अवैध भरती की धरती!

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राजनीति में आरोप लगना कोई अनोखी बात नहीं है. लेकिन बीते नौ साल में यह शायद पहली बार होगा कि खुदपर आरोप लगने के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सारे पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम रद्द करके पार्टी नेतृत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने हाजिरी देने दिल्ली जाना पड़ा हो. बीते 24  जून को ऐसा ही हुआ. राज्य में हुए व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) घोटाले की आग फैलते-फैलते उनकी देहरी तक भी आ पहुंची है. चौहान की सफाई सुनने वाला संघ खुद भी इस घोटाले की चपेट में आता दिख रहा है.

हालत यह है कि करीब 2000  करोड़ रुपये के बताए जा रहे इस घोटाले की जांच को एक साल होने को आया, कई मछलियां जांच के इस जाल में फंस चुकी हैं, लेकिन अब भी कहना मुश्किल है कि भ्रष्टाचार के इस नेटवर्क का ओर-छोर कहां तक है. इस मामले में पुलिस, मुख्यमंत्री के बेहद करीबी कहे जाने वाले उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को गिरफ्तार कर चुकी है. उनकी गिरफ्तारी के बाद खबर लिखे जाने तक पुलिस सूबे के अलग-अलग इलाकों में छापे मारकर  100  विद्यार्थियों को भी हिरासत में ले चुकी थी. इसके अलावा पिछले एक साल में करीब 500  अन्य लोगों को पुलिस हिरासत में लिया जा चुका है. इनमें से कुछ को पूछताछ करके छोड़ दिया गया, जबकि कुछ जेल की सलाखों के पीछे हैं. इस घोटाले में मुख्यमंत्री की पत्नी के अलावा और भी जितने और जैसे लोग शक और आरोपों के घेरे में हैं उससे प्रदेश की राजनीति तो क्या सारी व्यवस्था के ही बुरी तरह हिल जाने का खतरा आ खड़ा हुआ है. घोटाले के तार राज्य से बाहर भी जाते दिख रहे हैं. हाल ही में दिल्ली पुलिस की एक भर्ती परीक्षा का पेपर लीक करवाने वाले गिरोह से पूछताछ में पता चला है कि इसने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की कई परीक्षाओं के पेपर भी बेचे थे. इस गिरोह का सरगना दिनेश कपिल रेलवे का एक बड़ा अधिकारी रह चुका है. पुलिस अब उससे भी पूछताछ करने की तैयारी में है.

व्यापम मध्य प्रदेश में इंजीनियरिंग-मेडिकल के कोर्सों और अलग-अलग सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए परीक्षाओं का आयोजन करने वाली संस्था है. आरोप हैं कि इसके द्वारा पिछले नौ सालों में आयोजित 150 से अधिक परीक्षाओं के जरिये बहुत बड़ी संख्या में अयोग्य लोगों को नौकरियां या डिग्रियां दिलवाई गईं. 2004 से चल रहे इस गोरखधंधे के तहत फर्जी नियुक्तियां करवाने के लिए कई सरकारी नियमों को ढीला किया गया, कई नियम बदले गए तो कइयों को हटा ही दिया गया. इस पूरे मुद्दे को जोर-शोर से उठाने वाले भोपाल के एडवोकेट आनंद कहते हैं, ‘प्रदेश में अकेले संविदा शिक्षकों की ही 80 हजार भर्तियां हुई हैं. यहां 53 विभाग हैं, सबकी भर्ती परीक्षाएं व्यापम ही कराता है. अब तक उसने 81 परीक्षाएं आयोजित की हैं. इनमें एक करोड़ चार लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया और कुल चार लाख भर्ती हुईं.’ आनंद आरोप लगाते हैं कि इनमें से 80 फीसदी भर्तियां फर्जी हैं, ‘अब तो खुद मुख्यमंत्री विधानसभा में मान चुके हैं कि एक हजार भर्तियां फर्जी हैं. भले ही वे आंकड़ा कम बता रहे हैं, लेकिन यह तो मान रहे हैं कि फर्जी भर्तियां हुई हैं. सच्चाई से पर्दा उठाने के लिए इतना ही काफी है.’

