अगर-मगर के बीच!

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नीतीश के दूसरे पूर्व संगी और विधान पार्षद रहे प्रेम कुमार मणि एक चौंकाने वाली संभावना जताते हैं. वे कहते हैं ‘अगर भाजपा की बड़ी जीत हो जाती है तो फिर हो सकता है कि सामाजिक न्याय की दोनों शक्तियां लालू प्रसाद और नीतीश कुमार एक ही खेमे में आ जाएं. दोनों दलों और नेताओं के लिए भाजपा ही चुनौती होगी इसलिए दोनों को साथ आने के लिए स्थितियां भी मजबूर करेंगी.’ मणि आगे कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने यह मान लिया था कि 2009 के लोकसभा चुनाव या 2010 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सिर्फ अपने बूते इतनी बड़ी जीत हासिल की जबकि दोनों ही बार जीत मूल रूप से भाजपा की थी. नीतीश कुमार की पार्टी के पास अपना कोई संगठन नहीं था, कार्यकर्ता नहीं थे. भाजपा के कार्यकर्ता ही मतदाताओं को बूथ तक लाने का अभियान चलाते रहे. नीतीश कुमार तो महज उत्प्रेरक रहे. भ्रम में पड़कर नीतीश ने खुद को ही मुख्य ताकत मान लिया.’

पुनजीर्वन? कांग्रेस केसाथ गठजोड़ लालू प्रसाद यादव को नया जीवन दे सकता है
पुनजीर्वन? कांग्रेस केसाथ गठजोड़ लालू प्रसाद यादव को नया जीवन दे सकता है. फोटोः एपी

शिवानंद तिवारी या प्रेम कुमार मणि, लगभग एक भाव में ही बात करते हैं. दोनों की बातों को पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया जा सकता. लेकिन इसके इतर दूसरे तर्क भी दिए जा रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘ नीतीश के लिए कड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन अभी से सीटों की घोषणा करना ठीक नहीं. हां, यह जरूर होगा कि नीतीश कुमार जितने कमजोर होंगे, लालू प्रसाद यादव उतने ही मजबूत होंगे. सामाजिक न्याय की धारा में विश्वास करने वाले मतदाता तुरंत नीतीश से छिटककर भाजपा के पाले में नहीं चले जाएंगे बल्कि वे कांग्रेस या राजद के साथ जाना चाहेंगे.

सबके अपने तर्क होते हैं और ये सारे तर्क चुनाव के बाद परिणाम आने के बाद की संभावनाएं बताते हैं. वैसे नीतीश के लिए एक दूसरी मुश्किल तो चुनाव के फौरन बाद ही खड़ी हो सकती है. उनके जो विधायक बगावत करके लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं उन्हें चुनाव बाद पार्टी की साख के लिए निष्कासित करना होगा. अगर ऐसा हुआ तो सरकार के तुरंत अल्पमत में भी आ जाने का खतरा होगा. भाजपा और लालू प्रसाद यादव अगर मजबूत होते हैं तो इन दोनों दलों का दांव तुरंत विधानसभा में विश्वासमत पेश करने का होगा. इस बार विश्वास मत में पास हो जाना नीतीश के लिए उतना आसान नहीं होगा. कांग्रेस लोकसभा चुनाव राजद के साथ लड़ रही है, लेकिन वह विधानसभा में नीतीश को समर्थन दिए हुए है. लोकसभा चुनाव बाद लालू को अगर अपेक्षित सफलता मिलती है तो वे तुरंत कांग्रेस पर समर्थन वापसी का दबाव बनाएंगे. भाजपा को अगर अपार सफलता मिलती है तो वह भी चाहेगी कि नीतीश कुमार की सरकार गिरे ताकि जदयू में भगदड़ की स्थिति बने और नीतीश कुमार एक साल और सरकार में बने रहकर नई घोषणाओं के जरिये खुद को और अपनी पार्टी को मजबूत न कर सकें.

यह सब संभावनाएं चुनाव के बाद की हैं जो वर्तमान विश्लेषणों, आकलनों, अनुमानों, सर्वेक्षणों आदि को सच मान लेने और आने वाले परिणाम के बाद की स्थितियां बयां करती हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सच में यह सब आसानी से होगा और लोकसभा चुनाव में नीतीश करारी हार का सामना करेंगे. और अगर करारी हार का सामना करेंगे तो फिर बिहार में भी औंधे मुंह गिरेंगे?

शायद यह इतना आसान नहीं होगा. दरअसल बिहार के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई पन्ने हैं जो बताते हैं कि यहां की जनता लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बड़ा फर्क करती रही है.

