आत्मा का कोई धर्म नहीं होता

लेकिन कितने ही लोग अभी भी नफ़रतें बो रहे हैं। घृणा कर रहे हैं। कोई भी बच्चा जब पैदा होता है, तो न तो उसे किसी से नफ़रत होती है। न ही वह किसी से भेदभाव करता है। न उसे किसी की ज़ात या मज़हब से कोई लेना-देना होता है। न ही उसे अपने-पराये का भान होता है। इसीलिए तो उसे परमहंस कहा जाता है। ईश्वर का रूप कहा जाता है। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, हम स्वार्थवश उसे अपने-पराये का भेदभाव सिखा देते हैं। नफ़रत और क्रोध की घुट्टी पिला देते हैं। मज़हबी चोला पहना देते हैं। दूसरे धर्म के लोगों से दूर रहने का सबक़ देने लगते हैं। दूसरे धर्म के रीति-रिवाज़ों से दूर रहने की तालीम देते हैं। छुआछूत का ज़हर उसकी नसों में घोल देते हैं। दूसरे धर्म में एक ही ईश्वर, सही मायने में अपने ही ईश्वर का अलग नाम होने के चलते उसे ही गालियाँ देना और भला-बुरा कहना सिखा देते हैं। इसी के चलते वही बच्चे आगे चलकर ख़ून-ख़राबा करते हैं। नफ़रतें बोते हैं। और आगे चलकर अपने बच्चों की नसों में अपने माँ-बाप से भी ज़्यादा ज़हर घोलते हैं।

लेकिन जो लोग अपने बच्चों को मज़हबी बनने से पहले इंसान बनने की सीख देते हैं। या उनके मज़हब में दी गयी शिक्षाओं पर सही से अमल करते हैं, वे कभी ऐसा नहीं करते, बल्कि मुसीबत के समय बिना किसी की ज़ात पूछे, बिना उसका मज़हब जाने उसी मदद करते हैं। आज ऐसे ही लोग हमारे सामने हैं और महामारी में फ़रिश्ते बनकर पीडि़तों की सेवा कर रहे हैं। ख़ून और प्लाज्मा दे रहे हैं। रोज़ा तोडक़र ख़ून और प्लाज्मा देना अपना पहला धर्म समझ रहे हैं। यही तो असली धर्म है। ख़ून का कोई मज़हब नहीं होता। चाहे वह किसी भी इंसान का हो। इंसान भी अगर मज़हबी चोले में न रहे, तो केवल चेहरा देखने भर से कोई नहीं पहचान सकता कि वह किस धर्म को मानता है। वास्तव में मज़हब है ही मानने की चीज़। उसे किसी पर भी जबरन थोपा नहीं जा सकता। आत्मा का भी धर्म नहीं होता, कोई जाति नहीं होती। आत्मा को तो कोई जानता भी नहीं है। सब शरीर को जानते हैं। और शरीर के लिए ही सब कुछ करते हैं।

अगर कोई आत्मा को पहचानता है, तो वह परमहंस हो जाता है, उसे तेरे-मरे से, भेदभाव से, घृणा से, ईष्या से, मोह से कोई काम नहीं। उसके लिए सारा संसार एक जैसा है। उसे क्रोध भी नहीं आता। वह दयालु और मददगार प्रवृत्ति को अपना लेता है। उसे दुनियावी मज़हबों से कोई लेना-देना नहीं। उसे मनुष्य में सिर्फ़ एक ही जाति दिखती है- मनुष्य जाति। उसका एक ही धर्म होता है- इंसानियत। उसका एक ही कर्म होता है- सभी की भलाई। और उसका एक ही उद्देश्य होता है- ईश्वर की प्राप्ति। मुझे आज के तथाकथित उन साधु-सन्तों, मुल्ला-पादरियों पर हैरानी होती है, जो इस संकट की घड़ी में भी मानव सेवा के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। उनसे से अच्छे वे लोग हैं, जो भले ही क्रूर और क्रोधी स्वभाव के हैं, लेकिन कम-से-कम अव्यवस्था पर सवाल तो उठा रहे हैं। और सबसे भले वे हैं, जो मानव-सेवा में दिन-रात लगे हैं। हमें कम-से-कम ऐसा संसारी बनकर रहना चाहिए, तभी हमारी आने वाली पीढिय़ाँ सुरक्षित रह सकेंगी। सुखी रह सकेंगी।