अवैध भरती की धरती!

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आरोपों की सूची यहीं खत्म नहीं होती. कांग्रेस का आरोप है कि दोषियों को सख्त कार्रवाई से बचाने की कोशिश हो रही है. उसके मुताबिक प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1998 के बजाय एसटीएफ ने आईपीसी की धारा 420 और 409 के तहत केस दर्ज कर दिए हैं. पार्टी का कहना है कि यदि एंटी करप्शन एक्ट की धारा 13 (आई) (डी) के तहत मामला दर्ज होता तो यह स्पेशल कोर्ट में चला जाता और इसमें आरोपियों को जमानत भी नहीं मिलती. पार्टी का यह भी आरोप है कि व्यापम के पास वर्ष 2008 तक का कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है जबकि लोक सेवा आयोग में 10 वर्ष तक उत्तर पुस्तिकाएं और 20 वर्ष तक रिजल्ट सुरक्षित रखने का नियम है. सवाल उठ रहा है कि व्यापम पर भी यही नियम लागू होता है, तो इसका पालन क्यों नहीं किया गया. कांग्रेस का यह भी आरोप है कि पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी एफआईआर दर्ज करने के 189 दिनों बाद इसलिए की गई क्योंकि जांच की आंच में मुख्यमंत्री निवास भी आने लगा था. सूत्रों के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद शर्मा का कहना था कि वे बड़े लोगों के लिए कुर्बानी दे रहे हैं.

चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मध्य प्रदेश कैडर के अफसर एस रामानुजम को खास तौर पर इस मामले की प्रगति पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी है

उच्च शिक्षा मंत्री के तौर पर लक्ष्मीकांत शर्मा व्यापम के भी मुखिया थे और आरोप है कि कई साल से फर्जी भर्तियों का यह धंधा उनके ही आशीर्वाद से चल रहा था. शर्मा को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का बेहद करीबी माना जाता है. इनके खिलाफ एफआईआर छह महीने पहले ही दर्ज हो चुकी थी, लेकिन गिरफ्तारी अब जाकर हुई है. कभी सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य रहे लक्ष्मीकांत शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जरिए भाजपा की राजनीति में आए थे. संघ के कोटे से ही उन्हें 1993 में पहली बार विधानसभा का टिकट दिया गया था. उमा भारती सरकार में उन्हें स्वतंत्र प्रभार देकर खनिज साधन सहित अन्य कई विभागों का मंत्री बनाया गया. उसके बाद से वे 2013 तक लगातार मंत्री पद पर रहे.

कुछ और बड़े भी दलदल में
सुधीर शर्मा :
 उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश में खनन माफिया के नाम से मशहूर भाजपा नेता सुधीर शर्मा ने पूरे मामले में बिचौलिए का काम किया है. शर्मा को पूर्व जनसंपर्क और उच्चशिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का खास आदमी माना जाता है. शर्मा के अन्य मंत्रियों से भी व्यवसायिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं. शर्मा खुद भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं. वे भाजपा की एजुकेशन सेल के प्रमुख भी हुआ करते थे. व्यापम घोटाले में नाम आने के बाद शर्मा ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में आरोप निरस्त करने के लिए याचिका भी दायर की है. इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है. खबर लिखे जाने तक वे फरार चल रहे थे.

डीआईजी आरके शिवहरे : एसटीएफ ने उपनिरीक्षक भर्ती घोटाले में आरके शिवहरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. इन पर दो आरोप हैं. पहला यह कि इन्होंने अपनी बेटी और दामाद को पीएमटी परीक्षा के परीणामों में टॉपर बनवाया और दूसरा यह कि इन्होंने उपनिरीक्षक भर्ती में 15 लाख प्रति विद्यार्थी की दर से तीन विद्यार्थियों के लिए 45 लाख रुपये नितिन महिंद्रा को दिए. नितिन महिंद्रा व्यापम के चीफ सिस्टम एनालिस्ट थे. पीएमटी परीक्षा की परीणाम सूची में शिवहरे के दामाद आशीष आनंद गुप्ता का पांचवां और बेटी नेहा का नाम सातवें स्थान पर है.

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जस्टिस एसएल कोचर : हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज एसएल कोचर का नाम भी पूरे मामले में सामने आया है. आरोप हैं कि उन्होंने मेडिकल कॉलेज में अपनी बेटी शिल्पी का एडमिशन विकलांग कोटे से करवाया. जबकि शिल्पी शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ पाई गई है.