क्यों नीतीश को चुका बताना संभव नहीं?
कई जानकारों के मुताबिक पहली बात तो यह है कि बिहार में सीटों का आकलन अब तक सिर्फ मीडिया द्वारा बनाए गए माहौल के आधार पर किया जा रहा है. जातीय गणित और सामाजिक समीकरण क्या कहते रहे हैं, क्या कह रहे हैं, इस पर बहुत बात नहीं की जा रही. दूसरी बात यह है कि अगर नीतीश कुमार की सीटें कम होती ही हैं तो वह पहले से ही तय-सा भी है, क्योंकि वह तब भी होना संभावित था, जब वे भाजपा के साथ मिलकर लड़ते. वजह साफ है. 2009 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार और भाजपा ने साथ मिलकर बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 32 पर जीत हासिल की थी. यानी 80 प्रतिशत सीटों पर इन दोनों पार्टियों ने कब्जा जमाया था. उसमें भी 40 में से 20 सीटों पर जदयू को जीत हासिल हुई थी. यानि आधी सीटों पर. यह नीतीश कुमार की पार्टी के लिए करिश्माई जीत थी. एक तरह से यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का संभावित चरम भी था. एक बार चरम पर पहुंचने के बाद स्वाभाविक उतार का दौर आता है. इसलिए यह भाजपा के विपक्ष में गए बिना भी बहुत हद तक संभव था कि नीतीश कुमार 20 सीटों के आंकड़े से नीचे उतरते.

अब सवाल यह है कि आखिर नीतीश की पार्टी कितनी सीटों पर सिमटेगी. इसका जवाब इतना आसान नहीं और न ही जितनी आसानी से अनुमान लगाकर नीतीश के ध्वस्त होने की भविष्यवाणी की जा रही है, वह सही है. लेकिन अगर ऐसा हुआ भी और नीतीश कुमार की बड़ी हार हो भी जाती है तो भी क्या उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अगले साल विधानसभा चुनाव में भी उनकी हालत पतली रहेगी? इसका सीधा सा जवाब यह है कि ऐसा तो कतई नहीं कहा जा सकता. वर्तमान स्थितियों के अनुसार भी और इतिहास को देखकर भी.

मौजूदा हालात देखें तो व्यक्तित्व के आधार पर नीतीश बिहार में सबसे कद्दावर नेता हैं. बिहार के चार-पांच प्रमुख नेताओं में कोई अभी वैसा नहीं दिखता जिसकी राज्य में अपनी एक खास छवि हो और जिसे राज्य का राजपाट चलाने के लिए संभावनाओं से भरा नेता माना जाए. भाजपा के नेता और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भाजपा की ओर से बिहार में मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदार हो सकते हैं. लेकिन बेदाग नेता होते हुए भी उनकी अपील पूरे राज्य में नहीं मानी जाती. राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव खुद चुनाव लड़ने से वंचित हो चुके नेता हैं और इस बार के लोकसभा चुनाव में अपनी पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती के जरिये अपना राजनीतिक भविष्य संवारने की कोशिश में हैं. मीसा को पाटलीपुत्र से उतारने की कीमत वे रामकृपाल जैसे नेता को खोकर चुका चुके हैं. राबड़ी को सारण से चुनावी मैदान में उतारकर वे अपने ही दल में विरोध का स्वर झेल चुके हैं. राबड़ी बीते विधानसभा चुनाव में भी सारण से ही सटे दो यादव बहुल विधानसभा क्षेत्रों राघवपुर और सोनपुर से मैदान में उतरी थीं, लेकिन दोनों जगहों से हार गईं. जाहिर सी बात है कि जब लालू प्रसाद को अपनी बेटी और पत्नी को चुनाव मैदान में उतारने से ही पार्टी के अंदर बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी तो अपनी जगह उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने की भी सोचेंगे तो पहले उनकी पार्टी में ही बवाल मचेगा. दूसरा, बिहार अब शायद उस प्रयोग के लिए आसानी से तैयार नहीं होगा.

इन दोनों बड़े दलों के बाद रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा आदि जैसे नेता बचते हैं. लेकिन जानकारों के मुताबिक अब उनमें वह संभावना नहीं दिखती. ऐसे में बिहार में मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार ही पहली पसंद के तौर पर बने रहेंगे. वैसे यह बात भाजपा भी जानती है कि लोकसभा में भले ही नरेंद्र मोदी की लहर के भरोसे वह अधिक सीटें हासिल कर ले, लेकिन विधानसभा में नीतीश कुमार का विरोध करना और राज्य के मुख्यमंत्री पद के लिए विकल्प के तौर पर किसी दूसरे नाम की चर्चा करना इतना आसान नहीं होगा. शायद इसीलिए सुशील मोदी जैसे नेता लोकसभा चुनाव शुरू होने के पहले से ही यह कहते रहे हैं कि बिहार की जनता समझदार है. वह लोकसभा में मोदी को चुनेगी, नीतीश कुमार बिहार के लिए ठीक हैं.

