अफ़ग़ान पर फिर तालिबान हावी

भारत का नज़रिया


विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अफ़ग़ान में तालिबान की बढ़ती ताक़त की रिपोट्र्स के मद्देनज़र स्पष्ट तौर पर कहा कि वह अफ़ग़ानिस्तान में शान्ति के लिए लगातार कोशिश करता रहेगा। वैसे भारत हालात को देखते हुए काबुल स्थित दूतावास या दूसरे वाणिज्य दूतावासों में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या ज़रूर कम कर सकता है। जयशंकर की हाल की रूस यात्रा के दौरान अफ़ग़ान पर अहम चर्चा हुई है। रूस और भारत के विदेश मंत्रियों के बीच वार्ता को लेकर कहा गया है कि सकारत्मक रही। भारत अफ़ग़ानिस्तान सरकार और वहाँ के राजनीतिक दलों से भी लगातार सम्पर्क बनाये हुए है। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद जिस तरह से अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता फैली है, उसे देखते हुए रूस की भावी भूमिका पर सभी की नज़र है। हाल में यह ख़बरें बड़ी तेज़ी से सामने आयी हैं कि भारत तालिबान के साथ सम्पर्क में है। भारत सरकार ने भले इससे साफ़तौर पर इन्कार किया है; लेकिन माना जा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान के बदलते हालात को देखकर भारत अपने हितों को लेकर हर सम्भव कोशिश में जुटा हुआ है। पाकिस्तान मीडिया तो कमोवेश लगातार इस तरह की ख़बरें भी चला रहा है। याद रहे सन् 1999 में जब भारत के एक यात्री विमान का अपहरण हुआ था, उसे अफ़ग़ानिस्तान के कंधार हवाई अड्डे पर ले जाया गया था। तब यह क्षेत्र तालिबान के नियंत्रण में था, लिहाज़ा अपहरण करने वालों और भारत के बीच मध्यस्थता वही कर रहा था। भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था, जब भारत सरकार को तालिबान के साथ किसी तरह का कोई सम्पर्क साधना पड़ा हो। हालाँकि उसके बाद भारत सरकार और तालिबान के कभी किसी सम्पर्क की सूचना नहीं रही। एक देश के रूप में भारत हमेशा अफ़ग़ानिस्तान की सरकार के साथ खड़ा रहा। सन् 1996 में विमान अपहरण से तीन साल पहले जब तालिबान ने वहाँ की सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया था, तब भारत के राजनयिकों ने देश छोड़ दिया था। सन् 2001 में जब भारत ने अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ राजनयिक रिश्तों का हाथ बढ़ाया, तब अमरीका के नेतृत्व वाली नाटो फ़ौज ने तालिबान के ठिकानों पर हमले किये और उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। लेकिन चूँकि अब तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में फिर ताक़त हासिल कर चुका है, भारत के सामने एक चुनौती तो बनी ही है।
पिछले क़रीब दो दशक में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में सैकड़ों परियोजनाओं और आर्थिक मदद में हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च किये हैं। पिछले साल नबंबर में ही भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में 150 नयी परियोजनाओं का ऐलान किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो सन् 2015 में भारत के सहयोग से बने अफ़ग़ानिस्तान संसद के नये भवन का उद्घाटन करने के अलावा सन् 2016 में हेरात में 42 मेगावॉट वाली बिजली और सिंचाई परियोजना का उद्घाटन तक कर चुके हैं। बीआरओ भी अफ़ग़ानिस्तान में कई सड़कों निर्माण में सहभागी है। वहाँ की सेना, पुलिस और अधिकारियों को प्रशिक्षण भारत में मिलता है। अब जबकि तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान में दबाव बढ़ा है, भारत इस पर गहराई से सोच रहा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर का कहना है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में किसी भी तरह के इस्लामिक अमीरात का समर्थन नहीं करेगा। तालिबान ख़ुद को इस्लामिक अमीरात ऑफ अफ़ग़ानिस्तान के रूप में पेश करता रहा है। ज़ाहिर है भारत तालिबान को यह सन्देश दे रहा है कि उसे भारत का समर्थन मिलने की कल्पना नहीं करनी चाहिए। हालाँकि इसके बावजूद तालिबान से भारत की बातचीत की ख़बरें सामने आने से यह आभास तो मिलता ही है कि भारत अमेरिका सेना के पूरी तरह लौट जाने के बाद की स्थिति को लेकर कोई बेहतर विकल्प सोच रहा है।

 

“तालिबान अगले 100 वर्षों में भी अफ़ग़ान सरकार को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर नहीं कर सकता। तालिबान और उसके समर्थक देश में वर्तमान रक्तपात और विनाश के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार हैं।”

अशरफ़ गनी
राष्ट्रपति, अफ़ग़ानिस्तान