अपनी कहानी अपनी जबानी

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इन भाषाओं में छप रहे पत्र-पत्रिकाओं या पुस्तकों के सामने आर्थिक मोर्चे से लेकर वितरण-बिक्री तक का संकट तो है ही, एक सवाल यह भी है कि ऐसे प्रकाशनों का संबंधित समाज पर कितनी दूर तक असर पड़ रहा है. संथाल की चर्चित कवयित्री निर्मला पुतुल कहती हैं, ‘स्थानीय भाषाओं में लेखन और प्रकाशन का दायरा मुट्ठी भर लोगों तक सीमित है. और यदि वह ओलचिकी जैसी स्थानीय लिपि में लिखी जा रही हो तो वह और सिमट जाता है, ऐसे में यह जरूरी है कि इसका अनुवाद भी देवनागरी और दूसरी अन्य भाषाओं में होते रहना चाहिए, ताकि दायरा बढ़ सके.’ उनका मानना है कि अपनी भाषा में लिखनेवाले आत्ममुग्धता के शिकार होते जा रहे हैं और अधिकांश सिर्फ गीत, कहानी, उपन्यास, सौंदर्यबोध में ही फंस गए हैं जबकि समस्याओं, कुरीतियों आदि पर ज्यादा लिखा जाना चाहिए. उधर, रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष गिरिधारी राम गौंझू कहते हैं कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से देशज भाषा में लिखने वाले लोग लगातार बेहतरी की कोशिश में लगे हुए हैं. उनके मुताबिक इससे नई चीजें सामने आ रही हैं और लोगों को समझने का मौका मिल रहा है.

[box]लेखकों और प्रकाशकों के सामने नयी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में अपनी संस्कृति को बचाए रखने की चुनौती है.[/box]

तमाम संभावनाओं और विडंबनाओं के बीच एक वर्ग का आरोप है कि स्थानीय भाषाओं में इतनी पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के उभार की कहानी के पीछे बड़े हिस्से का मकसद सरकार से विज्ञापन प्राप्त कके अपनी दुकान चलाना है. लेकिन ज्यादातर लोगों को यह तर्क सही नहीं लगता इसका एक कारण तो यह है कि सरकार से इन पत्रिकाओं को इतना विज्ञापन नहीं मिलता जिससे सालों भर एक रोजगार की जरूरत को पूरा किया जा सके. और यदि यह मान भी लें कि ऐसे अभियान से प्रकाशक औसतन तीन-चार हजार रुपये मासिक आमदनी भी कर लेते होंगे तो यह बेहतर नजरिये से ही देखा जाना चाहिए. आखिर इस बहाने ही सही, वर्षों से दबी एक बड़ी जमात की आकांक्षा उभार ले पा रही है और इतिहास को मौखिक तौर पर सहेजकर रखने की परंपरा अब छपकर सदा-सदा के लिए संकलित हो रही है. कई नये लेखक तैयार हो रहे हैं. जो लेखक थे, वे छपकर सामने आ रहे हैं.

निर्मला पुतुल का मानना है कि आदिवासी साहित्य के उतरोत्तर विकास की राह में कई नई चुनौतियां भी हैं जिनसे रचनाशीलता के पहले चरण में ही लेखकों को जूझना पड़ रहा है मसलन भाषा के मानकीकरण का सवाल, अनेक लिपियों का इस्तेमाल आदि. उनके मुताबिक इन लेखकों और प्रकाशकों के सामने नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में अपनी संस्कृति को बचाये रखने की चुनौती है. अपने एक लेख में वे कहती हैं, ‘ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भाषा-साहित्य बाजार के पहलू में बैठी राजनीतिक व्यवस्था की दयादृष्टि पर निर्भर हो गया है. आर्थिक मंदी की मजबूरी में पूंजी और साम्राज्यवाद ने दुनिया को एक छोटे-से गांव में बदलने की योजना बनाई है. जाहिर है कि जब एक ही गांव होगा तो भाषा-साहित्य भी एक ही होगा. इसलिए विश्व पूंजी बाजार दुनिया की सभी भाषाओं को लील जाने की तैयारी में है. उसके पहले निशाने पर आदिवासी साहित्य और भाषाएं हैं क्योंकि आदिवासी इलाकों में ही धरती की विशाल धन-संपदा, खनिज, जमीन, पानी और अन्य दूसरे संसाधन हैं.’ उम्मीद है कि आदिवासी भाषाओं में लेखन और प्रकाशन की यह नई बयार इस चुनौती के सामने मजबूती से खड़ी होगी.

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