अभिशप्त लोकायुक्त

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प्रदेश सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे ‘प्रगतिशील गणतांत्रिक मोर्चा (पीडीएफ)’ के सात विधायक भी इस अधिनियम को लागू किए जाने के पक्ष में हैं. पीडीएफ के सदस्य और वर्त्तमान शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी कहते हैं, ‘इस अधिनियम को इसी स्वरूप में लागू किया जाना चाहिए जैसे यह पास होकर आया है. यदि किसी के मन में चोर नहीं है तो इसे लागू करने से डर क्यों रहे हैं.’ नैथानी आगे बताते हैं, ‘जो लोग आज इसका विरोध कर रहे हैं, वे वही हैं जिन्होंने दो साल पहले खुद इस अधिनियम के समर्थन में वोट किया था. कांग्रेस का कोई भी विधायक ऐसा नहीं था जिसने विधानसभा में इस अधिनियम का विरोध किया हो.’

आज प्रदेश की कांग्रेस सरकार सबसे ज्यादा इसी बात पर घिर रही है कि यदि यह अधिनियम सही नहीं था तो दो साल पहले इसे सर्वसम्मति से पास क्यों किया गया. इस पर सूर्यकांत धस्माना कहते हैं, ‘उस वक्त सारे देश में अन्ना हजारे के आंदोलन का दबाव था. इसलिए हमने इसके खिलाफ वोट नहीं किया. लेकिन उस वक्त भी हमारे नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत ने यह बयान दिया था कि यदि कांग्रेस की सरकार बनेगी तो इस अधिनियम को लागू नहीं किया जाएगा.’

2011 में इस अधिनियम का विरोध करने वाले एकमात्र विधायक किशोर उपाध्याय कहते हैं, ‘मैंने उस वक्त भी इस अधिनियम के खिलाफ धरना तक दिया था. लेकिन हमारे नेता प्रतिपक्ष ने इसके समर्थन में वोट देने को कहा. मैंने तब उनसे यही कहा था कि मैं इसके समर्थन में वोट नहीं कर सकता और लिहाजा वोटिंग के समय मैंने वॉक आउट किया था.’ किशोर आज भी इस अधिनियम का विरोध करते हुए कहते हैं, ‘यह अधिनियम खंडूरी जी ने सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने के लिए आनन-फानन में पास करवाया था. प्रदेश के किसी भी विधि-विशेषज्ञ की राय इस संबंध में नहीं ली गई थी. ‘

इन सभी राजनीतिक मुद्दों से इतर इस अधिनियम का गुणदोष के आधार पर भी काफी विरोध हुआ है. 2011 में जब प्रदेश से इस अधिनियम को पास किया गया था तो अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने इसकी जमकर तारीफ की थी. तब भाकपा (माले) की राज्य कमेटी की तरफ से अन्ना टीम को इस अधिनियम के विरोध में एक पत्र लिखा गया था. भाकपा (माले) की राज्य कमेटी के सदस्य इंद्रेश मैखुरी बताते हैं, ‘इस अधिनियम के अनुसार किसी भी विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री के खिलाफ तब तक जांच शुरू नहीं हो सकेगी जब तक लोकायुक्त के सभी सदस्य सर्वसम्मति से इसकी अनुमति न दे दें. यानी नेताओं के खिलाफ जांच के लिए लोकायुक्त के हर सदस्य के पास वीटो है. जबकि इन सदस्यों को नियुक्त करने वाली चयन समिति का अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री ही होगा. ऐसे में तो यह असंभव है कि कभी किसी नेता के खिलाफ जांच हो भी पाए. ऊपर से इसमें  यह भी प्राविधान है कि शिकायतकर्ता पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना किया जा सकता है. प्रभावशाली लोगों के खिलाफ शिकायत करने से लोग वैसे ही घबराते हैं, उस पर जुर्माने के डर से तो लोगों का सामने आना भी मुश्किल है.’

इंद्रेश इस अधिनियम पर हो रहे विवाद के बारे में बताते हैं, ‘पिछली भाजपा सरकार में अधिकारियों, विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ कुल 2,541 मामले लोकायुक्त कार्यालय में पंजीकृत हुए. इनमें से कई को दोषी पाते हुए तत्कालीन लोकायुक्त ने मुख्यमंत्री को रिपोर्ट भी सौंपी थी. यदि खंडूरी जी की नीयत साफ थी तो वे उन पर कार्रवाई करते. लेकिन एक भी दोषी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं की गई. इस अधिनियम के प्रावधान तो भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का काम करने वाले हैं. लेकिन जनता में यह भ्रम है कि मुख्यमंत्री को लोकायुक्त के दायरे में लाने वाला यह अधिनियम शायद बहुत प्रभावशाली होगा. हमने प्रशांत भूषण को पत्र लिखकर उनसे इस अधिनियम की कमियों पर जवाब देने की मांग की थी. लेकिन उनकी तरफ से कोई भी जवाब नहीं आया. ‘

आज आलम यह है कि प्रदेश सरकार इस अधिनियम को संशोधित करने या फिर इसे नए अधिनियम से बदलने के भरसक प्रयास कर रही है. इस संबंध में सात नवंबर को कैबिनेट की एक बैठक भी बुलाई गई थी लेकिन प्रिंस चार्ल्स के देहरादून दौरे के चलते इसे रद्द करना पड़ा. अब यह बैठक 17 नवंबर को रखी गई है. हालांकि सरकार के लिए भी ऐसा करना आसान नहीं होगा क्योंकि उसके भीतर ही कई लोग इस अधिनियम के खुले समर्थन में हैं. इनका मानना है कि फिलहाल इस अधिनियम को लागू किया जाए और बाद में जरूरत पड़ने पर ही संशोधन किए जाएं.

बहरहाल राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही यह अधिनियम उत्तराखंड राज्य का कानून बन चुका है जिसे लागू करने के लिए सरकार के पास 180 दिन का समय है. इसके बाद मौजूदा लोकायुक्त को निरस्त मान लिया जाएगा. लिहाजा वर्तमान लोकायुक्त के अस्तित्व और वैधता पर भी इस अधिनियम ने सवाल खड़े कर दिए हैं. साथ ही इस अधिनियम की धारा 12 के कुछ बिंदु ऐसे हैं जिनके द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को भी निर्देशित किया गया है जिन्हें आपत्तिजनक माना जा रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय में विधि के सहायक प्रोफेसर संतोष शर्मा बताते हैं, ‘बड़े पैमाने पर तो इस अधिनियम में कुछ भी ऐसा नहीं जिसके कारण इसे असंवैधानिक कहा जाए. लेकिन इसके कुछ बिंदु ऐसे जरूर हैं जो अन्य कानूनों से टकराव पैदा करेंगे.’ साथ ही कानून के जानकार यह भी बताते हैं कि यह अधिनियम पहली नजर में लुभावना भले ही दिखता हो लेकिन नेताओं पर कार्रवाई के मामले में इसके प्रावधान ऐसे हैं कि ‘न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी.’

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