यह तो फिर भी बिहार में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में व्यक्तित्व के आधार पर लड़ी जाने वाली लड़ाई का अनुमान हुआ. उससे इतर इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो नीतीश की पार्टी की लोकसभा चुनाव में बुरी हार हो भी जाए तो इसका मतलब यह नहीं है कि विधानसभा चुनाव में भी उन्हें इतनी आसानी से खारिज कर दिया जाए.  इतिहास में बहुत पीछे गए बगैर हालिया दो लोकसभा चुनावों और उसके आगे पीछे हुए विधानसभा चुनावों का ट्रेंड देखें तो दूसरे संकेत मिलते हैं.

2004 के ही लोकसभा चुनाव की बात करें तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद, रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. तीनों मिलकर बिहार की 40 में से 29 सीटों पर कब्जा जमाने में सफल हुए थे. राजद को 22, लोजपा को चार और कांग्रेस को तीन सीटें मिली थी. यानी लालू प्रसाद बहुत मजबूत होकर उभरे थे. लेकिन अगले ही साल फरवरी 2005 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो वही लालू प्रसाद भारी नुकसान का सामना करते हुए 75 सीटों पर ही सिमट गए. फिर उसी साल नवंबर में जब दुबारा विधानसभा चुनाव हुआ तो लालू यादव की पार्टी और गिरते हुए 52 सीटों तक आ गई.

2009 के लोकसभा चुनाव आते-आते लालू यादव की पार्टी चार सांसदों वाली पार्टी हो गई, लोजपा सांसदविहीन पार्टी बन गई और कांग्रेस तीन से दो पर आ गई.

2009 के लोकसभा चुनाव में तो ऐसे नतीजे आए,, लेकिन कुछ ही महीने बाद जब बिहार में करीब 19 सीटों पर विधानसभा चुनाव हुए तो लालू प्रसाद का अचानक उभार हुआ. नीतीश कुमार की पार्टी की करारी हार हुई. उसके अगले ही साल 2010 में विधानसभा चुनाव का मौका आया. चुनावी विश्लेषक और पंडित फिर से उप चुनाव के नतीजों का हवाला देते हुए यह भविष्यवाणी करने लगे कि इस बार नीतीश कुमार की पार्टी की करारी हार होनेवाली है. लेकिन हुआ उल्टा. उपचुनाव में करारी हार का सामना कर चुके नीतीश कुमार, उनकी पार्टी और साथ में भाजपा ने ऐतिहासिक सफलता हासिल की. चुनावी पंडितों का विश्लेषण एक सिरे से धराशायी हो गया.

कुछ ऐसा ही 1994 में हुए एक संसदीय उपचुनाव के बाद हुआ था. 1994 में बिहार की वैशाली सीट पर किशोरी सिन्हा जनता दल की उम्मीदवार बनी थीं. वे कोई मामूली उम्मीदवार नहीं थीं. बिहार के सबसे चर्चित व बड़े रसूख वाले कांग्रेसी परिवार की बहू थीं. बिहार विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा की बहू, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी, निखिल कुमार की मां. लालू तब उफानी दिनों में थे, लेकिन जनता दल की उम्मीदवार किशोरी सिन्हा तब एक निर्दलीय प्रत्याशी आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद से चुनाव हार गई थीं. उस समय के चुनावी विश्लेषकों के विश्लेषण अब भी अखबारों के पन्नों में दर्ज हैं. एक संसदीय सीट पर लालू प्रसाद की पार्टी की हार के बाद पूरे बिहार में माहौल बनाने की कोशिश हुई कि अब लालू प्रसाद के राज का अंत होगा. 1995 में बिहार में विधानसभा चुनाव होना था. चुनाव हुआ. लालू ने तब के अविभाजित बिहार की 324 सीटों में से 167 सीटें जीतकर तमाम अनुमानों और आकलनों को ध्वस्त कर दिया था. लेकिन विधानसभा चुनाव में ऐसा प्रदर्शन करने वाले वही लालू प्रसाद यादव जब 1999 में लोकसभा चुनाव हुआ तो अविभाजित बिहार की 54 लोकसभा सीटों में से सात पर सिमट गए थे.

मतलब साफ है कि बिहार की राजनीति में लोकसभा चुनाव के आधार पर विधानसभा चुनाव की परिणति और विधानसभा चुनाव के आधार पर लोकसभा में प्रदर्शन के अनुमान पिछले दो दशक से लगातार ध्वस्त होते आ रहे हैं. इसलिए बिना चुनाव परिणाम आए अभी से ही लोकसभा चुनाव में नीतीश की करारी हार की घोषणा और उसके बाद बिहार में भी हाशिये के नेता बन जाने का पूर्वानुमान शायद एकांगी भाव से की जा रही व्याख्या है और हड़बड़ी में सतही विश्लेषण जैसा भी.

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