आर्थिक पहलू के अलावा इस घोटाले के इससे भी अहम कई पहलू और भी हैं: इसके चलते कई योग्य युवा मौकों से वंचित रह गए. यह घोटाला कई सालों से चल रहा था. इस दौरान पैसे और सिफारिश के जरिये चुने गए उम्मीदवारों ने अपनी जिम्मेदारियों का किस तरह निर्वाह किया होगा, इस व्यवस्था को कैसे घुन की तरह खोखला किया होगा, यह भी गंभीर सवाल हैं. डॉक्टरी जैसे पेशे में तो यह लाखों लोगों की जानों से खेलने वाला खतरनाक खेल भी बन जाता है. इन सड़ी मछलियों की वजह से प्रतियोगी परीक्षाओं में अपने बूते सफल रहीं वास्तविक प्रतिभाओं पर भी शक का दाग लग गया है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉक्टर सीसी चौबल कहते भी हैं कि एमपी के पीएमटी घोटाले की वजह से उन डॉक्टरों को भी संदेह की नजर से देखा जाने लगा है जिन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत से एमबीबीएस की डिग्री ली होगी. इसके अलावा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कवायद तो बेकार हुई ही, वह समय भी व्यर्थ हुआ जिसकी भरपाई किसी भी तरह से नहीं हो सकती.

इस घोटाले का भंडाफोड़ पिछले साल 2013 में तब हुआ जब पुलिस पीएमटी में गलत तरीके से विद्यार्थियों को पास करवाने वाले एक रैकेट तक पहुंची. जुलाई, 2013 में इंदौर में कुछ छात्र फर्जी नाम पर पीएमटी की प्रवेश परीक्षा देते पकड़े गए थे. इनसे पूछताछ में पता चला कि यह नेटवर्क शहर का कोई डॉ जगदीश सागर चला रहा है. उसके घर पर छापेमारी में भारी मात्रा में नकदी, सोना और अवैध संपत्ति का खुलासा हुआ. सागर इस मामले की अहम कड़ी साबित हुआ. पूछताछ में उसने बताया कि फर्जीवाड़े का यह गोरखधंधा मेडिकल की परीक्षा में ही नहीं बल्कि सरकारी नौकरियों की भर्ती में भी चल रहा है. यहीं से व्यापम के तहत हुई तमाम परीक्षाओं में हो रहे फर्जीवाड़े की पोल खुलती चली गई. पीएमटी फर्जीवाड़े से शुरू हुई भ्रष्टाचार की यह कहानी पटवारी भर्ती परीक्षा, संविदा शिक्षक भर्ती परीक्षा, पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा, बीडीएस भर्ती परीक्षा, वन रक्षक भर्ती परीक्षा और संस्कृत बोर्ड भर्ती परीक्षा तक पहुंच गई. इसके बाद तो मध्य प्रदेश के नेता, मंत्री, संतरी, आईएएस, आईपीएस अफसर, रिटायर्ड जज, डॉक्टर्स, मीडियाकर्मी जैसे कई लोग इसकी जद में आ गए. घोटाले के तार राजभवन तक चले गए. बात बढ़ती देख राज्य सरकार ने भर्ती परीक्षाओं में हुए भ्रष्टाचार की जांच स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) को सौंप दी जो अब हाई कोर्ट की निगरानी में जांच कर रहा है. लेकिन अब प्रदेश में लगातार मामले की सीबीआई जांच की मांग उठ रही है.

भर्ती परीक्षाओं के फर्जीवाड़े में पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, उनके ओएसडी ओपी शुक्ला, राज्यपाल रामनरेश यादव के ओएसडी धनराज यादव, व्यापम के पूर्व परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी और भाजपा नेता सुधीर शर्मा सहित करीब 150 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है. इसके अलावा सीएम हाउस, प्रदेश का राजभवन, कुछ शीर्ष आईएएस अफसर और अपर मुख्य सचिव अजिता बाजपेई पांडे के पति अमित पांडे समेत कुछ मीडिया संस्थान भी शक के दायरे में हैं. फर्जीवाड़े के छींटे केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री उमा भारती पर भी पड़ रहे हैं. उन पर भी आरोप है कि उन्होंने संविदा शिक्षकों के पदों पर कई अयोग्य लोगों की भर्तियां करवाई हैं. इस मामले में संघ भी कटघरे में है. पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन (अब दिवंगत) और संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सुरेश सोनी का नाम भी घोटाले से जुड़ रहा है.

