आदि चिकित्सा की वैद्यराज महिलाएं

शुरुआत में स्वाभाविक तौर पर बहुत कठिनाइयां आती रहीं क्योंकि इस पेशे में आने से पहले महिलाओं को कई बार सोचना पड़ रहा था और फिर घर-समाज से इजाजत लेने की बात भी थी. लेकिन धीरे-धीरे राह आसान होती गई. फिर नोवामुंडी में होड़ोपैथी दवाओं की दुकान भी खोली गयी.दवाओं का निर्माण महिलाओं द्वारा कुंदरीजूर गांव में होने लगा. दवा निर्माण के लिए जंगल से नीम, अजरुन, हरसिंगार, तुलसी, चिरैता तथा अन्य औषधीय सामग्री व जड़ी-बूटी जुटाने का काम भी ये महिलाएं स्वयं ही करती हैं.

शुरु में जिन गांवों में ये महिलाएं दवा देने जाती थीं, वहां की गंभीर समस्या मलेरिया है. इसे ध्यान में रखते हुए उन गांवों में इन महिलाओं द्वारा मलेरिया के कारण व उससे बचने के उपाय से संबंधित एक घंटे की फिल्म भी स्थानीय हो भाषा में तैयार की गयी. अपनी बोली में तैयार फिल्म को देखने में लोगों की रुचि जगी, फिर महिलाओं पर समाज का भरोसा बढता रहा और अब तो ये महिलाएं ही कई गांवों में पहली और आखिरी उम्मीद की तरह हैं. स्वास्थ्य में जो फायदा हुआ, वह तो हुआ ही, इसका सबसे बडा फायदा अंधविश्वास को दूर करने में हुआ. रश्मि बताती हैं, ‘डायन आदि के नाम पर प्रताड़ित करने का चलन कम हुआ है, क्योंकि डायन आदि बीमारियों से भी जुडा मामला रहा है. गांवों में होड़ोपैथी को बढावा देने, महिलाओं को वैद्यराज बनाने के साथ ही इस पद्धति के दस्तावेजीकरण यानी डॉक्यूमेंटेशन का काम भी इन महिलाओं द्वारा शुरू किया गया है क्योंकि होड़ोपैथी का लिखित डॉक्टयूमेंटेशन नहीं होने के कारण अगली पीढी में इसके खत्म हो जाने का भी डर है.

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