आत्मघात का कारण बन रहा कोरोना वायरस

मनोचिकित्सक डॉ. एम.एल. अग्रवाल कहते हैं- ‘पारिवारिक हत्याओं के मामले हताशा, अवसाद और कुंठा की बन्द गलियों में पैबस्त होते हैं। सब कुछ अनायास और अचानक होता है।’ असल में ऐसी घटनाएँ सिर्फ़ भावनात्मक मुद्दों के गिर्द नहीं टहल रही है। बल्कि महामारी के बढ़ते ख़ौफ ने नाउम्मीदी के अँधेरे इस क़दर बढ़ा दिये हैं कि ज़िन्दा रहने की कोई ख्वाहिश ही नहीं रहती। यहाँ आध्यात्मिक गुरु श्री रविशंकर के कथन का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि आज चारों तरफ़ कोहराम मचा हुआ है। लोग डरे हुए हैं। जब मन टूट जाता है, तो व्यक्ति कुछ नहीं कर पाता। यहाँ शेक्सपियर के एक पात्र का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा, जो पूछता है- ‘त्रासदी क्यों घटित होती है?’ इसका जवाब है- ‘मनुष्य का शत्रु उसके भीतर ही छुपा होता है, जो उसे त्रासद अन्त की ओर ले जाता है। रोज़ाना सु$िर्खयों में ढलते आँकड़े इसकी भयावह तस्वीर खींचते नज़र आते हैं।’ प्रख्यात गीतकार शैलेन्द्र को सम्भवत: इसका पूर्वानुमान हो गया था। तभी उन्होंने लिखा- ‘जो दिन के उजाले में न मिला, दिल ढूँढे ऐसे सपने को। इस रात की जगमग में डूबी मैं ढूँढ रही हूँ अपनों को…।’ मनोचिकित्सकों का कहना है- ‘कोरोना ने खिन्नता, अकेलापन, तनाव और अवसाद जैसी मानसिक बीमारियों को परोसा है। पारिवारिक कलह, आर्थिक तंगी और परिस्थितियों से मुक़ाबला करने में असमर्थता अवसाद को बढ़ाने का काम करती है। कोरोना मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की खुलती पोल ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है।’ सूत्रों की मानें, तो महामारी में नागरिकों की मनोदशा ख़राब हुई है। यह जानने के लिए ‘लोकल सर्कल्स’ द्वारा किये गये एक सर्वे में पाया गया कि कोरोना-काल में लोग दु:खी, ग़ुस्से में और अवसादग्रस्त पाये गये हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है- ‘कोरोना के अंधड़ ने मानसिक तनाव को बढ़ा दिया है।’
कोटा के कोरोना पीडि़त बुजुर्ग दम्पत्ति ने ट्रेन के आगे आकर इसलिए जान दे दी कि वे परिवार को तनावग्रस्त नहीं देखना चाहते थे। वहीं, रेवाड़ी के सेवानिवृत्त एसडीओ युद्धवीर सिंह कोरोना संक्रमित थे। संक्रमण से निजात पाने के लिए उन्होंने अस्पताल की तीसरी मंजिल से छलाँग लगाकर जान दे दी। मनोचिकित्सक डॉ. वीरेंद्र भारद्वाज कहते हैं- ‘कोरोना-ग्रस्त स्थितियों से छुटकारा पाने के लिए लोग यह भयावह आसान राह अपना रहे हैं।’ मोटीवेशन स्पीकर जय शेट्टी कहते हैं- ‘जब तक तनावपूर्ण मानसिकता को नये सिरे से नहीं ढालेंगे, तो दर्द दोहराते चले जाएँगे। यह दर्द के दोहराव की दास्तान ही तो है कि जोधपुर के लोड़ता गाँव में पारिवारिक विवाद से आहत नर्स बेटी ने ज़हरीले इंजेक्शन लगाकर माता-पिता समेत परिवर के 10 सदस्यों को मौत की नींद सुला दिया। गहराती रात में गहराती ख़ामोशी से उबरने का उसे यही उपाय सूझा। रिश्तों में $खून सनी बीकानेर की घटना तो सन्न कर देने वाली है। पति का अपनी माँ की ज्यादा परवाह करना उसकी पत्नी को इतना नागवार गुज़रा कि अपनी 15 साल की बेटी के साथ मिलकर 73 वर्षीय सास चंद्रकँवर को मूसल से पीट-पीटकर मार डाला। कोरोना-काल में लॉकडाउन के हालात बेटे को माँ के नज़दीक कर रहा था और पत्नी से दूरियाँ बढ़ती जा रही थीं। यह बात उसे बर्दाश्त नहीं हुई। अजमेर के भिनाय क़स्बे की घटना में भी एक युवक ने माँ और भाई की हत्या कर दी। घर की बिजली बन्द कर हत्या को अंजाम देने वाला युवक नीट की तैयारी कर रहा था। इस मामले में बीच-बचाव करने आये पड़ोसी भी लहूलुहान होने से नहीं बचे। मनोचिकित्सक डॉ. अग्रवाल कहते हैं- ‘ऐसी वारदात को वही युवक अंजाम देते हैं, जो माहौल में पनपती मनहूसियत को देखकर दिमाग़ी संतुलन खो बैठते हैं।


