अनहोनी का हिमालय

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क्या इसलिए नहीं कि सूचना और सफलता की आपाधापी और भागदौड़ में हमने वह भाषा खो दी है जो ऐसी विराट त्रासदी के मर्म तक पहुंच सके? हमने वह विन्यास तोड़ दिया है जिसके भीतर ऐसा अघटित समा पाता?  मौत और त्रासदी ब्रेकिंग न्यूज नहीं हैं, लेकिन अगर इसे ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनाएंगे तो निजी दुख की इस विराट कथा को उस बाजार तक कैसे पहुंचाएंगे जो सूक्ष्म रेखाओं को नहीं, स्थूल पट्टियों को ही देख पाता है और संवेदना के धरातल पर इतना कुंद हो चुका है कि ऐसी चीखती हुई पट्टियों से ही समझ पाता है कि कुछ बड़ा घटा है. इसके बाद उसका राहत उद्योग खुलता है, उसकी पर्यावरण की फिक्र चलती है, उसकी विकास की बहस शुरू होती है. ऐसी बहसों में सवाल भी जैसे तय होते हैं और जवाब भी जैसे तैयार होते हैं. मसलन, त्रासदी के पहले ही दिन सबको खयाल आ गया कि यह पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ का नतीजा है. अगले दिन उत्तराखंड में विकास की परियोजनाओं पर सवाल उठाए जाने लगे. उसके एक दिन बाद पर्यावरण बनाम विकास की बहस चली. इन सबके बीच आस्था में लहालोट लोग बताते रहे कि सब कुछ भले खत्म हो गया हो, भगवान ने केदारनाथ का मंदिर बचा लिया. भगवान होगा तो वह भी अपनी इस तारीफ पर रोया होगा.

निस्संदेह, उत्तराखंड में जो कुछ हुआ, उसमें विकास और धार्मिक पर्यटन के नाम पर पैदा किए गए बहुत सारे विद्रूपों का भी हाथ है. लेकिन जब यह पर्यटन का कारोबार नहीं था, तब भी त्रासदियां होती थीं और वे कम मर्मांतक नहीं होती थीं. इन सबका सबक एक ही है- प्रकृति को जितनी जगह चाहिए, उतनी हम नहीं दे रहे. लेकिन क्या यह सिर्फ उत्तराखंड की सच्चाई है? दिल्ली की हकीकत भी यही है- कभी एक बड़ा भूकंप आया तो यह पूरा महानगर जैसे ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा. और दिल्ली ही क्यों, विकास और बाजार के नाम पर तबाही के अलग-अलग बीज हमने तमाम शहरों में बो दिए हैं. जानते हुए भी हम इसे देखने को तैयार नहीं होते क्योंकि अगर यह विकास नहीं होगा, यह बाजार नहीं आएगा तो हमारी वह निर्बाध जीवन शैली नहीं चलेगी जिसकी हमें लत लग गई है. बेरोकटोक उपभोग का जो स्वर्ग हमने बसाया है, उसकी कोख में कई नरक बसते हैं, हमें मालूम है. लेकिन हम बदलते नहीं, जब कोई उत्तराखंड घटित होता है, तब कुछ दहल जाते हैं और जुमलों की तरह उन मुहावरों को दुहराने लगते हैं जो विकास, पर्यावरण, धर्म और आधुनिकता- सबके सौदागर हमें दे रहे हैं.

मगर हम इसे ज्यों का त्यों ले क्यों रहे हैं? क्योंकि एक समाज के रूप में, हमने अपनी भाषा, अपनी पहचान, अपने सरोकार खो दिए हैं- हम दु:ख व्यक्त करना नहीं जानते, दुख महसूस करना नहीं चाहते. दुख, बचाव, राहत- सबके पैकेज हैं जो कभी ऊपर से नीचे गिराए जा रहे हैं और कभी नीचे से ऊपर उठाए जा रहे हैं. जब उत्तराखंड में इस तथाकथित बचाव का काम खत्म हो जाएगा, तब असली मुसीबत आएगी, क्योंकि जो सड़ा हुआ, बदबू देता पहाड़ बचा रहेगा उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होगा. तब शायद प्रकृति ही कुछ करेगी जो अंतत: सारी दुर्गंध सोख लेगी, सारे गुम शवों का खुद अंतिम संस्कार कर डालेगी, और नदियों को फिर से स्वच्छ और पहाड़ों को फिर से हरा-भरा बनाएगी. लेकिन तब तक हमारी जरूरतों, आदतों, लतों और हसरतों की वजह से लोगों को जो कुछ झेलना पड़ा उसका जिम्मेदार कौन होगा? और कौन यह गारंटी लेगा कि हमारी अनदेखी का जो हिमालय है उसमें और कोई अनहोनी घटित नहीं होगी?

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