‘अस्मिता के प्रश्न, जीवन के मूलभूत प्रश्नों के लिए रोड़ा बनते हैं’

इस बीच अचानक हिंदी साहित्य जगत में कवियों की बाढ़-सी आ गई है. एक के बाद एक नए संग्रह आ रहे हैं. कुछ आलोचकों ने इसे अच्छी कविता का संकट काल कहा है. आप इस नए रुझान को किस तरह देखती हैं?

मैं इस नए रूझान को पूरी उम्मीद से देखती हूं और मुझे कहीं भी इस तरह का संकट काल नजर नहीं आता. कविता का संकट काल यह नहीं है कि किताबें छप रही हैं, बल्कि कविता, साहित्य या कहें कि जीवन का संकट काल हमारी सामाजिक मुखरता और हस्तक्षेप का न होना है.

पिता आपके रचनाकर्म में बार-बार आते हैं. आपने पिता को केंद्र में रखकर कविताएं रची हैं. आपका उपन्यास एक कस्बे के नोट्स भी पिता और पुत्र के रिश्तों पर केंद्रित है.

वह इसलिए कि मेरे जीवन पर पिता का बहुत प्रभाव है. बचपन से ही मैं पिता के बहुत निकट रही. उनके संग साथ रही. हर बात उनसे कहती रही. मैंने कभी भी, कोई भी बात अच्छी या बुरी उनसे छिपाई नहीं. मैंने पिता से विपरीत परिस्थितयों में भी जीवन और समय को अपने अनुकूल करना सीखा. और उपन्यास सिर्फ पिता और पुत्र के रिश्ते पर ही केन्द्रित नहीं है बल्कि उसमें तो और भी रिश्ते हैं.

एक कस्बे के नोट्स में पिता और मां की छवियों में जबरदस्त विरोधाभास है. एक ओर आत्मनिर्भर बनाते वरदान सरीखे पिता तो दूसरी ओर पितृसत्ता की पोषक मां. हालांकि यह रचनाकार का विशेषाधिकार है लेकिन मैं यह पूछने की धृष्टता कर रही हूं कि क्या ऐसा चित्रण सायास है?

नहीं यह सायास बिल्कुल नहीं है. उपन्यास में जीवन अपने ठोस रूप में है. उसमें पितृसत्ता की पोषक अकेली मां नहीं है बल्कि पिता को छोड़कर और दूसरे स्त्री-पुरुष भी हैं.

आपकी कविताओं में जबरदस्त वैविध्य है. वहां कभी स्मृतियों का घना आयतन नजर आता है, कभी घर की छोटी-छोटी चीजें कविता का विषय बनती हैं. आपकी कविताओं के स्त्री विमर्श में वर्गीय और लैंगिक चेतना अलहदा दृष्टिकोण लेकर प्रकट होती है.

अगर आपको मेरी रचनाएं विविधतापूर्ण लगती हैं तो यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है. रही बात कविताओं के स्त्री विमर्श में वर्गीय और लैंगिक चेतना का नजरिया दूसरों से अलग होने की तो शायद यह इसलिए है क्योंकि जीवन में भी ऐसा ही है. मैं जीवन और रचना के बीच कोई फांक महसूस नहीं करती.

हाल ही में आपको स्त्री लेखन का शैलप्रिया सम्मान देने की घोषणा की गई है. देश में स्त्री लेखन की मौजूदा धारा को लेकर आपकी क्या राय है?

मैं लेखन में किसी भी तरह के बंटवारे के विरूद्ध हूं. यूं भी अस्मिता के प्रश्न, जीवन के मूलभूत प्रश्नों के लिए रोड़ा बनते हैं. वे हमें भटकाते हैं और लड़ाई को शुरू होने से पहले ही खत्म करने की कोशिश करते हैं.

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