो स्टोन क्रशर नदी में ही बने हैं वे वहीं से कच्चा माल उठा रहे हैं.’

ऐसे अवैध क्रशरों से होने वाले खतरों के बारे में आशीष सैनी बताते हैं, ‘बैराज के इतने नजदीक बने ये क्रशर वहां खनन भी खुलेआम कर रहे हैं. कुछ समय बाद यह बैराज टूटने के कगार पर होगा. हजारों की जिंदगी को दांव पर लगाकर यह खनन हो रहा है. इन अवैध स्टोन क्रशरों में से एक उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री असलम खान का है और एक हरियाणा के यमुनानगर से विधायक दिलबाग सिंह का. जब इतने प्रभावशाली लोग ऐसे अवैध धंधे में हैं तो कोई क्या करे ?’

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