आगे की राह

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पार्टी कह चुकी है कि वह जाति और धर्म की राजनीति नहीं करेगी.लेकिन देश में जाति की राजनीति ने जो गहरी जड़ें जमा ली हैं उसका क्या विकल्प है आप के पास? महाराष्ट्र में मराठी मानुस वाली विचारधारा की क्या काट है उसके पास? दक्षिण में तमिलों को लेकर पार्टी की क्या रणनीति रहेगी? छत्तीसगढ़ के बस्तर में किस मुद्दे पर वह चुनाव लड़ेगी? कश्मीर पार्टी जाएगी तो क्या मुद्दा उठाएगी? इन सभी प्रश्नों से पार्टी को जूझना होगा. इनका हल ढूंढना होगा.

देश के हर राज्य की अपनी समस्याएं हैं, उनकी अपनी अलग किस्म की राजनीति है, अलग मुद्दे हैं. ऐसे में पार्टी क्या सिर्फ भ्रष्टाचार का नारा लेकर लोगों के पास जाएगी? अभी तक पार्टी की विचारधारा एक बेहद सीमित संदर्भ लिए हुए है. दिलीप पड़गांवकर कहते हैं, ‘पार्टी की अभी कोई विचारधारा नहीं है. अगर उसे पूरे देश में जाना है तो उसे अपनी विचारधारा बनानी होगी. किसी को नहीं पता कि आप की आर्थिक नीति क्या होगी, सुरक्षा नीति क्या होगी, नक्सल नीति क्या होगी. ये सारे चीजें हवा में हैं.’  ओम थानवी पार्टी के नेतृत्व का सवाल भी उठाते हैं. वे कहते हैं, ‘अभी तक तो पार्टी केजरीवाल को चेहरा बनाकर काम कर रही है लेकिन अगर उसे पूरे देश में जाना है तो वो अब वन मैन शो से काम नहीं चलेगा. उसे नेतृत्व के स्तर पर और लोगों को पार्टी से जोड़ना होगा.’

जेएनयू में प्रोफेसर विवेक कुमार आप की सीमित सोच का प्रश्न उठाते हैं. वे कहते हैं, ‘आप को ये समझना होगा कि भारत कोई एकांगी राष्ट्र नहीं है. यहां भारत है, इंडिया है, ट्राइबल भारत भी है. जितनी तरह की विविधता आप सोच सकते हैं उतनी इस देश में मौजूद हंै. जबकि ये लोग विविधता में विश्वास नहीं करते. इनके लिए जाति और धर्म कोई प्रश्न नहीं है. देश के यथार्थ  झुठलाने वाली आप जैसी पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास भविष्य नहीं है. इन लोगों को लगता है कि जनता को बस बीएसपी (बिजली, सड़क, पानी) से मतलब है. इन्हें नहीं पता कि लोगों के लिए सम्मान और पहचान भी एक मुद्दा है.’

युवाओं के दम पर दिल्ली में शानदार प्रदर्शन कर चुकी आप को अगले लोकसभा चुनाव में जुड़ने वाले 12 करोड़ नए वोटरों से उम्मीद है. 2014 लोकसभा चुनाव में 12 करोड़ वोटर ऐसे होंगे जो पहली बार मतदान करेंगे. एक हालिया सर्वे बता रहा है कि अगले लोकसभा चुनाव में कुल 543 में से 160 सीटों पर सोशल मीडिया की भूमिका निर्णायक होगी. सर्वे में ये बात भी सामने आई कि पहली बार वोट का अधिकार प्राप्त करने वाले 12 करोड़ वोटरों में से नौ करोड़ सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. अध्ययन के मुताबिक इस समय लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में 75 सीटें ऐसी हैं, जिनका भविष्य सोशल मीडिया के हाथों में है. भाजपा के कब्जे वाली 44 सीटें सोशल मीडिया की मुट्ठी में हैं. सोशल मीडिया पर अपनी मजबूत पकड़ होने के कारण आप को उम्मीद है कि इन सीटों पर वह कुछ खेल कर सकती है. पार्टी इस बात को लेकर आशावान है कि सोशल मीडिया पर सक्रिय मतदाता न केवल खुद बड़ी भूमिका निभाएंगे बल्कि वे अपने आसपास के मतदाताओं को भी आप के पक्ष में लामबंद करेंगे.  पार्टी से जुड़े अजीत झा कहते हैं, ‘हम पूरे देश में जाने को तैयार है. देश को एक साफ सुथरी, जन पक्षीय और खुद आम लोगों द्वारा संचालित राजनीति देना चाहते हैं. लोग अगर दिल्ली में बीजेपी और कांग्रेस से नाराज थे तो ऐसा नहीं है कि बाकी देश में अलग-अलग राज्य सरकारों से खुश हैं. हम जनविरोधी सरकारों का विकल्प बनने को पूरी तरह से तैयार हैं. ’

राज्यों में पार्टी के संगठन पर अगर नजर डालें तो आप ने देश के 15 राज्यों में अपनी राज्य  इकाई का निर्माण कर लिया है. देश के करीब 380 जिलों में उसका संगठन खड़ा हो चुका है. आने वाले समय में पार्टी कितनी सफलता अर्जित करती है, यह तो देखने वाली बात होगी लेकिन आप के आलोचक तक उसके राजनीति में प्रवेश को भी लोकतंत्र की मजबूती के रूप में देखते हैं. आंदोलन के समय से ही उसके आलोचक रहे विवेक कुमार कहते हैं, ‘आप का दिल्ली में जीतना लोकतंत्र की ताकत का प्रतीक है.’

दिल्ली चुनावों में शानदार प्रदर्शन के बाद भी पार्टी के लोगों का व्यवहार बेहद शालीन और विनम्र बना रहा. अरविंद केजरीवाल और पार्टी के दूसरे बड़े नेता लगातार अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से जीत के अहंकार से दूर रहने की अपील कर रहे हैं. ऐसी ही एक नसीहत योगेंद्र यादव ने जंतर मंतर पर पार्टी कार्यकर्ताओं को दी. उन्होंने कहा, ‘ हम उस कलम की तरह हैं जिससे एक कवि ने कोई सुंदर कविता लिखी है. अब कलम को यह भ्रम हो जाए कि कविता कवि ने नहीं उसने लिखी है तो यह गलत होगा. हमें याद रखना होगा कि हम सिर्फ निमित्त मात्र हैं. ’

यानी फिलहाल आप  की गाड़ी ठीक रास्ते पर बढ़ रही है.

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