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शिवराज की पत्नी साधना सिंह पर कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री निवास से किसी महिला ने व्यापम कंट्रोलर पंकज त्रिवेदी और सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा को 139 बार फोन किया. पार्टी का कहना था कि व्यापम के तहत हुई परिवहन निरीक्षक भर्ती में 19 नियुक्तियां शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह के पीहर गोदिंया (महाराष्ट्र) से हुई हैं. उधर, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट करके कहा कि कॉल डीटेल रिपोर्ट में ये आरोप कहीं नहीं ठहरते. उन्होंने यह भी कहा कि परिवहन आरक्षक भर्ती में चयनित हुए सभी उम्मीदवारों के नाम विभाग की वेबसाइट पर मौजूद हैं जिससे यह आरोप झूठा साबित होता है. कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा ने शिवराज सिंह के कथित मामा फूल सिंह पर भी आरोप लगाए हैं. मिश्रा के अनुसार पंकज त्रिवेदी के जेल जाने के बाद भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मामा फूल सिंह चौहान उनके संपर्क में थे. उधर, मध्यप्रदेश सरकार की तरफ से मिश्रा के खिलाफ दायर मानहानि के मामले में स्पष्ट किया गया है कि शिवराज सिंह के किसी मामा का नाम फूल सिंह नहीं है. मुख्यमंत्री के एक ही मामा थे, जिनका निधन हो चुका है.

व्यापम के पूर्व परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी ने एसटीएफ को बयान दिया है कि पूर्व तकनीकी परीक्षा और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने फूड इंस्पेक्टर के पद के लिए मिहिर कुमार (रोल नंबर 702735) की सिफारिश की थी. त्रिवेदी के मुताबिक शर्मा ने उन्हें बताया कि मिहिर, सुदर्शन और सोनी के आदमी हैं. त्रिवेदी के इस बयान के आधार पर एसटीएफ ने मिहिर कुमार को भी हिरासत में ले लिया है. मिहिर ने भी यह बात मान ली है. उसका कहना है कि वह केएस सुदर्शन का सहायक हुआ करता था. 2012 में उसने फूड इंस्पेक्टर एग्जामिनेशन के अपने आवेदन फॉर्म की फोटोकॉपी सुदर्शन को दी और उनसे नौकरी के लिए गुजारिश की. सुदर्शन ने लक्ष्मीकांत शर्मा को फोन किया. शर्मा ने उसे नौकरी लगाने का भरोसा दिया और बाद में मदद भी की.

यह घोटाला बहुत ही व्यवस्थित तरीके से चल रहा था. आरोपों के मुताबिक व्यापम के अफसरों और दलालों ने हर परीक्षा के लिए अलग-अलग रेट लिस्ट तैयार कर रखी थी. चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए 50 हजार रुपए, तृतीय श्रेणी के लिए सवा लाख रुपए, द्वितीय श्रेणी अफसरों के लिए चार से 10 लाख रुपए, वेटनरी के लिए तीन लाख और पीएमटी परीक्षा पास करने के लिए 10 से 15 लाख रुपए लिए जाते थे. एसटीएफ को पंकज त्रिवेदी के कम्प्यूटर से ऐसे दस्तावेज मिले हैं जिनसे इन आरोपों की पुष्टि होती है . त्रिवेदी के कम्प्यूटर से बरामद छात्रों की एक सूची में सबसे अंतिम रिमार्क वाला कॉलम भी है. इस कॉलम में छह छात्रों के नाम के सामने मिनिस्टर, कुछ के सामने भाजपा की कद्दावर नेत्री उमा भारती और कुछ के सामने राजभवन लिखा पाया गया है  (दस्तावेजों की प्रति का एक अंश दायें पृष्ठ पर).

एसटीएफ ने पंकज त्रिवेदी के कंप्यूटर से छात्रों के नामों की कुछ सूचियां भी बरामद की हैं. इनमें छात्रों के नाम के आगे बने कॉलम में पास होने के लिए कितने अनिवार्य अंकों की जरूरत होगी, यह लिखा हुआ है. इन सूचियों में एक  ‘टू डू’ कॉलम है. इसमें पास होने के लिए जरूरी अंक लिखे गए हैं. एसटीएफ के अफसरों के मुताबिक परीक्षा देने के बाद व्यापम के अफसर छात्रों की ओएमआर शीट निकाल लेते थे और पास होने के लिए जरूरी संख्या में सवाल हल कर उन्हें जमा कर देते थे. यह नकल या पर्चा लीक करने से भी आसान तरीका था जिससे छात्रों को पास किया जा सकता था. मिहिर के बयान से भी इसकी पुष्टि होती है. उसने अपने बयान में कहा है, ‘सुदर्शन ने मुझसे कहा कि मैं एग्जाम में जितना जानता हूं, उतने सवालों के जवाब दूं और बाकी ओएमआर शीट खाली छोड़ दूं. मैंने हिंदी, इंग्लिश, रीजनिंग, मैथ्य, फिज़िक्स और जनरल नॉलेज के करीब 50 फीसदी सवालों के जवाब दिए और बाकी ओएमआर शीट खाली छोड़ दी. 18 अक्टूबर, 2012 को जब रिजल्ट आया तो मेरिट लिस्ट में मेरा नाम 7 वें नंबर पर था. इस परीक्षा को व्यापम ने सात अक्टूबर, 2012 को करवाया था.’

