आखिरी उतार

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इसके अलावा दूसरी पीढ़ी भी अब आडवाणी की नौटंकी वाली राजनीति से ऊब चुकी थी. उनके इस्तीफे के अगले दिन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह राजस्थान में पार्टी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए निकल गए. नरेंद्र मोदी भी तुरंत दिल्ली नहीं दौड़े बल्कि ट्वीट करके काम चला लिया. अरुण जेटली परिवार से मिलने के लिए विदेश रवाना हो गए. 2005 में जिन्ना विवाद के दौरान वे विदेश यात्रा बीच में रद्द करके वापस दौड़े थे. असल में जिस तरह से आडवाणी और उनके कुछ खास लोगों ने गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का बहिष्कार किया था उससे पार्टी के सब्र का बांध टूट चुका था. दूसरी पांत पर अपने अहसानों की कीमत वे 2005 वाले प्रकरण के बाद ही वसूल चुके थे.

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उनके एक प्रबंधक तो कुछ ज्यादा ही आगे चले गए जिससे हालात और खराब हुए. आडवाणी को मनाने में राजनाथ सिंह ने बेहद विनम्रता दिखाई थी लेकिन आडवाणी के एक करीबी किसी पत्रकार से कथित तौर पर यह कहते पाए गए कि ‘भाजपा अध्यक्ष उत्तर प्रदेश की ठाकुर राजनीति को भाजपा में घुसा रहे हैं’. इससे राजनाथ सिंह बेहद नाराज हो गए. इस नाराजगी ने राजनाथ और दूसरे नेताओं को गोवा में किए गए निर्णय पर दृढ़ रहने के लिए उकसाया और साथ ही इसके लिए भी कि कोई दूसरी चुनाव समिति नहीं बनेगी. इसके बाद आडवाणी समर्थक नेताओं का समूह, जो उनके अलगाव से अपना भविष्य खतरे में पा रहा था, भूल सुधार की कोशिश में लग गया. आडवाणी के घर से संघ प्रमुख मोहन भागवत को फोन किया गया और उनकी संघ प्रमुख से बात करवाई गई. इसने आडवाणी को शांति बहाली की घोषणा करने का बहाना दिया.

इस बीच भी मीडिया प्रबंधन जारी रहा. पहले खबर लीक हुई कि भागवत ने आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय करने का आश्वासन दिया है. जब इसका खंडन हुआ तब नई चर्चा छिड़ गई कि आडवाणी जदयू को एनडीए में बनाए रखने के लिए अहम हैं और उन्होंने एनडीए से अलग न होने के लिए नीतीश से अपील की है. जबकि देखा जाए तो हाल के सालों में आडवाणी बमुश्किल ही गठबंधन प्रबंधन का हिस्सा रहे हैं. बल्कि अगर उनकी चलती तो नीतीश कभी बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनते. 2005 में मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी पहली पसंद शत्रुघ्न सिन्हा थे. मान-मनौव्वल के बाद आधे मन से वे नीतीश के नाम पर सहमत हुए थे.
भागवत से बातचीत के बाद आडवाणी के झंडा झुकाने से एक सवाल पैदा हुआ है- क्या यह भाजपा के रोजमर्रा के कामकाज में उसके नियंत्रण का सबूत है? यह सवाल बेहद जटिल है, इसका जवाब सीधे ‘हां’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता. संघ और भाजपा का रिश्ता बेहद घुमावदार और बहुपरतीय है. इसे आसानी से समझा नहीं जा सकता. कई मौकों पर संघ के  पदाधिकारी राजनीतिक मसलों पर पार्टी में हद से ज्यादा हस्तक्षेप करते हैं तो कई मामलों में भाजपा के नेताओं को पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त है.

यह सच है कि आडवाणी साल 2000 (जिन्ना प्रकरण से काफी पहले) से ही कह रहे थे कि व्यापक पहुंच वाली पार्टी के रूप में भाजपा संघ द्वारा बनाए गए अपने घोंसले के आकार से कहीं ज्यादा बड़ी हो चुकी है, उसे अब अपना सारा ध्यान सुशासन और नए लोगों को अपने साथ जोड़ने पर लगाना चाहिए. ज्यादातर लोग उनसे सहमत भी थे. पर आडवाणी के साथ समस्या यह थी कि वे इस दूरगामी विचार का अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के साथ घालमेल कर रहे थे.

यहां यह याद कर लेना भी महत्वपूर्ण है कि 2005 में आडवाणी को तत्काल पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का नरेंद्र मोदी ने विरोध किया था. उनकी चिंता थी कि इस तरह की प्रतिक्रिया से पार्टी में एक बड़ा खालीपन आ जाएगा जिसका फायदा संघ को होगा जो भाजपा नेताओं के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी. हालांकि आखिर में ऐसा ही हुआ. अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह का पहला कार्यकाल (2006-09) और उसके बाद नितिन गडकरी का दौर पूरी तरह से संघ की पकड़ को ही मजबूत करता रहा. हालांकि पिछले कुछ महीनों के दौरान हवा का रुख दूसरी तरफ पलटा है. दिसंबर, 2012 में मोदी की गुजरात में जीत और गडकरी को पार्टी अध्यक्ष का दूसरा कार्यकाल दिला पाने में भागवत की असफलता यह बताती है. फिर भी राजनाथ संघ की ही पसंद हैं और यह बताता है कि इसके भाजपा के मामलों में वीटो पावर होने की बजाय पार्टी के लिए सिर्फ एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार के रूप में सीमित होने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को अभी लंबा वक्त लगना है.

आडवाणी से गलती यह हुई कि उन्होंने भाजपा पर नियंत्रण रखने की संघ की कोशिशों को मोदी के उभार से जोड़ने की कोशिश की. उनके खेमे ने यह दिखाने की कोशिश की कि मोदी को भाजपा पर थोपा जा रहा है. यह हकीकत के उलट और मूर्खतापूर्ण बात थी. हकीकत यह है कि मोदी साफ तौर पर भाजपा कार्यकर्ताओं और पार्टी की राज्य इकाइयों के लिए सबसे पसंदीदा नेता और उम्मीदवार बन चुके थे. इस तरह से वे लोकप्रिय राजनीतिक पसंद हैं और इस फैसले में संघ की राय का महत्व न के बराबर है. आडवाणी ने इस यथार्थ को उलझाने और मोदी की लोकप्रियता को चुनौती देने की कोशिश की. इसके नतीजे में लोगों ने उनकी त्रासदी देखी और उनकी पार्टी का तमाशा.

1 COMMENT

  1. देश ही नहीं दुनिया में प्रसिद्धि हासिल कर लेने वाले बहुत कम व्यक्तियों में गुजरात के मुख्या मंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं, गुजरात में किये गए विकास के बाद अब सम्पूर्ण देश को मोदी जी कि जरूरत है….

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