अनारक्षित सीट, ‘आरक्षित’ चुनौती

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सतनाम सेना का गठन करने वाले गुरु बालदास.
सतनाम सेना का गठन करने वाले गुरु बालदास.

देश में फिलहाल 20 ऐसे दल हैं, जो अपने नामों में अंबेडकर, शोषित, दलित या रिपब्लिकन जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर दलित या आदिवासी वर्ग के कल्याण का दावा करते हैं. चाहे मायावती के नेतृत्व वाली बसपा हो, रामविलास पासवान की लोजपा या पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी, रामदास आठवले की आरपीआई सभी पार्टियां दलित वर्ग को अपने पाले में खड़ा करने की कोशिश में लगी रहती हैं. आंकडों में बात करें तो हिंदुस्तान की कुल 543 लोकसभा सीटों में अनुसूचित जाति के लिए 79 और अनुसूचित जनजाति के लिए 42 सीटें आरक्षित हैं. शेष 422 सामान्य सीटें हैं. वर्तमान नियमों के हिसाब से आरक्षित सीट से सामान्य वर्ग का कोई उम्मीदवार नहीं लड़ सकता. लेकिन सामान्य सीट से किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के उम्मीदवार के चुनाव लड़ने पर कोई पाबंदी नहीं है. गडबड़झाले की शुरुआत यहीं से होती है. संविधान की इसी छूट के कारण अमूमन देश की हर तीसरी सीट पर दलित और आदिवासी वर्ग के उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे होते हैं. इससे उस सीट पर किसी विशेष जाति या समुदाय का वोट बैंक सीधे तौर पर प्रभावित होता है. इसका खामियाजा सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार उठाते हैं क्योंकि कई बार जीत और हार का अंतर महज कुछ ही वोटों का होता है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण भी हम छत्तीसगढ़ से ही ले सकते हैं. बीते साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का गढ़ कहलाने वाली लोरमी सीट भाजपा प्रत्याशी तोखन साहू महज 6,241 वोटों से जीते हैं. इस अनारक्षित सीट पर साहू को 52,302 वोट मिले. वहीं इलाके में अच्छी पकड़ रखने वाले कांग्रेस उम्मीदवार धरमजीत सिंह को 46,061 वोट पाने के बाद भी शिकस्त का सामना करना पड़ा. दरअसल धरमजीत सिंह के विजय रथ को अनुसूचित जाति वर्ग (सतनामी समुदाय) के उम्मीदवार गुरु सोमेश ने रोक दिया. चुनाव परिणाम में तीसरे स्थान पर रहे अखिल भारतीय सतनाम सेना के उम्मीदवार सोमेश को 16,649 वोट मिले. यह संख्या जीत-हार के अंतर से काफी ज्यादा है. सोमेश ने जो वोट काटे वे सतनामी (दलित) समुदाय के थे और इन्हें कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता है. चूंकि सोमेश खुद सतनामी थे इसलिए उनके समुदाय ने कांग्रेस के बजाय उन्हें ही वोट देना वाजिब समझा.

लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के बारे में बात करते हुए अखिल भारतीय सतनाम सेना के राष्ट्रीय महासचिव लखमू सतनामी तहलका को बताते हैं, ‘पूरे प्रदेश में 70 से 80 लाख सतनामी निवास करते हैं. छत्तीसगढ़ में हमने पांच प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं. जिन लोकसभा सीटों पर हमने अपने उम्मीदवार उतारे हैं वे भी सतनामी बहुल सीटें हैं. अब यह अलग बात है कि वे अनारक्षित हैं.’  लखमू सतनामी जिन पांच क्षेत्रों रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, दुर्ग और राजनांदगांव की बात कर रहे हैं, वे सभी सामान्य लोकसभा सीट हैं. दिलचस्प बात है कि सेना ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित प्रदेश की एकमात्र जांजगीर चांपा से भी पहले प्रत्याशी घोषित किया था लेकिन बाद में उसे मुकाबले से हटा लिया. लेकिन ऐसा क्यों हुआ? इसका कोई ठोस जवाब लखमू सतनामी के पास नहीं है. लखमू कहते हैं कि जांजगीर चांपा से खड़े सारे उम्मीदवार उनके ही समुदाय के हैं इसलिए उनकी पार्टी ने उन्हें चुनौती देना ठीक नहीं समझा. जबकि महासमुंद सीट से घोषित हुमन बंजारे के नाम वापस लेने के बारे में लखमू कहते हैं, ‘ उन्होंने दबाव में आकर अपना नाम वापस ले लिया.’ किसने दबाव बनाया? यह पूछने पर वे कहते हैं, ‘ छोड़िए ना, सबको तो पता है. हमारे साथ धोखा हो गया. अब अगली बार हम ऐसी परिस्थितियों के लिए सतर्क रहेंगे.’  ध्यान देने वाली बात है कि महासमुंद से कांग्रेस ने अजीत जोगी को टिकट दिया है. राज्य में जोगी और सतनामी समुदाय एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं. ऐसे में सतनाम सेना के उम्मीदवार हुमन बंजारे का नाम वापस लेना, इस बात का इशारा करता है कि उन्होंने जोगी के समर्थन में हथियार डाल दिए. यदि ऐसा नहीं होता तो जोगी के लिए मुश्किल हो सकती थी क्योंकि महासमुंद सीट पर सतनामियों की अच्छी-खासी (15 फीसदी) आबादी निवास करती है.

छत्तीसगढ़ में ज्यादातर नेता अनारक्षित सीटों पर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के खड़े होने को एक समस्या की तरह देखते हैं. भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष प्रभा दुबे कहती हैं ‘जब संविधान के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के उम्मीदवारों के लिए सीट आरक्षित की गई हैं तो उन्हें इस तरह सामान्य सीट से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए. इससे उम्मीदवार से नाता रखने वाले समुदाय अपना वोट जाति के आधार पर देकर परिणामों को प्रभावित करते हैं. बात एक या दो सीट की हो या महज संयोग की हो तब तो ठीक है. लेकिन योजनाबद्ध तरीके से अनारक्षित सीटों से आरक्षित जातियों का चुनाव लड़ना पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करता है.’ वहीं कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता रविंद्र शुक्ला कहते हैं, ‘ इस पर कुछ कहना ठीक नहीं होगा. लेकिन इतना जरूर है कि यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.’

हालांकि नेता इस मसले पर चाहे जो सोचें चुनाव आयोग की इसपर स्पष्ट और तटस्थ राय है. छत्तीसगढ़ के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सुनील कुजूर कहते हैं, ‘चुनाव आयोग ने हर सीट को लेकर अपनी परिभाषा तय कर रखी है. ऐसे में यदि सामान्य सीट से कोई दलित या आदिवासी उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं तो इसमें हम क्या कर सकते हैं. यह तो राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों पर निर्भर करता है कि वे सामान्य सीट से किसे टिकट दे रहे हैं.’

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