आख़िर पढ़े-लिखे और अच्छे ख़ासे शिक्षित लोग ख़ुदकुशी पर क्यों उतारू है? मेंटल हेल्थ एवं एक्सपर्ट डॉक्टर सत्यकांत त्रिवेदी चिकित्सा की भाषा में इसे ‘ग्रीफ रिएक्शन’ का नाम देते हैं। डॉक्टर त्रिवेदी कहते हैं कि बढ़ती महामारी आशंकाओं को जन्म देने लगती है कि मैं नहीं रहा, तो मेरे परिवार का क्या होगा? अपने जीवन को व्यर्थ समझने लगना, अपनी मृत्यु के बारे में सोचना। कुछ व्यक्तियों में यह प्रक्रिया जटिल रूप ले लेती है। इसे मनोचिकित्सा में ‘कांप्लीकेटेड ग्रीफ रिएक्शन’ कहते हैं। जयपुर की जगपुरा कॉलोनी में एक सरकारी शिक्षक द्वारा अपनी पत्नी और 13 माह के बेटे की हत्या कर ख़ुद भी फाँसी पर झूल गया कॉम्प्लीकेटेड ग्राफ रिएक्शन की ताज़ा मिसाल है। बच्चों को शिक्षित करने वाले युवक ने ख़ुद ही अपना घर उजाड़ दिया।
डॉक्टर त्रिवेदी कहते हैं कि वास्तविकता को स्वीकार नहीं करना और अंतरंग और रक्त सम्बन्धी रिश्तों में तड़प को बनाये रखना भी इसके लक्षण है। मनोचिकित्सक डॉक्टर विनोद खत्री इसके लिए बाड़मेर की घटना का हवाला देते है। चंद्रकांता नामक लडक़ी को कोरोना से बुजुर्ग पिता की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं हुआ और श्मशान में अन्तिम संस्कार करते समय पिता की जलती चिता में कूद गयी। दिल दहला देने वाली यह घटना बाड़मेर की राय कॉलोनी की है। पिता दामोदर अपनी बेटियों के भविष्य और न्याय के लिए लड़ रहे थे। इस संघर्ष में बेटियाँ सहारा बनी हुई थी। अब परिवार के सामने जीवन यापन का संकट खड़ा हो गया है।


दानव बने मुनाफ़ाख़ोर
आपदा और महामारी के संकट में नेकनीयत की भावना कहाँ ओझल हो जाती है और कारोबारी मुखौटा पहने काली कमायी का भयावह चेहरा कैसे झाँकने लगता है। इसे समझने के लिए कोरोना की मेडिकल मुनाफ़ाख़ोरी का गणित बाँचना होगा। ख़ौफ पैदा करने का आलम है कि कोरोना के विपदा काल में निजी क्षेत्र के अस्पताल लूट-खसोट के केंद्र बन गये हैं। मरीज़ और उनके परिजन दोहरा दर्द भुगत रहे हैं। एक तरफ़ कोरोना मरीज़ आ$फत से बेहाल है, तो निजी अस्पताल मनमानी वसूली में जुटे हैं। समाजशास्त्री विनोद नागर कहते हैं- ‘संकट-काल में मानव का मुखौटा लगाये हुए दानव मुनाफ़ाख़ोरी में जुटे हुए हैं। सरकार का दावा है कि ऑक्सीजन की कमी नहीं। लेकिन ऑक्सीजन सबसे दुर्लभ चीज़ बन गयी है। सोशल मीडिया पर कोरोना से बचाव रखने वाला नुस्ख़ा चलता है, तो उससे सम्बन्धित सामग्री बाज़ार से $गायब हो जाती है। ऑक्सीमीटर, स्टीम इन्हेलर यहाँ तक कि थर्मामीटर तक मुनाफ़ा$खोरों के हत्थे चढ़ गये हैं। अस्पताल में बेड के दाम तो आसमान छू रहे हैं। महामारी-काल में मौत के मंज़र के बीच निजी अस्पताल साँसों के लिए मोटी रक़म वसूल रहे हैं। चौंकाने वाली बात है कि जयपुर में धनवंतरी अस्पताल के प्रबन्धन कोरोना संक्रमित मरीज़ के परिजनों से खुले में इलाज के बदले 60 से 70 हज़ार रुपये तक की माँग कर रहे थे। मानसरोवर के न्यू सांगानेर रोड स्थित इस अस्पताल की मनमानी का ख़ुलासा होने के बाद प्राइवेट अस्पताल एंड नर्सिंग होम सोसायटी ने धनवंतरी अस्पताल से किनारा कर लिया। लेकिन क्या इसके गुनाहों की सज़ा के लिए इतना भर काफ़ी है? डॉक्टरों ने खुले में इलाज के लिए 70 हज़ार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से वसूल किये, जबकि दवाओं के लिए 30 हज़ार रुपये अलग से माँगे। समाजशास्त्रियों का कहना है कि चिकित्सा सेवाओं का यह मंज़र क्या लोगों में ख़ौफ़ पैदा नहीं कर रहा? इस मुकाम पर दुष्यंत का शे’र बहुत कुछ कह देता है- ‘बंजर धरती, झुलसे पौधे, बिखरे काँटे, तेज़ हवा। हमने घर बैठे-बैठे ही सारा मंज़र देख लिया।’