अनैतिक ‘नाता’

‘तहलका’ ने नाता प्रथा की $खामियाँ सामने लाकर अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया है; और अब यह केंद्र और राज्यों पर निर्भर है कि वे इस प्रथा के तहत पीडि़त महिलाओं और इस व्यवस्था से प्रताडि़त हो रहे बच्चों की मदद करें। शायद इस प्रथा का मूल कारण ग़रीबी, अशिक्षा और अधिकारों के बारे में जागरूकता की कमी है। इन असहाय महिलाओं और बच्चों को उनके मौलिक अधिकारों की आवश्यकता है; जैसा कि संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत निहित है, जिसमें समानता का अधिकार, शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियमित है। क्या कोई इसे सुनेगा?