अलगाव को हवा देतीं घटनाएँ

 

कब, कहाँ लागू हुआ अफ्सपा?

अफ्सपा के अस्तित्व में आने के बाद पहली बार इसे 1 सितंबर, 1958 में असम और मणिपुर में लागू किया गया था। फिर सन् 1972 में कुछ संशोधनों के बाद इसे त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागानैंड सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत में लागू कर दिया गया। बाद में पंजाब, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर भी इसके दायरे में आया। भिंडरावाले के नेतृत्व में पंजाब में जब अलगाववादी आन्दोलन शुरू हुआ, तो अक्टूबर, 1983 में पूरे पंजाब और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में अफ्सपा लागू कर दिया गया।

बाद में भिंडरावाले के मौत के बाद सन् 1997 में पंजाब और चंडीगढ़ से अफ्सपा को वापस ले लिया गया था। त्रिपुरा में उग्रवाद शान्त होने पर मई, 2015 में अफ्सपा को हटाया गया था। वहाँ यह क़ानून 18 साल तक लागू रहा था। इसी तरह सन् 1990 के दशक में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने जोर पकड़ा, तो जम्मू-कश्मीर में भी अध्यादेश के ज़रिये अफ्सपा लागू किया गया। फिर एक साल बाद 5 जुलाई, 1990 को क़ानून बना दिया गया, जो वहाँ आज तक लागू है। इस क़ानून से लेह-लद्दाख़ का क्षेत्र प्रभावित नहीं है।

यह बहुत दिलचस्प है कि नागानैंड के उग्रवादी समूह का सन् 2015 में केंद्र सरकार के साथ समझौता हुआ था। तब एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुंगलेंग मुइवा और सरकार के वार्ताकार आर.एन. रवि के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। हालाँकि इस समझौते के बावजूद नागानैंड में अफ्सपा $कायम रहा। इस घटना के बाद वहाँ सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ जबरदस्त आक्रोश पैदा हो गया, जो हिंसा और आगजनी के रूप में सामने दिखा है।

अफ्सपा हटाने की पहल ख़ुद केंद्र सरकार कर सकती है। सम्बन्धित राज्य सरकार भी अफ्सपा को हटाने, उसकी अवधि बढ़ाने आदि को लेकर सिफ़ारिश कर सकती है; लेकिन अन्तिम फ़ैसला लेने का अधिकार राज्यपाल या केंद्र सरकार को ही प्राप्त है।

जहाँ तक इसे लागू करने के प्रावधान की बात है, तो भाषा, क्षेत्र, समुदाय, जाति, नस्ल आदि के आधार पर हिंसा या गहरे विवाद की स्थिति में उग्रवादी गतिविधियों और उपद्रव के मद्देनजर किसी इलाक़े या पूरे प्रदेश को अशान्त क्षेत्र घोषित किये जाने का प्रावधान है। अफ्सपा की धारा-3 में कहा गया है कि किसी प्रदेश (राज्य या केंद्र शासित प्रदेश) के राज्यपाल को वहाँ अलग-अलग आधार पर बने गुटों के बीच तनाव के कारण पैदा हुई अशान्ति के आधार पर भारत के राजपत्र में आधिकारिक सूचना जारी करवानी होती है। राजपत्र में सूचना निकलते ही सम्बन्धित क्षेत्र को अशान्त मान लिया जाता है और तब केंद्र सरकार वहाँ की पुलिस की शान्ति की बहाली के प्रयास में मदद के लिए सशस्त्र बलों को भेजती है।

नागानैंड घटना में तो सभी मानते हैं कि इस मामले में सुरक्षा बलों से चूक हुई है। ख़ुद गृहमंत्री ने घटना पर अफसोस जताया है और जाँच की भी घोषणा की है। लेकिन ऐसी घटनाओं पर सरकार क्या स्पष्टीकरण देती है? इससे बड़ा सवाल यह बनता है कि सरकारी स्पष्टीकरण को उस क्षेत्र के लोग किस तरह देखते हैं। ख़ासकर उत्तर-पूर्व के सन्दर्भ में देखा जाए तो ऐसे तमाम मामलों में जाँच की घोषणाएँ होती रही हैं; लेकिन उनका कोई ख़ास नतीजा निकलता नहीं देखा गया।