डॉ विनोद भंडारी :  प्री मेडिकल टेस्ट घोटाले के मुख्य अभियुक्त. इन्हें मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और सुरेश पचौरी का नजदीकी माना जाता है. भंडारी इंदौर के अरविंदो मेडिकल कॉलेज के संचालक भी हैं.

डॉ संजीव सक्सेना :  कांग्रेस नेता सक्सेना मूलतः भिंड के हैं. इनका एक भाई अभिषेक पार्षद है. सक्सेना पूर्व गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके हैं. सक्सेना पर 2005 में प्रीपीजी का पर्चा लीक करने का आरोप भी लग चुका है.

डॉ दीपक यादव :  इन्हें पूर्व चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा का खास माना जाता है. यादव के परिवार में ही 15 डॉक्टर हैं. इनका सगा भाई राहुल और चचेरा भाई विकास भी डाक्टर है. जिनकी डिग्री पर सवालिया निशान लग गए हैं. यादव पर आरोप है कि  वे एमएस और एमडी की प्रीपीजी परीक्षा पास करवाने के लिए सेटिंग करते थे.

सीएसपी रक्षपाल सिंह यादव : ग्वालियर के सीएसपी रक्षपाल सिंह यादव के खिलाफ भी शिकायत दर्ज की जा चुकी है. इनके परिवार के तीन लोगों को गलत तरीके से पीएमटी परीक्षा में पास किए जाने का आरोप है.

प्रेम चंद्र प्रसाद :  एसटीएफ ने 2012 में हुए पीएमटी भर्ती घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निजी सचिव प्रेम चंद्र प्रसाद के खिलाफ सबूत मिलने पर उन्हें सरकारी गवाह बना लिया है. प्रसाद ने एसटीएफ को दिए बयान में माना है कि उनकी बेटी को भी गलत तरीके से एडमिशन दिया गया था. कांग्रेस नेता केके मिश्रा का कहना है कि ऐसा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दबाव में हुआ है, ताकि प्रसाद के खिलाफ कोई कार्रवाई न हो पाए. वे कहते हैं, ‘प्रसाद से पूछताछ होती तो उससे और राज खुलने की संभावना थी इसलिए उसे सरकारी गवाह बनाकर एसटीएफ ने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली. हालांकि पुलिस ने प्रसाद को इसी महीने के आखिर में बयान दर्ज करने के लिए बुलाया है.’

परीक्षा देने के बाद व्यापम के अफसर छात्रों की ओएमआर शीट निकाल लेते थे और पास होने के लिए जरूरी संख्या में सवाल हल कर उन्हें जमा कर देते थे

अपने पदाधिकारियों पर आरोप लगने के बाद संघ ने इस मुद्दे पर एक लाइन की प्रतिक्रिया दी है. रिपोर्टों के मुताबिक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने कहा कि कानून अपना काम करेगा और संगठन को चिंता करने की जरूरत नहीं है. उनसे पहले शिवराज सिंह चौहान भी यही बात कह चुके हैं.

वैसे मध्य प्रदेश में मुन्नाभाइयों (परीक्षार्थी के स्थान पर परीक्षा देने वाले) की मदद से भी बहुत से छात्रों की नैया पार लगाई गई है. इसमें भी एसटीएफ को व्यापम की संलिप्तता मिली है. इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2000 से 2013 के बीच में पुलिस ने अकेले पीएमटी की परीक्षा के दौरान 150 से भी ज्यादा मुन्नाभाइयों को पकड़ा है. मध्य प्रदेश में पीएमटी परीक्षा में पास करवाने का रैकेट चला रहे जगदीश सागर (इंदौर), तरंग शर्मा (भोपाल)और सुधीर राय (जबलपुर), व्यापम के चीफ सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा के साथ मिलकर छात्रों और मुन्नाभाईयों की जोड़ी बनाते थे जो असल परीक्षार्तियों की जगह खुद जाकर परीक्षा देते थे. लेकिन इसमें जोखिम देखते हुए सीधे ओएमआर शीट पर ही गड़बड़ी करने के नए तरीकों को ईजाद कर लिया गया.

कई इस मामले में एक राजनीतिक कोण भी देख रहे हैं. जानकारों का एक वर्ग मान रहा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान लाल कृष्ण आडवाणी के समर्थन के चलते शिवराज सिंह चौहान अब दबाव में हैं. चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मध्य प्रदेश कैडर के अफसर एस रामानुजम को खास तौर पर इस मामले की प्रगति पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी हैं. चौहान शीर्ष नेतृत्व के सामने अपना पक्ष रखने के लिए दिल्ली आए थे तो उन्हें समय देने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें नितिन गडकरी से मिलने के लिए कहा.

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