आईआरएस सर्वेक्षण-2013: सर्वे पर सब रुष्ट

इसके बावजूद ताजा आंकड़ों में जिस तरह की अनियमितताएं हैं उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है. मसलन, किसी अखबार की पाठक संख्या उसकी सर्कुलेशन संख्या से कम कैसे हो सकती है या 60,000 के सर्कुलेशन वाले अखबार की पाठक संख्या शून्य कैसे हो सकती है? एक अखबार को दिए साक्षात्कार में रवि राव इन सवालों का जवाब कुछ यूं देते हैं, ‘अगर वास्तव में आंकड़ों में कुछ गड़बड़ियां हैं तो हम उन्हें सही करेंगे, लेकिन पूरे सर्वेक्षण को खारिज करना ठीक नहीं है.’

एमआरयूसी के अपने सर्वे पर अड़ने की कुछ और भी वजहें हैं. 20 सदस्यों वाली संस्था के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में पांच प्रतिनिधि महत्वपूर्ण प्रिंट मीडिया समूहों से आते हैं. इसी तरह से एमआरयूसी की टेक्निकल कमेटी भी है जिसमें छह सदस्य प्रिंट मीडिया के हैं. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यही टेक्निकल कमेटी आईआरएस के नए तौर-तरीकों के लिए जिम्मेदार है. एमआरयूसी का कहना है कि सर्वेक्षण की नई गाइडलाइनें इन्हीं लोगों की निगरानी में तय हुई थी. यह मई, 2012 की बात है. तब प्रिंट मीडिया के प्रतिनिधियों को इस पर कोई आपत्ति क्यों नहीं हुई?

इसकी दो ही वजहें हो सकती हैं या तो तब उन्हें इन नई गाइडलाइनों की गंभीरता का अंदाजा नहीं था या फिर वे इस प्रक्रिया में शामिल ही नहीं थे. स्वतंत्र रूप से विचार करने पर हम पाते हैं कि पहली वाली वजह ज्यादा संभव है कि उन्हें नई गाइडलाइंनों के नतीजों का अंदाजा ही नहीं था. मई, 2012 में इसकी शुरुआत हुई थी. तब एमआरयूसी और आरएससीआई ने मिलकर तय किया था कि अगला सर्वे नए तरीके से होगा. यह बात लंबे समय से सबकी जानकारी में थी. एक दिलचस्प तथ्य और भी है जिस पर अनायास ही ध्यान चला जाता है. एमआरयूसी के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में जो पांच सदस्य प्रिंट मीडिया के हैं उनमें बिनय रॉय चौधरी हिंदुस्तान टाइम्स के हैं और कुलबीर चिकारा हरिभूमि के हैं. यह संयोग ही है कि आईआरएस के नए नतीजों में इन दोनों अखबारों को सबसे ज्यादा बढ़त मिलती बताई गई है.

जिन 18 अखबार समूहों ने सामूहिक रूप से आईआरएस के बहिष्कार की घोषणा की है, उनकी सबसे बड़ी मजबूरी है 22,400 करोड़ रु. का सालाना विज्ञापन राजस्व जिसका बंटवारा इसी सर्वे के आधार पर होता है. दैनिक भास्कर समूह के निदेशक गिरीश अग्रवाल एक अखबार को बताते हैं, ‘एक बार सार्वजनिक हो जाने के बाद यह सर्वे सिर्फ व्यक्तिगत राय नहीं रह जाता बल्कि ब्रह्मवाक्य हो जाता है.’ देश भर के एडवर्टाइजर और मीडिया एजेंसियां इन आंकड़ों का इस्तेमाल ऐड रेवेन्यू के बंटवारे के लिए करती हैं. जाहिर है इन नतीजों में किसी भी बड़े फेरबदल का इस्तेमाल मीडिया और ऐड एजेंसियां मोलभाव के लिए करेंगी. यही कारण है कि लगभग 80 फीसदी प्रिंट मीडिया संस्थानों ने एमआरयूसी के साथ रिश्ते तोड़ लिए हैं. लगभग सबने एमआरयूसी को कानूनी नोटिस भी भेज दिया है.

अब सवाल यह है कि अगर गतिरोध बना रहा तो फिर आगे किस आधार पर प्रिंट मीडिया समूह और ऐड एजेंसियां आपस में लेन-देन करेंगे. क्या आने वाले दिनों में एक नई मीडिया सर्वेक्षण संस्था की नींव पड़ सकती है? मीडिया ट्रेंड और विज्ञापन जगत की गतिविधियों से जुड़ी ‘समाचार 4 मीडिया’ नाम की वेबसाइट के संपादक अनुराग बत्रा बताते हैं, ‘मर्डर कर दिया है आईआरएस ने. एडवर्टाइजर आईआरएस के आधार पर ही विज्ञापन राजस्व का बंटवारा करते थे. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि ऐड एजेंसियों ने गड़बड़ियों के सामने आने के बाद इस सर्वे को नजरअंदाज कर दिया है. कोई भी इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है. आगे कोई नया रास्ता निकलेगा. विज्ञापन बांटने के लिए किसी न किसी आधार की जरूरत तो पड़ेगी ही. मेरा मानना है कि जब समुद्र मंथन होता है तब कुछ अच्छी चीजें बाहर निकलती हैं.’

फिलहाल दोनों पक्षों के बीच गतिरोध बना हुआ है. एमआरयूसी ने कानूनी नोटिसों और प्रिंट मीडिया समूहों के भारी दबाव के बावजूद आईआरएस को वापस लेने से इनकार कर दिया है. रवि राव ने जो प्रेस रिलीज जारी की है उसके मुताबिक – ‘सर्वेक्षण के नतीजों पर अब आरएससीआई का अधिकार है. एमआरयूसी के पास अब एकतरफा सर्वे को वापस लेने की आजादी नहीं है विशेषकर ऐसी कठिन परिस्थितियों में जैसी इस समय बन गई हैं. एमआरयूसी बेसब्री से आरएससीआई की आगामी 19 फरवरी को होने वाली बैठक का इंतजार कर रही है. सर्वे के सभी नतीजों पर उसी दौरान आरएससीआई विचार करेगी.’ यानी 19 फरवरी तक एमआरयूसी अपने सर्वेक्षण से किसी भी तरह से पीछे हटने को तैयार नहीं है. दूसरी तरफ प्रिंट मीडिया संस्थानों का हुजूम है जो कतई इंतजार नहीं कर सकता. आखिर उसका इतना बड़ा हित जो दांव पर लगा है.

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