समस्या की जड़ अफ्सपा को ही माना जाता है। देखा जाए, तो पिछले 20 वर्षों के दौरान जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से आर्मी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जितनी भी सिफ़ारिशें आयीं, केंद्र ने अफ्सपा के तहत उन सभी मामलों में मुक़दमा चलाने की इजाज़त देने से इन्कार कर दिया। स्वाभाविक ही अफ्सपा झेल रहे तमाम इलाक़ों में इसे काले क़ानून के रूप में देखा जाता है। इस बार भी घटना के बाद से अफ्सपा हटाने की माँग तेज़ हो गयी है। वहाँ तक कि भाजपा के सहयोगी दलों से जुड़े दो मुख्यमंत्री-नागानैंड के नेफ्यू रियो और मेघालय के कॉनराड के संगमा भी ऐसी माँग करने वालों में शामिल हो चुके हैं।

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आतंकवाद या उग्रवाद से निपटना काफ़ी मुश्किल काम है और सुरक्षा बलों को भी अपनी जान जोखिम में डाले रहते हुए ड्यूटी करनी पड़ती है। इसके बावजूद सुरक्षा बलों या आम लोगों के बीच इस तरह का अहसास जमने देना ठीक नहीं है कि सुरक्षा बलों के जवान कुछ भी करें, मगर उनके ख़िलाफ़ किसी तरह की क़ानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

कई चर्चित मामलों में भी सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ किसी तरह की कार्रवाई न होने से ऐसा भाव बनने लगा है और यह भी एक वजह है कि कई विशेषज्ञ भी अफ्सपा हटाने की ज़रूरत बताते रहे हैं। खासकर चीन के साथ सीमा विवाद से गरमाये माहौल और म्यांमार में सैन्य सत्ता की वापसी के चलते सीमावर्ती राज्यों में बने हालात को ध्यान में रखें, तो अफ्सपा पर पुनर्विचार की यह ज़रूरत और बढ़ जाती है।

 

सेना का विरोध क्यों?

मणिपुर की बात करें, तो नवंबर 10 जुलाई, 2004 में आधी रात को एक महिला थंगजाम मनोरमा के साथ सेना के जवानों ने कथित रूप से रेप करके उसकी हत्या कर दी थी। बाद में मनोरमा का शव क्षत-विक्षत हालत में मिला था। घटना के बाद 15 जुलाई, 2004 को दर्ज़नों मणिपुरी महिलाओं ने नग्न होकर सेना के ख़िलाफ़ हाथ में तख्तियाँ लिए सडक़ों प्रदर्शन किया था। इन तख़्तियों पर लिखा था- ‘रेप मी’।

इस घटना के बाद देश भर में बहुत नाराज़गी उभरी। कई सामजिक संगठनों के इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन किये। इसके अलावा नवंबर, 2000 में मणिपुर में ही एक बस स्टैंड के पास 10 लोगों को सैन्य बलों ने गोली मार दी। घटना के वक़्त इरोम शर्मिला वहीं मौज़ूद थीं, जिन्होंने अफ्स्पा के विरोध में बाद में लगातार 16 साल तक अनशन किया। उस समय 29 साल की इरोम की यह भूख हड़ताल देश ही नहीं दुनिया भर में चर्चा में रही। अगस्त, 2016 में भूख हड़ताल ख़त्म करने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी बनाकर चुनाव भी लड़ा; लेकिन सफल नहीं हुईं। राज्य ही नहीं दर्ज़नों मानवाधिकार संगठन और कार्यकर्ता इस क़ानून का जबरदस्त विरोध करते आये हैं। जम्मू-कश्मीर में भी यह क़ानून लागू है और सेना और सुरक्षा बलों पर आरोप लगते हैं, इसका दुरुपयोग किया जाता है। नक़ली मुठभेड़ों में आम लोगों की हत्या के दर्ज़नों आरोप लगाये जाते रहे हैं। इनमें कई आरोप सच साबित हुए हैं। हिरासत में लेकर प्रताडि़त करने के आरोप भी लगते हैं। राजनीतिक दल राजनीतिक आधार पर प्रताडऩा के आरोप लगाते हैं। इसमें गिरफ़्तारी भी मनमाने तरीक़े से होती है। क़ानून के तहत अर्धसैन्य बलों पर मुक़दमे बिना केंद्र की मंज़ूरी के नहीं हो सकते, लिहाज़ा यह आरोप लगते कि सेना के मनोवल के नाम पर जब कभी भी सैन्य बलों पर ऐसे आरोप लगते हैं, तो बहुत कम में ही कोई मामला दर्ज हो पाता है या पीडि़त को न्याय मिल पाता है। सरकार क़ानून के पक्ष में यह तर्क देती है कि इसके बिना आतंकी या उग्रवादी घटनाओं को रोकने में मदद नहीं मिल सकती। नक्सल प्रभाहित राज्यों में भी इस क़ानून का इस्तेमाल होता है। वहाँ भी लोगों के मानवाधिकार हनन के आरोप लगते रहे हैं।