आरोपों की सूची यहीं खत्म नहीं होती. कांग्रेस का आरोप है कि दोषियों को सख्त कार्रवाई से बचाने की कोशिश हो रही है. उसके मुताबिक प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1998 के बजाय एसटीएफ ने आईपीसी की धारा 420 और 409 के तहत केस दर्ज कर दिए हैं. पार्टी का कहना है कि यदि एंटी करप्शन एक्ट की धारा 13 (आई) (डी) के तहत मामला दर्ज होता तो यह स्पेशल कोर्ट में चला जाता और इसमें आरोपियों को जमानत भी नहीं मिलती. पार्टी का यह भी आरोप है कि व्यापम के पास वर्ष 2008 तक का कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है जबकि लोक सेवा आयोग में 10 वर्ष तक उत्तर पुस्तिकाएं और 20 वर्ष तक रिजल्ट सुरक्षित रखने का नियम है. सवाल उठ रहा है कि व्यापम पर भी यही नियम लागू होता है, तो इसका पालन क्यों नहीं किया गया. कांग्रेस का यह भी आरोप है कि पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी एफआईआर दर्ज करने के 189 दिनों बाद इसलिए की गई क्योंकि जांच की आंच में मुख्यमंत्री निवास भी आने लगा था. सूत्रों के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद शर्मा का कहना था कि वे बड़े लोगों के लिए कुर्बानी दे रहे हैं.

चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मध्य प्रदेश कैडर के अफसर एस रामानुजम को खास तौर पर इस मामले की प्रगति पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी है

उच्च शिक्षा मंत्री के तौर पर लक्ष्मीकांत शर्मा व्यापम के भी मुखिया थे और आरोप है कि कई साल से फर्जी भर्तियों का यह धंधा उनके ही आशीर्वाद से चल रहा था. शर्मा को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का बेहद करीबी माना जाता है. इनके खिलाफ एफआईआर छह महीने पहले ही दर्ज हो चुकी थी, लेकिन गिरफ्तारी अब जाकर हुई है. कभी सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य रहे लक्ष्मीकांत शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जरिए भाजपा की राजनीति में आए थे. संघ के कोटे से ही उन्हें 1993 में पहली बार विधानसभा का टिकट दिया गया था. उमा भारती सरकार में उन्हें स्वतंत्र प्रभार देकर खनिज साधन सहित अन्य कई विभागों का मंत्री बनाया गया. उसके बाद से वे 2013 तक लगातार मंत्री पद पर रहे.

कुछ और बड़े भी दलदल में
सुधीर शर्मा :
 उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश में खनन माफिया के नाम से मशहूर भाजपा नेता सुधीर शर्मा ने पूरे मामले में बिचौलिए का काम किया है. शर्मा को पूर्व जनसंपर्क और उच्चशिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का खास आदमी माना जाता है. शर्मा के अन्य मंत्रियों से भी व्यवसायिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं. शर्मा खुद भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं. वे भाजपा की एजुकेशन सेल के प्रमुख भी हुआ करते थे. व्यापम घोटाले में नाम आने के बाद शर्मा ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में आरोप निरस्त करने के लिए याचिका भी दायर की है. इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है. खबर लिखे जाने तक वे फरार चल रहे थे.

डीआईजी आरके शिवहरे : एसटीएफ ने उपनिरीक्षक भर्ती घोटाले में आरके शिवहरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. इन पर दो आरोप हैं. पहला यह कि इन्होंने अपनी बेटी और दामाद को पीएमटी परीक्षा के परीणामों में टॉपर बनवाया और दूसरा यह कि इन्होंने उपनिरीक्षक भर्ती में 15 लाख प्रति विद्यार्थी की दर से तीन विद्यार्थियों के लिए 45 लाख रुपये नितिन महिंद्रा को दिए. नितिन महिंद्रा व्यापम के चीफ सिस्टम एनालिस्ट थे. पीएमटी परीक्षा की परीणाम सूची में शिवहरे के दामाद आशीष आनंद गुप्ता का पांचवां और बेटी नेहा का नाम सातवें स्थान पर है.

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जस्टिस एसएल कोचर : हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज एसएल कोचर का नाम भी पूरे मामले में सामने आया है. आरोप हैं कि उन्होंने मेडिकल कॉलेज में अपनी बेटी शिल्पी का एडमिशन विकलांग कोटे से करवाया. जबकि शिल्पी शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ पाई गई है.

