अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है एनपीए | Page 2 of 2 | Tehelka Hindi

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अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है एनपीए

जिस समय बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था उस समय उसका एक लक्ष्य यह भी था कि कृषि क्षेत्र को संस्थागत कजऱ् मुहैया कराया जाए। बैंक राष्ट्रीयकरण की शुरूआत से ही पूंजीवादी व्यवस्था और इजारेदारी के समर्थकों ने यह छवि बनाने की कोशिश की कि एनपीए का मुख्य कारण किसानों का कजऱ् न चुका पाना है। लेकिन इन आरोप का खोखलापन उन सूचियों से जाहिर हो जाता है जो समय-समय पर बैंकों के कर्मचारी जारी करते रहे हैं। इन सूचियों के अनुसार कार्पोरेट ग्राहक सबसे बड़े कजऱ्दार हैं। इस कारण किसानों की कजऱ् लौटने की विफलता बैंकिग व्यवस्था के लिए कोई गंभीर मुद्दा नहीं है। एनपीए कितना है इसका अनुमान लगाना बेहद कठिन है, पर एक आकलन के अनुसार इस समय यह आठ लाख करोड़

रु पए के आसपास होना चाहिए। इसमें बड़े घरानों का हिस्सा 75 फीसद से भी ज्य़ादा हो सकता है। इस तरह, इन अनुमानों से यह नतीजा निकलता है कि बंैकों के कजऱ्ों का 56.25 फीसद बड़े घरानों के पास है। सरकार के मौजूदा सारे कदम बड़े घरानों के हक में जा रहे हैं।

यह सरकार कालेधन और दरबारी पूंजीवाद के खिलाफ होने का दम भरती है लेकिन ऐसा है नहीं। यदि यह वास्तव में ऐसी होती तो सबसे पहले उन लोगों की सूची जारी करती तो ’डिफाल्टरÓ हैं। दूसरे, बड़े ’डिफाल्टरोंÓ की इस बात की जांच होती कि क्या ये लोग असल में डिफाल्टर है या जानबूझ कर पैसा लौटाना नहीं चाहते। यदि इन ’डिफाल्टरोंÓ पर जांच हो तो बैंकों की जान बच सकती है।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 10 Issue 05, Dated 15 March 2018)

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