डॉ विनोद भंडारी :  प्री मेडिकल टेस्ट घोटाले के मुख्य अभियुक्त. इन्हें मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और सुरेश पचौरी का नजदीकी माना जाता है. भंडारी इंदौर के अरविंदो मेडिकल कॉलेज के संचालक भी हैं.

डॉ संजीव सक्सेना :  कांग्रेस नेता सक्सेना मूलतः भिंड के हैं. इनका एक भाई अभिषेक पार्षद है. सक्सेना पूर्व गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके हैं. सक्सेना पर 2005 में प्रीपीजी का पर्चा लीक करने का आरोप भी लग चुका है.

डॉ दीपक यादव :  इन्हें पूर्व चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा का खास माना जाता है. यादव के परिवार में ही 15 डॉक्टर हैं. इनका सगा भाई राहुल और चचेरा भाई विकास भी डाक्टर है. जिनकी डिग्री पर सवालिया निशान लग गए हैं. यादव पर आरोप है कि  वे एमएस और एमडी की प्रीपीजी परीक्षा पास करवाने के लिए सेटिंग करते थे.

सीएसपी रक्षपाल सिंह यादव : ग्वालियर के सीएसपी रक्षपाल सिंह यादव के खिलाफ भी शिकायत दर्ज की जा चुकी है. इनके परिवार के तीन लोगों को गलत तरीके से पीएमटी परीक्षा में पास किए जाने का आरोप है.

प्रेम चंद्र प्रसाद :  एसटीएफ ने 2012 में हुए पीएमटी भर्ती घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निजी सचिव प्रेम चंद्र प्रसाद के खिलाफ सबूत मिलने पर उन्हें सरकारी गवाह बना लिया है. प्रसाद ने एसटीएफ को दिए बयान में माना है कि उनकी बेटी को भी गलत तरीके से एडमिशन दिया गया था. कांग्रेस नेता केके मिश्रा का कहना है कि ऐसा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दबाव में हुआ है, ताकि प्रसाद के खिलाफ कोई कार्रवाई न हो पाए. वे कहते हैं, ‘प्रसाद से पूछताछ होती तो उससे और राज खुलने की संभावना थी इसलिए उसे सरकारी गवाह बनाकर एसटीएफ ने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली. हालांकि पुलिस ने प्रसाद को इसी महीने के आखिर में बयान दर्ज करने के लिए बुलाया है.’

परीक्षा देने के बाद व्यापम के अफसर छात्रों की ओएमआर शीट निकाल लेते थे और पास होने के लिए जरूरी संख्या में सवाल हल कर उन्हें जमा कर देते थे

अपने पदाधिकारियों पर आरोप लगने के बाद संघ ने इस मुद्दे पर एक लाइन की प्रतिक्रिया दी है. रिपोर्टों के मुताबिक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने कहा कि कानून अपना काम करेगा और संगठन को चिंता करने की जरूरत नहीं है. उनसे पहले शिवराज सिंह चौहान भी यही बात कह चुके हैं.

वैसे मध्य प्रदेश में मुन्नाभाइयों (परीक्षार्थी के स्थान पर परीक्षा देने वाले) की मदद से भी बहुत से छात्रों की नैया पार लगाई गई है. इसमें भी एसटीएफ को व्यापम की संलिप्तता मिली है. इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2000 से 2013 के बीच में पुलिस ने अकेले पीएमटी की परीक्षा के दौरान 150 से भी ज्यादा मुन्नाभाइयों को पकड़ा है. मध्य प्रदेश में पीएमटी परीक्षा में पास करवाने का रैकेट चला रहे जगदीश सागर (इंदौर), तरंग शर्मा (भोपाल)और सुधीर राय (जबलपुर), व्यापम के चीफ सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा के साथ मिलकर छात्रों और मुन्नाभाईयों की जोड़ी बनाते थे जो असल परीक्षार्तियों की जगह खुद जाकर परीक्षा देते थे. लेकिन इसमें जोखिम देखते हुए सीधे ओएमआर शीट पर ही गड़बड़ी करने के नए तरीकों को ईजाद कर लिया गया.

कई इस मामले में एक राजनीतिक कोण भी देख रहे हैं. जानकारों का एक वर्ग मान रहा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान लाल कृष्ण आडवाणी के समर्थन के चलते शिवराज सिंह चौहान अब दबाव में हैं. चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मध्य प्रदेश कैडर के अफसर एस रामानुजम को खास तौर पर इस मामले की प्रगति पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी हैं. चौहान शीर्ष नेतृत्व के सामने अपना पक्ष रखने के लिए दिल्ली आए थे तो उन्हें समय देने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें नितिन गडकरी से मिलने के लिए कहा.

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